नौकरियों से साक्षात्कार समाप्त

  • 2016-01-02 02:30:43.0
  • राकेश कुमार आर्य

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोएडा आये और कुछ रचनात्मक कार्यों का शुभारंभ करके चले गये। प्रधानमंत्री के भाषण में वही पुरानी शैली थी, उनका उत्साह देखते ही बनता था। नोएडावासियों ने भी अपने प्रधानमंत्री के आतिथ्य सत्कार में कोई कमी नही छोड़ी।

प्रधानमंत्री के साथ प्रदेश के राज्यपाल रामनाईक और केन्द्रीय सडक़ परिवहन राजमार्ग एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी भी उपस्थित रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी गेट से लेकर डासना तक एन.एच. 24 को 14 लेन चौड़ा करने के कार्य को हरी झंडी दी। जबकि श्री गडकरी ने एन.एच. 58 के मेरठ से देहरादून तक के हिस्से तथा एन.एच. 24 के हापुड़ से लखनऊ के हिस्से को भी शीघ्र चौड़ा करने का वायदा किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की केन्द्र सरकार की नौकरियों में एक जनवरी से साक्षात्कार की अनिवार्यता को समाप्त करने की भी घोषणा की। उन्होंने प्रदेश की अखिलेश सरकार से भी ऐसा ही करने का आग्रह किया है।

प्रधानमंत्री के भाषण को और उनकी नोएडा में आकर की गयी घोषणाओं को लोगों ने 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत भाजपा की ओर से बिगुल फूंकने के रूप में भी कई लोगों ने देखा है। प्रदेश सरकार ने इस कार्यक्रम से लगभग किनारा किया है। इसलिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस कार्यक्रम से अनुपस्थित रहे।

प्रधानमंत्री के द्वारा केन्द्र सरकार की तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के लिए नौकरी पाते समय साक्षात्कार समाप्त करने की घोषणा का जहां तक प्रश्न है तो इस घोषणा के लागू होने से इन नौकरियों को पाने वालों की नियुक्ति में पारदर्शिता तथा ईमानदारी को बढ़ावा मिलेगा। इस तथ्य से सभी लोग भली भांति परिचित हैं कि साक्षात्कार के नाम पर मोटी धनराशि आवेदकों से ली जाती रही है। यदि नौकरी 25-30 हजार वेतन वाली मिलती है और रिश्वत के नाम पर 7-8 लाख आवेदक से ले लिये जाते हैं, तो देखने में ये आया है कि ऐसे कर्मचारी उस रिश्वत के पैसे के ब्याज को चुकाने में नौकरी पार कर लेते हैं, पर नौकरी के लिए लिये गये कर्जा को चुका नही पाते, क्योंकि गांव देहात में तीन-चार प्रतिशत पर साधारणतया कर्जा मिलता है। अब 8 लाख का मासिक ब्याज 24 से 32 हजार हुआ। नौकरी कहां गयी? पता चला कि जिसने 8 लाख रूपया नौकरी के लिए दिया था, उसने एक ‘बंधुआ मजदूर’ उस व्यक्ति को बना लिया, जिसने तृतीय या चतुर्थ श्रेणी की नौकरी पाने के लिए उससे कर्जा लिया था। इस प्रकार दिखने के लिए तो व्यक्ति को नौकरी मिल गयी, पर वास्तव में वह एक ‘बंधुआ मजदूर’ हो गया।
modi in noida


तब ऐसे ‘बंधुआ मजदूर’ बने सरकारी कर्मचारी नौकरी पर रहते भ्रष्टाचार फैलाते हैं। ये लोग कई बार अपने बड़े अधिकारी के लिए अनैतिक कार्य करते देखे जाते हैं। उनके लिए बाहर से ‘मुर्गे’ ढूंढ़-ढूंढक़र लाते हैं। उस ‘मुर्गे’ की ‘टांग पूंछ’ इन्हें भी मिल जाती है, जिससे ये लोग अपना काम चलाते हैं। ‘बड़े साहब’ की दलाली करना इनकी बाध्यता बन जाती है। कहने का अभिप्राय है कि यदि इन नौकरियों  पर नियुक्ति के समय पूर्ण पारदर्शिता अपनायी जाए तो व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। इस दिशा में प्रधानमंत्री की यह घोषणा मील का पत्थर सिद्घ होगी-ऐसी आशा की जानी अपेक्षित है। नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए केन्द्र सरकार को या किसी भी प्रधानमंत्री को अब से पूर्व ऐसी घोषणा कर देनी चाहिए थी। परन्तु चलिए यदि प्रधानमंत्री मोदी ने ही इस ओर देखने का समय निकाला है तो इससे उनके विषय में यही कहा जा सकता है कि मोदी छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान देते हैं और उन्हें ज्ञात है कि व्यवस्था का कौन सा पेंच कहां से कितना ढीला है या व्यवस्था के पेंचों को कहां-कहां से कसने की आवश्यकता है?

अब दूसरी बात पर आते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के आई.ए.एस. अधिकारियों को हटाने के लिए प्रधानमंत्री के अनुमोदन को आवश्यक बनाने के निर्णय की दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने यह कहकर आलोचना की है कि इससे आई.ए.एस. अधिकारी भाजपा की ‘बी’टीम बन जाएंगे। हमारा विचार है कि आई.ए.एस. की परीक्षाएं अखिल भारतीय स्तर की होती हैं, इसलिए उनके इस स्तर को बनाये रखने के लिए प्रधानमंत्री का यह निर्णय भी उचित ही है। शासन-प्रशासन की एक रूपता और समरूपता किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए आवश्यक और अपेक्षित होती है। यह तभी बन सकता है जब आई.ए.एस. अधिकारी किसी एक संवैधानिक पद के प्रति निष्ठावान है। इससे कोई प्रधानमंत्री स्वेच्छाचारी या निरंकुश नही बन जाता है, इसके विपरीत ऐसे निर्णय से भारत के संघीय स्वरूप को सुदृढ़ करने में सहायता मिलेगी। साथ ही आई.ए.एस. अधिकारियों को दलीय राजनीति का शिकार बनने से रोका जा सकेगा, वह किसी मुख्यमंत्री के हाथ की कठपुतली न होकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण के समक्ष उचित विवेक का शत-प्रतिशत प्रदर्शन करने के लिए स्वतंत्र होगा। वैसे आई.ए.एस. अधिकारियों के विषय में यह बात ध्यान देने की है कि देश के प्रधानमंत्री की जैसी बौद्घिक क्षमताएं और विवेकशक्ति होगी ये लोग उसी के अनुरूप कार्य करेंगे। यदि कोई प्रधानमंत्री बौद्घिक रूप से पंगु है तो उसकी इस अवस्था  का ये लोग लाभ उठाएंगे और यदि कोई प्रधानमंत्री बौद्घिक संपदा से संपन्न है और देश को एक दिशा देने की क्षमता और सामथ्र्य रखता है तो उसके साथ ये अपनी बौद्घिक क्षमताओं का चुपचाप विलीनीकरण या समायोजन कर लेंगे। हमें आशा करनी चाहिए कि हम भविष्य में बौद्घिक क्षमताओं से परिपूर्ण प्रधानमंत्रियों को ही देश की बागडोर अपने हाथ में लेते देखेंगे, जिनके साथ आई.ए.एस. अधिकारी अपना उत्तम समायोजन बनाकर चलेंगे। प्रधानमंत्री के इस निर्णय का व्यावहारिक और रचनात्मक पक्ष यही है।

अब आते हैं इस आरोप पर कि प्रधानमंत्री ने नोएडा में आकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 का बिगुल फूंका है तो यह आलोचना भी बलहीन है। उत्तर प्रदेश के 70 से अधिक जिलों के लिए इस प्रदेश के प्रवेश द्वार पर एक कार्यक्रम के आयोजन से पूरे प्रदेश की जनता प्रभावित और प्रसन्न होगी, यह मानना भूल होगी। कार्य करने हैं तो उनके लिए आयोजन भी होंगे ही और यदि उन आयोजनों को केवल चुनावी सभाएं सिद्घ करने का प्रयास किया गया तो अनुचित होगा। वैसे यदि किसी लोकतांत्रिक देश में जनमत को अपने अनुकूल बनाये रखने का प्रयास कोई पी.एम.करता है तो इसमें भी कोई दोष नही है, उसे अपना कार्य करके दिखाना है तो कुछ प्रदर्शन भी करना ही पड़ेगा। संवैधानिक मान्यताओं के विपरीत कुछ हुआ है तो केवल यह कि उत्तर प्रदेश में आये पी.एम. की सभा में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अनुपस्थित रहे। इससे यह सभा केवल भाजपा के  पी.एम. की बनकर रह गयी, भारत के पी.एम. की सभा यह तब बनती जब मुख्यमंत्री भी होते।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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