नेता सुधरें - देश सुधर जाएगा

  • 2016-01-16 02:08:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

A_neta_Mikeपठानकोट के आतंकवादी हमले के पश्चात भारत की आतंकवाद विरोधी नीति पर एक बार फिर बहस गरमा गयी है। पहली बार देखा जा रहा है कि देश का विपक्ष सरकार की आतंकवाद विरोधी जैसी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी नीति की केवल आलोचना कर रहा है, वह ना तो सरकार को किसी प्रकार का सहयोग देना चाहता है और ना ही उसके पास कोई ऐसी सोच है, जिसे वह सरकार की नीति की रचनात्मक आलोचना करते हुए स्पष्ट करे। किसी भी लोकतांत्रिक देश और समाज के लिए यह स्थिति अनपेक्षित, अवांछित और दुखद ही है कि देश का विपक्ष और किसी सीमा तक लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात प्रेस भी सारी चीजों के लिए केवल सरकार को ही दोषी मानता है, और उसे अपना कोई सत्परामर्श दिये बिना असफल होने देना चाहता है या दूर से ही यह देखना चाहता है कि देखते हैं-‘मुन्ना कहां तक चलेगा।’

जिस समय देश पर नेहरू जी शासन कर रहे थे उस समय यह स्थिति नही थी। तब का विपक्ष बहुत ही उत्तरदायी भूमिका का निर्वाह करता था। राष्ट्रीय मुद्दों और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर सरकार और विपक्ष एक दीखते थे और एक साथ मिलकर निर्णय लिया करते थे। धुर राजनीतिक विरोधी लोग भी इस प्रकार एक साथ बैठे दिख जाया करते थे किजैसे वह राजनीतिक विरोधी न होकर सहपाठी हों। पं. जवाहर लाल नेहरू ने अपने धुर राजनीतिक विरोधी श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में उद्योगमंत्री बनाया था। इसी प्रकार राममनोहर लोहिया और नेहरूजी की संसद में तकरार देखने योग्य होती थी परंतु उससे अलग वह बातचीत करते और हाथ मिलाते अक्सर दिख जाया करते थे। हमने नेहरू युग को ही यहां स्मरण किया है। इसका कारण यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जैसा आकर्षण नेहरू के नेतृत्व के प्रति लोगों में था वैसा ही मोदी के प्रधानमंत्री बनते समय उनके प्रति देखा गया। पर उन्हें ‘उत्तरदायी विपक्ष’ नही मिला। नेहरू के समय का विपक्ष धैर्यवान था और वह सत्ता में आने के लिए देर तक प्रतीक्षा कर सकता था, परंतु आज का विपक्ष विशेषत: कांग्रेसी नेतृत्व सत्ता को अपनी बपौती मान चुका लगता है, इसलिए वह बिना सत्ता के अधीर है। जिसे एक प्रकार की ‘असहिष्णुता’ ही माना जाएगा।

आज की ज्वलंत समस्याओं में से एक है-आतंकवाद। इस्लामिक कट्टरपन्थ पाकिस्तान की धरती से उठकर भारत को समाप्त करना चाहता है। माना जा सकता है कि भारत के मुसलमानों में से अधिकांश की इस कट्टरपंथ के प्रति कोई सहानुभूति नही है, पर इसी बात को हमारा विपक्ष भी कहे और सरकार के साथ मिलकर कोई ठोस रणनीति आतंकवाद के समूलोच्छेदन के लिए बनाने में सहयोग करे-‘तो कोई बात बने।’ पाकिस्तान इस समय विश्व में सबसे खतरनाक क्षेत्र बन चुका है। वहां के बहुत से क्षेत्र (विशेषत: पाकिस्तान-अफगानिस्तान का सीमावर्ती क्षेत्र) अभी भी ऐसे हैं जिन पर पाकिस्तानी सरकार का आदेश पूर्णत: निष्प्रभावी हो जाता है। उन क्षेत्रों में जो आतंकी बैठे हैं, वह अपने आप में खूंखार किस्म के हैं। उन्हें आईएस का उदय अपने कदमों को मजबूत करने का संकेत दे रहा है। भारत को यह आतंकवाद एक बार नही कई बार गहरे घाव दे चुका है। भारत की सरकारें आतंकी घटनाओं को भी मानवाधिकार का मामला समझकर उपेक्षित करती रही हैं। उन्हें डर लगता है कि यदि आतंकवाद को किसी विशिष्ट संप्रदाय से जोड़ा तो कहीं ‘वोट बैंक’ प्रभावित ना हो जाए। इसलिए वह केवल इतना कह देते हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नही होता।’

अब यदि आतंकवाद एक संप्रदाय की सोच को झलकाता है तो कहा जाएगा कि आतंकवाद का कोई धर्म तो नही होता पर उसका संप्रदाय (मजहब) अवश्य होता है। यह बात तब स्पष्ट हो जाती है जब अफजल गुरू या कसाब को फांसी दी जाती है और उसके पश्चात उनकी देह को ‘सुपुर्दे खाक’ करने के समय बड़ी संख्या में लोग उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होते हैं। तब वह  उपस्थित होने वाले लोग अपनी उपस्थिति से बताते हैं कि आतंकवाद का कोई मजहब है ऐसे अनेकों उदाहरण छिपे जा सकते हैं।

भारत में मुंबई ने 1993 और 2008 के मध्य कई आतंकी हमलों को झेला है। मुंबई हमलों के पश्चात भारत सरकार ने आतंकवाद की समाप्ति के लिए कुछ कड़े कदम भी उठाये, पर आतंकी घटनाएं रूकी नहीं। आतंकवादी और भी अधिक सक्रिय होते गये और एक से बढक़र एक आतंकी कार्रवाई करते रहे। भारत सरकार असहाय बनती चली गयी। भारत में जब गठबंधन की सरकारों के ‘घटियाबंधन’ का दौर आरंभ हुआ तभी से (1990 से) भारत में आतंकवाद की घटनाओं में अधिक वृद्घि हुई। इसका कारण यही रहा है कि गठबंधन की सरकारों का कोई मुखिया नही होता, वहां कई मुखिया होते हैं। जिन्हें एक वर्ग विशेष के मतों की चिंता रहती है। इसलिए ऐसी सरकारों को आसानी से झुकाने में सफलता मिल जाती है। प्रधानंत्री मोदी के सत्ता में आने के पश्चात आतंकवादियों को लगा कि अब संभवत: उनकी ‘दाल नही गलेगी।’ केन्द्र में एक दल की मजबूत सरकार के आने से उन्हें यह भी लगा कि भारत अब राष्ट्रीय मुद्दों पर एकता का प्रदर्शन करेगा। पर ऐसा हुआ नही। केन्द्र में एक दल की सरकार तो आ गयी पर ‘एक दिल’ की सरकार नही आ पायी। सबकी ‘अपनी-अपनी ढली अपना-अपना राग’ बन गया। फलस्वरूप कुछ समय की चुप्पी के पश्चात आतंकी सक्रिय होने लगे। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की ओर से कुछ लोगों के द्वारा कुछ ऐसी बातें भी समय से पहले बोल दी गयीं जिन्हें न बोला जाता तो अच्छा रहता। जैसे आतंकवादियों की चुप्पी पर या पाक के बदले तेवरों को भाजपा ने अपनी बड़ी सफलता के रूप में बोलना और प्रचारित करना आरंभ किया। यह गलत था।

परिणामों को ‘कैश’ करने की आवश्यकता नही थी, परिणामों को देश अनुभव करता और भाजपा ‘फीलगुड’ करती तो अच्छा था। परिणामों पर अधिक बोला गया तो आतंकवादियों को लगा कि कुछ किया जाये अन्यथा ये लोग हमें मरा हुआ समझ लेंगे। दूसरे उन्होंने शांत रहकर यह भी भांप लिया था कि देश का विपक्ष तो सारा बिखरा पड़ा है, इनके सुर अलग-अलग हैं, इनकी दिशाएं अलग-अलग हैं, इसलिए इनकी कोई ठोस रणनीति आतंकवाद के विरूद्घ नही हो सकती। बिखरे हुए मोती कभी माला नही बन सकते, टूटे हुए दिल कभी खड़े कही हो सकते और बिखरे हुए नेता कभी एक नही हो सकते। यही स्थिति आतंकवाद के लिए खाद पानी का काम करती है। नेता सुधर जाएं तो देश अपने आप सुधर जाएगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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