समान नागरिक संहिता की आवश्यकता

  • 2015-10-24 01:10:14.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत के संविधान का अनुच्छेद जो कि समान नागरिक संहिता की बात कहता है इस समय पूर्णत: उपेक्षित जान पड़ रहा है। यद्यपि यह जितना 1950 में संविधान के लागू किये जाने के समय प्रासंगिक था उतना ही आज भी है। हमारे नेताओं के आचरण व्यवहार और कार्यशैली ने इस महत्वपूर्ण संवैधानिक प्राविधान को लागू नही होने दिया है। ऐसी कई चीजें और परंपराएं हैं जो इस देश को अपने पहले लोकतांत्रिक बादशाह नेहरू के कारण झेलनी पड़ी हैं। उन्हीं में से एक है देश के संविधान में समान नागरिक संहिता का प्राविधान होते हुए भी इसे लागू न कराना। क्योंकि हमारे उस ‘बादशाह’ ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के मुस्लिम शासकों को 1950 में ही आश्वस्त कर दिया था कि भारत में समान नागरिक संहिता की आदर्श व्यवस्था का अभिप्राय यह नही होगा कि किसी संप्रदाय के अधिकारों और उसके साम्प्रदायिक निजी कानून को न माना जाए। इसके विषय में नेहरू ने पाकिस्तान के वजीरे आजम लियाकत अली से विधिवत समझौता किया था। इस प्रकार सारे देश की इच्छा को और सारे देश की भावनाओं को एक व्यक्ति (नेहरू) ने अपनी इच्छा के सामने नतमस्तक करा दिया।

वैसे नेहरू का इसमें दोष कम था, क्योंकि राजनीति और सार्वजनिक जीवन को निजी हठ से चलाने की शिक्षा उन्हें गांधी से मिली थी। गांधी जी नेहरू के राजनीतिक गुरू थे और उन्होंने अपनी विरासत को आगे बढ़ाने का दायित्व नेहरू को दिया जाना उचित माना था। इसका कारण यह था कि गांधीजी स्वयं हठीले थे और लोकतंत्र के नाम पर हठ करके अपनी बात मनवाना उनका मूल स्वभाव था। उन्होंने देशबंधु चितरंजनदास की ‘अड़ंगा नीति’ को उपेक्षित कराके और लोकमान्य तिलक जी की अंग्रेजों के प्रति ‘प्रतियोगी सहयोग’ की नीति को तोड़ मरोडक़र देश में असहयोग आंदोलन चलाया और मुस्लिम तुष्टिकरण का पहला प्रयोग करते हुए अपना आंदोलन ‘खिलाफत’ के नाम कर दिया। तिलक जी उनके ‘क्रांतिकारी असहयोग’ जैसे शब्दों के जाल में फंस गये थे, जो गांधीजी ने 1920 के प्रारंभ में व्यक्त किये थे। बाद में तिलक जी तो नही रहे पर तिलक ने खिलाफत नेताओं के सामने घुटने टेके खड़े जिस गांधी को अपने जीते जी सचेत किया था, वही नेता गांधीजी को उस समय छोड़ गये जब उनका अपना स्वार्थ सिद्घ हो गया। कहने का अभिप्राय है कि गांधीजी को खिलाफत से कुछ नही मिला। पर कांग्रेस का ‘मॉडरेट दल’ उनके कार्यक्रम से अलग हो गया। जिसने ‘लिबरल पार्टी’ अलग बना ली। कुछ समय पश्चात हठीले गांधी को देशबंधु चितरंजनदास ने छोड़ दिया। इसी समय स्वामी श्रद्घांनद भी गांधीजी को छोडक़र चले गये, स्वामी श्रद्घानंद ने तो गांधी को उस समय सार्वजनिक रूप से लताड़ा था, जब वह अपनी एक हठ पर इसलिए अड़े थे कि ऐसा करने को उनकी अंतरात्मा कह रही थी। तब स्वामीजी महाराज ने गांधी को कहा था कि गांधीजी अंतरात्मा आपकी बपौती नही है, यह किसी और की भी है और यदि आप इसके नाम पर किसी अन्य की अंतरात्मा की आवाज को कुचलोगे तो हम आपके साथ नही रह सकते।

गांधी तब भी नही माने। फलस्वरूप सुभाष बाबू तक कई ऐसे नेता गांधीजी का साथ छोड़ गये जो कि कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता थे। गांधीजी का मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल चलता रहा और कांग्रेस को छोड़-छोडक़र लोग जाते रहे। इस प्रकार नेताओं द्वारा कांग्रेस को छोडक़र जाने से गांधीजी को यह लाभ मिला कि वह कांग्रेस के नायक और ‘अधिनायक’ दोनों हो गये। अधिनायक की चरणवंदना करने वाली कांग्रेस ने 1947 में अपने ‘अधिनायक’ के एक संकेत पर नेहरू को उसका उत्तराधिकारी मान लिया। नेहरू ने अपने गुरू गांधीजी की परंपरा को आगे बढ़ाया और वह शीघ्र ही कांग्रेस के नायक एवं ‘अधिनायक’ बन गये।

नेहरू जी ने राजनीति में उन्हीं बातों का अनुकरण किया जिन पर उनके गुरू गांधीजी चला करते थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र देने की धमकी दे-देकर कई बातों को मनवाया, उनमें ‘जन-गण-मन’ को वंदेमातरम् के स्थान पर राष्ट्रगान बनवाने से लेकर समान नागरिक संहिता को लागू न कराके ठंडे बस्ते में डाल देने की जिद तक के कई कार्य सम्मिलित थे।

लियाकत अली से नेहरू पाकिस्तान स्थित हिंदुओं के निजी कानूनों को उसी प्रकार मनवाने की बात कह सकते थे जैसे वह भारत के मुसलमानों को भारत में उनके निजी कानून को मान्यता देने जा रहे थे। पर उन्होंने नही कहा। डा. भीमराव अंबेडकर देश के दूसरे विभाजन के पक्षधर नही थे, इसलिए वे नही चाहते थे कि कहीं से फिर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हों कि देश विभाजन की ओर बढऩे लगे। इसलिए उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण था कि समान नागरिक संहिता को लागू किया जाए। उनका मानना था कि पर्सनल लॉ में सुधार लाये बिना देश को सामाजिक परिवर्तन के युग में नही लाया जा सकता। इसका अभिप्राय था कि देश में किसी वर्ग विशेष के अधिकारों का रक्षक कठमुल्लों, या किन्हीं मठाधीशों को ना माना जाए। क्योंकि ये लोग साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ाएंगे, और अपनी-अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए  लोगों के खून पर गुजारा करेंगे। बाद में शाहबानो प्रकरण में कानून बनाकर 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फेेसले को पलट दिया। जिसके विरोध में तत्कालीन मंत्री आरिफ मौहम्मद खान ने राजीव मंत्रिमंडल से अपना त्यागपत्र दे दिया।

अब आज हम जिन परिस्थितियों में जी रहे हैं, वह वही दुखद परिस्थितियां हैं जो गांधी, नेहरू की जिद का परिणाम हैं। राजीव गांधी ने गांधी, नेहरू के लगाए विष वृक्ष पर फल लगा दिये और उन फलों को खाकर आज का सारा परिवेश दूषित हो चुका है। केन्द्र की मोदी सरकार जितनी शीघ्रता से समान नागरिक संहिता को लागू करा देगी उतना ही उसके अपने लिए  भी यह लाभकारी होगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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