नेताजी भाषण देते जाते थे.......

  • 2016-01-06 02:30:18.0
  • राकेश कुमार आर्य

अवसर एक चुनावी सभा का था। वक्ता एक बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। वह वर्तमान प्रधानमंत्री को सत्ता से हटाकर अपनी पार्टी  को सत्ता में लाने के लिए एड़ी चोटी का बल लगा रहे थे। जनता भी वर्तमान प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी से दुखी थी, इसलिए वह भाषण दे रहे नेताजी के लच्छेदार भाषण पर बार-बार ताली बजा रही थी। जितनी तालियां बजती थीं भाषण दे रहे नेताजी उतने ही उत्साहित होते जाते थे। इसी समय सभा में से एक ओर से कुछ लोग उठे, उनकी वेशभूषा से लग रहा था कि वह किसान थे। उन्होंने नेताजी के पास तक अपना मांगपत्र पहुंचवाया, जिसमें खेतों के लिए पानी की व्यवस्था कराने की और अपनी फसल का उचित मूल्य दिलाने की मांग प्रमुख रूप से लिखी थी। नेताजी ने किसानों का मांगपत्र प्राप्त किया और उसे मंच से ही लोगों को पढक़र सुनाया कि-‘‘भाईयो बहनो, देखो मेरे देश का किसान कितना दुखी है? इस सरकार की गलत नीतियों के परिणामस्वरूप यह आत्महत्या कर रहा है, यह उजाड़ दिया गया है। हम सत्ता में यदि आये तो इनके लिए पहले दिन से 24 घंटे की बिजली देंगे, खेत को प्यासा नही रहने देंगे और अपने किसान को भूखा मरने नही देंगे।’’ जब नेताजी यह भाषण दे रहे थे तो सभा में बड़ी संख्या में उपस्थित किसानों ने देर तक तालियां बजायीं। उन्हें लगा कि उनकी समस्याओं का समाधान अब हो जाना निश्चित है।

नेताजी भाषण देते जाते थे, पार्टी उनके लिए स्थान-स्थान पर बड़ी सभाओं का आयोजन कर रही थी। चारों ओर उनके लच्छेदार भाषणों की धूम मची थी। वह जहां भी जाते वहां के स्थानीय लोगों की मांगों को सुनते और बिना समझे ही उनकी मांगों को सत्ता में आते ही पहले दिन ही पूर्ण करने का वचन दे डालते। लोग जय जयकार करने लगते। हर वर्ग के, हर समुदाय या सम्प्रदाय के हर पेशे के, हर स्तर के, हर आंचल के  और हर क्षेत्र के लोगों ने नेताजी को अपनी समस्याओं का मांगपत्र दिया, नेताजी उन्हें लेते गये और वोटों का अपना आंकड़ा बढ़ाते गये।

चुनाव संपन्न हो गये। परिणाम नेताजी के अनुकूल गया। सत्ता की कुर्सी पर उनका बड़ी भव्यता से आरोहण हुआ। सारे देश के लोगों को लगा कि अब कल से उनके ‘अच्छे दिन’ आ जाएंगे। नेताजी को एक दिन नही, एक महीना सत्ता में आये हो गया, फिर एक वर्ष हो गया, पर ‘अच्छे दिन’ नही आये।A_neta_Mike

हमारे देश में यह स्थिति आजादी मिलने के पश्चात से सत्ताधारियों और राजनीतिज्ञों ने पहले दिन से ही बना रखी है। लोगों को नारों के नाम पर सपने बेचने वाले इन नेताओं ने ही दूध के नाम पर सपरेटा बेचने की नीति लोगों को सिखाई है। कितना बेतुका है इस देश का कानून कि एक दूध बेचने वाला दूध में पानी मिला दे तो वह पकड़ा जाता है और उसे दण्ड दिया जाता है, पर इस देश के नेता वर्षों से सबके सामने खुल्लम खुल्ला झूठ बोलते आ रहे हैं और झूठे सपने बेच रहे हैं, उनके विरूद्घ कोई कार्यवाही नही होती। ये देश बेच दें तो भी बड़े आराम से घर में रहते हैं और एक आम आदमी छोटी सी भी गलती कर दे तो उसके विरूद्घ कठोर कार्यवाही होती है। क्या होगा इस देश का?

इसमें कोई संदेह नही है कि यह देश ऊर्जावान लोगों का देश है। यदि यह ऊर्जावान लोगों का देश नही होता तो राजधर्म के प्रति पूर्णत: असावधान राजनीति के साथ-साथ चलकर भी इस देश के लोग अपनी आजीविका नही चला पाते। इस देश ने क्रूर सत्ताओं के विरूद्घ सदियों तक संघर्ष किया है और संघर्ष करते-करते अपना अस्तित्व बचाया है। जब यह देश उस समय नही मिटा तो अब तो कैसे मिटने लगा है, पर फिर भी यह मानना पड़ेगा  कि देश छला और ठगा अवश्य गया है। इसका कारण यह है कि जब इस देश के लोगों ने विदेशी क्रूर सत्ताओं के साथ संघर्ष किया था तो उस समय इसे इस बात का भरोसा होता था कि सत्ताधारी लोग विदेशी हैं और इनका विश्वास नही करना है, इसलिए अनवरत इन्हें भगाने के लिए संघर्ष करते रहना है।

स्वतंत्रता के पश्चात यह भाव बदल गया, लोगों को लगा कि अब सत्ता में बैठे लोग अपने हैं, इसलिए इनके साथ लडऩा नही है इन्हें सहयोग करना है। इस भाव परिवर्तन के कारण लोगों ने असावधानी बरतनी आरंभ कर दी। जिसका लाभ राजनीतिज्ञों ने उठाया। उन्होंने बड़े आराम से राजनीति का व्यापारीकरण कर लिया। चारों ओर लूट मचायी। लूट मचाते राजनीतिज्ञों को देश की जनता ने बड़े प्यार से समझाया कि ऐसा नही किया करते, पर वह न माने। जनता ने उधर से आंखें मूंद लीं और सोचा कि कोई बात नही खा रहे हैं तो क्या हो गया? अपने ही लोग हैं।

जनता की यह प्रवृत्ति बड़ी खतरनाक सिद्घ हुई। नेता बेलगाम हो गये। उनकी भूख बेलगाम हो गयी। देश को चूसते-चूसते इन्होंने कंकाल बना दिया। जनता की आंखें खुलीं, तो पता चला कि देर तो हो चुकी है। लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र को देखकर जनता असहाय हो गयी है। अब उससे निगलते या थूकते कुछ भी नही बन रहा है। सर्वत्र निराशा है परिस्थितियों पर काबू पाने के लिए जनता को ही जागना होगा। वह सत्ता से संघर्ष करना सीखे अर्थात देश के हितों को चोटिल करते किसी भी राजनीतिज्ञ को बख्शे नही। लालू को जनता की ओर से दिया गया क्षमादान जनता की निर्णय लेने की शिथिलता का परिणाम है, और मोदी का पाकिस्तान जाकर पठानकोट की घटना को दक्षिणा में लेकर आना अति आत्मविश्वासी प्रवृत्ति के चलते उठाया गया कदम है। जनता भी संभले और राजनीतिज्ञ भी संभलें। समय तेजी से हाथ से निकलता जा रहा है। सवा तीन वर्ष पश्चात मोदी से देश की जनता अपने से किये गये वायदों का भी हिसाब मांगेगी पर उससे पूर्व दिल्ली और बिहार को यदि देश की जनता ने अन्य प्रदेशों में भी दोहरा दिया तो क्या होगा?

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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