नारी को लेकर भारत का सनातन चिंतन

  • 2016-03-10 12:30:13.0
  • पूनम कुमारी

सिमोन द बोउवार ने कहा है कि साहित्य, संस्कृति, इतिहास व परंपराएं पुरुषों ने बनाए हैं, और पुरुषों ने अपने बनाए इस विधान में स्त्रियों को सर्वत्र दोयम दर्जा दिया है। भारतीय व पश्चिमी स्त्री-विमर्श को पढऩे-पढ़ाने तथा शोध के दौरान सिमोन के उक्त कथन की एक हद तक पुष्टि सी होती दिखी। लेकिन इसके अलावा ‘और भी कुछ’ है जो सिमोन की उक्ति से परे जाकर स्त्री-पुरुष के संबंधों और स्त्रियों की स्थिति (विशेषकर भारतीय स्त्रियों की स्थिति) को जानने-समझने के लिए जरूरी है। भारतीय परिदृश्य में स्त्री-पुरुष संबंधों, स्त्रियों की स्थिति और इसमें पुरुषों की भूमिका को समझने के लिए इस- ‘कुछ और’- से रूबरू होना ही पड़ेगा। इसको समझे बिना स्त्री-विमर्श के अनेक भारतीय पैरोकार भारत में स्त्रियों की स्थिति और पुरुषों के साथ उनके घात-प्रतिघात को पश्चिमी स्त्री-विमर्श की सैद्धांतिकी (जिसमें स्त्री-विमर्श की माक्र्सवादी अवधारणा भी शामिल है) के नजरिए से देखते हैं जिससे स्त्री-पुरुष संबंधों की मुकम्मल तस्वीर सामने नहीं आ पाती है।

निर्विवाद रूप से भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति अंतर्विरोधों से भरी हुई है। परंपरा से नारी को शक्ति का रूप माना गया है, पर आम बोलचाल में उसे अबला कहा जाता है। भारतीय समाज में स्त्री की इस विरोधाभासपूर्ण स्थिति की अनुगूंज ऋग्वेद की ऋचाओं से ही प्रारंभ हो जाती है जिसमें कहीं तो उसे अत्यंत श्रेष्ठ मानते हुए पूज्य बताया गया है, तो कहीं कामवासना का मूर्त रूप मानते हुए मुक्ति मार्ग में बाधक, त्याज्य और मूर्ख। मध्यकालीन भक्त कवियों कबीर, दादू, तुलसी, जायसी और सूर आदि (जिन्होंने अपने काव्य में मानुष सत्य को सर्वोपरि माना) के यहां भी स्त्री को लेकर अंतर्विरोधी उक्तियां विद्यमान हैं। आज भी हमारे समाज और साहित्य में कमोबेश स्त्री के प्रति यही अंतर्विरोधी रवैया मौजूद है। एक तरफ उसे देवी का स्थान दिया जाता है या यह कहा जाता है कि ऐसा स्थान हमारे धर्मग्रंथों ने उसे दिया है, और दूसरी तरफ उसे पुरुष पुरुष के पथभ्रष्ट का कारण भी माना जाता है। इन दो ध्रुवांतों के बीच इंसानी हकीकत कहां है?

गौरतलब है कि स्त्रियों के प्रति पुरुषों के इसी विरोधाभासपूर्ण रवैये के कारण भारत में स्त्री-विमर्श की पश्चिम से अलग सैद्धांतिकी की जरूरत है। ध्यान देने की बात है कि पश्चिम के धार्मिक कहे जाने वाले आदि ग्रंथों में स्त्रियों की वैसी विरोधाभासपूर्ण स्थिति नहीं रही है जैसी भारत में। उनमें स्त्रियों की स्थिति स्पष्ट है- पुरुषों से कमतर, दोयम। उनमें स्त्री को कहीं भी देवों के समकक्ष देवी का दर्जा नहीं दिया गया। बल्कि चर्च से जुड़ी महिलाओं में ग्यारहवीं शताब्दी की हिल्डेगार्ड और पंद्रहवी शताब्दी की जुलियन ने ईश्वर को मां के रूप में प्रस्तुत कर स्त्री के गुणों के प्रति लोगों में सम्मान जगाने का प्रयास किया।
भारत का सनातन चिंतन


माग्र्रे केम्पे (इन्हें अंग्रेजी की पहली आत्मकथा लेखिका होने का गौरव प्राप्त है) ने ईश्वर को प्रेमी अथवा अत्यंत प्रिय मित्र के रूप में चित्रित किया। एमिलिया लन्यर ने 1611 ई. में अपने पाठकों को बताया कि क्राइस्ट का जन्म स्त्री से हुआ, उनका पालन-पोषण भी स्त्री ने किया। उन्होंने न केवल स्त्री की आज्ञा का पालन किया बल्कि स्त्रियों के दुख-दर्द को बांटा। इस प्रकार क्राइस्ट को मां, पति तथा हमदर्द के रूप में प्रस्तुत कर स्त्रियों ने समाज में अपने लिए एक सम्मानजनक स्थान की मांग की। एक ऐसा सम्मानजनक स्थान जो भारतीय स्त्रियों को (विरोधाभासपूर्ण या व्यावहारिक धरातल पर लगभग छद््म होते हुए भी) पहले से ही प्राप्त था। अतीत में ही नहीं, आधुनिक युग में भी पश्चिम में स्त्री अधिकारों की सारी लड़ाइयां स्त्रियों द्वारा खुद लड़ी गईं। उनका प्रतिपक्ष स्पष्ट था- पुरुष वर्ग, जो स्त्री-सरोकारों की लड़ाई में सबसे बड़ा बाधक था। पश्चिम में स्त्री-शिक्षा के लिए महिलाओं ने जो मुहिम चलाई उसमें बॉथ्सुआ माकिन, माग्र्रेट कैवेंडिश, मेरी ऑस्टेल, कैथरीन मैकाले और मेरी वॉलस्टोनक्राफ्ट का नाम प्रमुख है। ‘सबके लिए शिक्षा’- पश्चिमी स्त्रियों की इस मुहिम में वहां के पुरुष समुदाय में से कोई भी सामने नहीं आया।

बाद में चल कर पश्चिम में उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में दो पुरुष सामने आए- विलियम थॉमस और जॉन स्टुअर्ट मिल- जिन्होंने स्त्री-अधिकारों की लड़ाई में न केवल उनका साथ दिया बल्कि बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। विलियम थॉमस ने ‘अपील ऑफ वन हाफ ऑफ द ह्यूमन रेस’ (1825) में विवाहित स्त्रियों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला। जॉन स्टुअर्ट मिल ने ‘द सब्जेक्शन ऑफ वुमन’ (1869) में बताया कि स्त्रियों की अधीनता न केवल गलत है बल्कि संपूर्ण मानव समुदाय की उन्नति में बाधक है। इन दो नामों के अतिरिक्त पश्चिमी समाज में स्त्री सरोकारों की लड़ाई में उस समय और कोई नाम शायद नहीं मिलता है। दूसरी ओर भारत में आधुनिक युग में स्त्री सरोकारों की सारी लड़ाइयां एक मुहिम के रूप में नवजागरण काल के पुरुष समाज सुधारकों द्वारा शुरू की गईं। राजा राममोहन राय, मृत्युंजय विद्यालंकार, जोतिबा फुले, ईश्वरचंद विद्यासागर, बेहराम मलबारी, महादेव रानाडे आदि ने स्त्रियों से जुड़े लगभग हर मुद््दे को उठाया और स्त्रियों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास किया। ऐसा नहीं है कि स्त्री-अधिकारों के लिए तत्कालीन लड़ाई में स्त्रियां मूकदर्शक बन कर खड़ी थीं और उनकी सारी लड़ाइयां पुरुष ही लड़ रहे थे।

हमारे पास नवजागरणकालीन ऐसे स्त्री नामों की लंबी सूची है जो उस समय की तमाम सीमाओं के बावजूद पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था के व्यूह को तोड़ कर न केवल अपनी लड़ाई लड़ती हैं बल्कि पूरी स्त्री जाति के लिए संघर्ष करती हैं। इन नामों में रमाबाई रानाडे, पंडिता रमाबाई सरस्वती, नवाब फेजुनेसा चौधरानी, सावित्री फुले, रुक्या, सरोजनी नायडू, ज्योतिर्मयी देवी, अबला घोष आदि का नाम प्रमुख है। निश्चय ही भारतीय और पश्चिमी समाजों में स्त्री सरोकारों के संबंध में पुरुषों की भूमिका भिन्न है- पश्चिम में यह मुहिम स्त्रियों द्वारा शुरू की गई जिसको बहुत बाद में दो पुरुषों का साथ मिला, जबकि भारत में स्त्री सरोकारों की सैद्धांतिक और व्यावहारिक लड़ाई पुरुषों द्वारा शुरू की गई जिसमें स्त्रियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। ऐसे में स्त्री-विमर्श के पश्चिमी मॉडल से भारतीय स्त्री-विमर्श को कैसे समझा जा सकता है?

स्त्री-विमर्श की पश्चिमी सैद्धांतिकी से उधार लेकर भारत में स्त्रियों की स्थिति और स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता को उजागर करने की कोशिश में ही भारतीय स्त्रियों की और उनके साथ पुरुषों की भी ऐसी तस्वीर सामने आती है जो पूर्णतया सही प्रतीत नहीं होती। हर देश में स्त्री संघर्ष का अपना इतिहास है जो अपने लिए एक अलग सैद्धांतिकी की मांग करता है। इसके आधार पर ही वहां के स्त्री-विमर्श को समझा जा सकता है और इस बात को स्त्री-विमर्श के अनेक पैरोकारों ने बहुत पहले ही महसूस कर लिया था।

यहां जिक्र करना जरूरी है कि 1960-70 के दशक में पश्चिम के नारीवादियों का प्रिय नारा था ‘सिस्टरहुड इज पावरफुल’। निश्चय ही इस नारे ने एक स्त्री को दूसरी स्त्री से जोड़ा। इसने वर्ग, नस्ल, भाषा और देश की सीमाओं से अलग हर स्त्री को स्त्रीत्व की नियति से जोड़ कर देखा। लेकिन आगे चल कर 1983 में अश्वेतअमेरिकी कवयित्री ऑडरे लॉड्रे, 1995 में चीनी मूल की आस्ट्रेलियाई नारीवादी ऐन ऑग ने कहा कि वर्तमान नारीवादी आंदोलन में श्वेत मध्यवर्गीय महिलाओं का दबदबा है और इन महिलाओं का सारा ध्यान लिंग-भेद के अंतर पर केंद्रित होता है, जबकि नस्ल और वर्ग भी महिलाओं की स्थिति को बहुत प्रभावित करते हैं। ब्राजील की महिलाओं ने इन आंदोलनों को यूरोप-केंद्रित बताते हुए कहा कि इनका औरतों की स्थानीय समस्याओं, नस्ली हिंसा तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से कुछ लेना-देना नहीं है। अश्वेत महिलाओं से काम के दौरान जो भेदभाव बरता जाता है, नारीवादियों का उससे कोई लेना-देना नहीं है।
-पूनम कुमारी

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