प्रकृति की पीड़ा

  • 2015-07-02 05:27:05.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

तेरे हृदय की ज्वाला, रही धधक गोली और गोलों में।
अपनी मृत्यु आप बंद की, परमाणु के शोलों में।

बढ़ रही बारूदी लपटें, निकट अब विनाश है।
मौत का समान ये, कहता जिसे विकास है।

यदि यही है विकास तो, पतन बताओ क्या होगा?
यदि यही है सृजन तो, विध्वंस बताओ क्या होगा?

सैनिक व्यय बढ़ रहा विश्व का, क्या इससे सृजन होगा?
बढ़ते परमाणु अस्त्र तो, सारा जहां निर्जन होगा।

प्रकृति भी रोएगी, अपनी मूक वाणी में।
रे दानव छिपकर बैठ गया था, मानव नाम के प्राणी में,

तेरे इस विकराल रूप का, परिचय देते हिरोशिमा नागासाकी
डेढ़ मिनट में स्वाहा हुआ सब, नही घास रही वहां पर बाकी।

पाषाण हुआ हृदय तेरा, क्यों पिघला नही उन आहों से,
जिन राहों पर चल कर गिरा गर्त में, फिर क्यों गुजर रहा उन राहों से
जानता है बातें सब तू, अतीत के इतिहास की।

विजेंदर सिंह आर्य ( 326 )

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