देश के लिए जनसंख्या नीति की आवश्यकता

  • 2016-05-27 06:30:12.0
  • राकेश कुमार आर्य

देश के लिए जनसंख्या नीति की आवश्यकता

जनसंख्या नियन्त्रण के लिए तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य एवम् परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने एक बार कहा था कि सरकार देश में कानून बनाकर या बलात् जनसंख्या नियन्त्रण के पक्ष में नही है। 5 मई 2010 को मातृत्व और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए परिवार कल्याण पर आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए केन्द्रीय मंत्री श्री आजाद ने कहा था कि लोगों को परिवार कल्याण के लिए उपलब्ध सुविधाओं के विषय में जानकारी देकर जागरूक किया जायेगा।

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय पर आयी थी जब देश में जनगणना का कार्य प्रारम्भ हो चुका था और देश के बुद्घिजीवियों, चिन्तकों एवम् प्रबुद्घ वर्ग में जनसंख्या नियन्त्रण को लेकर बहस चल रही थी। देश की स्थिति बड़ी दयनीय थी। ऐसे में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह कथन कि वे लोगों को जनसंख्या नियन्त्रण के लिए उपलब्ध सुविधाओं के विषय में जानकारी देकर उन्हें जागरूक करके इस समस्या पर पार पा सकते हैं, हास्यास्पद सा लगता था।

विशेषत: तब जब कि देश की अधिकांश जनता अज्ञान और अशिक्षा के गहन अन्धकार में पड़ी हुई हो, और उसे नही पता कि ‘जागरूकता’ होती क्या है? लोगों को जागरूक किया जाना आवश्यक है, इससे कोई भी व्यक्ति सहमत हो सकता है, परन्तु जागरूक किया किसे जा सकता है? जागेगा वही जो जागने की इच्छा रखता है, या जो यह जानता है कि मुझे जागना भी है। उसे आप नही जगा सकते जो सोये पड़े हैं, परन्तु कह रहे हैं कि हम जाग रहे हैं।

जनजागरण के लिए वही लोग सफ ल हुए हैं, जिन्होंने अपनी ऐश्वर्यपूर्ण जीवनशैली को त्यागकर जनसाधारण के साथ रात्रि प्रवास किया है, जो उनके बीच रहे हैं, और उनके दु:ख दर्द और कष्टों को उन्होंने समझा है। घोषणाऐं करके वातानूकूलित भवनों में चला जाना हमारे आजकल के नेताओं की कार्यशैली बन गयी है, इससे कभी भी जागरूकता का कार्य नही हो सकता। इसीलिए ये केवल बयानबाजी की बातें बनकर रह जाती हैं, व्यवहार में कोई ठोस कार्य इस पर नही हो पाता।

जब बात जागरूकता की आती है तो केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को देश के मुस्लिम समाज को ही जागरूकता के अपने कार्यक्रम में सर्वप्रथम सम्मिलित करना चाहिए। मुस्लिम समाज की यह मान्यता थी कि एक दिन वह भारत पर अपना राज्य पुन: कायम करेंगे और इसके लिए वह अधिक जनसंख्या बढ़ायें, सर्वथा दोषपूर्ण है। इसे आज़ाद साहब परिवत्र्तित करें। यदि देश के लगभग 85 करोड़ हिन्दू 16-17 करोड़ मुस्लिमों के आगे अपनी जनसंख्या कुछ भी न बढ़ायें और मुसलमान अगले 10 वर्ष में मान लीजिए 85 करोड़ हो जायें, तो क्या राजनीतिक सत्ता प्राप्त करके वह देश की जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर देंगे। विशेषत: तब जबकि देश की अधिकांश जनता आज भी भोजन वस्त्रा और आवास की आवश्यकता पूत्र्ति के लिए कष्टपूर्ण जीवन जीने के लिए बाध्य है।

इसमें 85 करोड़ की जनता की और वृद्घि करके हम किधर जायेंगे? यह बात मुस्लिम समाज को समझाने की है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जितना हमारे पास है उसी में गुजारा करना सीखें। अधिक की इच्छा करना विनाश को आमंत्रित करने के समान है। ऐसे में उक्त कार्यक्रम में बोलते हुए विख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामी नाथन का यह कथन सही ही है कि- ‘‘हमें देश में जनसंख्या के लिए स्थिरीकरण की नीति अपनानी होगी, जो महिलाओं की स्थिति, निर्धनता और जनसांख्यिकीय रूचि को ध्यान में रखकर बनायी जानी चाहिए। जिससे कि देश का कोई भी व्यक्ति अपनी सन्तान अचानक पैदा करने की बजाय अपनी इच्छा से करे।’’

अगले 50 वर्ष तक भी हम अपनी वत्र्तमान जनसंख्या के उस भाग के लिए, जो आज भोजन, वस्त्र और आवास की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित है और शिक्षा एवम् स्वास्थ्य जिसके लिए मृग मरीचिका बनकर रह गये हैं, भोजन, वस्त्र और आवास की उपलब्धता सुनिश्चित नही करा सकते, शिक्षा और स्वास्थ्य की तो बात ही छोडिय़े। इसीलिए स्थिरीकरण की उपरोक्त बात बहुत ही ध्यान देने योग्य है।

यह स्थिरीकरण कुछ कठोर उपायों से ही किया जाना सम्भव है। यह सर्वमान्य सत्य है कि कठोर उपाय बिना कानून के किये जाने सम्भव नही हैं। सभ्य समाज का यह कत्र्तव्य है और जैसा कि सभ्य व्यक्ति करता भी है कि वह उतनी ही सन्तान उत्पन्न करना चाहता है जितनी की वह परवरिश कर सकता है। यही बात हमारे शासकों के लिए एक अनिवार्य बाध्यता उपस्थित करती है कि वह भी देश के लिए ऐसी जनसंख्या नीति का निर्धारण करें कि जिससे उतने ही नागरिक देश में रह सकें, जितने की आवश्यकताओं की पूर्ति देश के आर्थिक संसाधनों के भीतर रहकर की जानी सम्भव है। हमारे देश का कुल क्षेत्रफ ल सारे संसार के कुल क्षेत्राफ ल का 2.6 प्रतिशत है। परन्तु हम सारे विश्व को कुल जनसंख्या के लगभग 17 प्रतिशत हैं। विश्व की कुल जनसंख्या के इस 17 प्रतिशत भाग में प्रतिवर्ष वृद्घि होती जा रही है और देश का स्वास्थ्य मंत्री कह रहा है कि हम जनसंख्या नियन्त्रण के लिए कोई भी कानून बनाने की इच्छा नही रखते हैं। ऐसे शासक जो आगत की आपदा का अनुमान नही लगा पाते हैं, शासन करने का अधिकार खो बैठते हैं। हमारे शासक आज के समय में शासक होने का अधिकार नही रखते। क्योंकि ये सब कुछ जानते हुए भी अनजान होने का नाटक कर रहे हैं। इन्हें ज्ञात है कि कल क्या होगा, परन्तु उससे जनता को अवगत नही करा रहे हैं। हमारे विचार से जनजागरण का सबसे उत्तम ढंग आगत की आपदा को समझ लेना है। जो शासन आगत की आपदा को समझ नही पाता है। वह देश की समस्याओं का समाधान करने में असफल हो जाता है। स्वतन्त्रता के पश्चात् आज तक हमारी सरकारों की कोई भी ऐसी योजना नही रही कि जो धूम मचाने वाली कही जा सके। सारी योजनाऐं सरकारी फ ाईलों में बनीं और फ ाईलों में ही मर गयीं। साथ ही यदि कहीं कोई प्रयास दिखायी भी दिये तो वह सरकारी भोंपुओं, रेडियो और टी.वी. तक ही सिमट कर रह गये। इस प्रकार सरकारों ने सरकारी मशीनरी और प्रचारतन्त्र का दुरूपयोग तो किया है पर वास्तव में वे पात्र व्यक्ति को उसका लाभ नही दे पायी। पात्र व्यक्ति को लाभ तभी मिलेगा जब कोई जननेता जनसाधारण के बीच जाकर कार्य करेगा। उन्हें हाथ पकडक़र झकझोरेगा और उनकी अलसायी हुई आँखों पर ज्ञान रूपी जल के छींटे मारकर उन्हें नींद त्यागने के लिए बाध्य करेगा। यही नीति हर काल में सफ ल रही है और आज भी हम इसी के द्वारा सफ ल हो सकते हैं। इसके लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति बनाने के लिए पक्ष विपक्ष और सभी राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों की राजनीति को त्यागकर कार्य करें और एक संयुक्त रणनीति बनाकर जनसंख्या नियन्त्रण हेतु आवश्यक कानून का निर्माण करें, यह राष्ट्र की युगीन आवश्यकता है। हमारे केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को इस आवश्यकता को समझना चाहिए और तात्कालिक लाभ प्राप्त करने के लिए बयान देकर वाहवाही लूटने के प्रयासों से बचना चाहिए। चिन्तन का केन्द्र राष्ट्र का भविष्य बने, वत्र्तमान में सस्ती लोकप्रियता की प्राप्ति नहीं, तभी राष्ट्र का कल्याण सम्भव होगा।
(यह लेख पूर्व में साप्ताहिक ‘उगता भारत’ में प्रकाशित हो चुका है)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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