मौहम्मद तुगलक के फरमान

  • 2015-12-09 01:30:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

दिल्ली की जनता को अब अपनी गलती की अनुभूति होने लगी है, कि उसने ‘आम आदमी पार्टी’ को विधानसभा चुनाव में प्रचण्ड बहुमत देकर अच्छा नही किया।

इतिहास की पुस्तकों में एक मौहम्मद तुगलक के बारे में बहुत पढ़ा जाता है, कई लोग उसे पागल सिद्घ करने का प्रयास करते हैं तो कई उसे समय से आगे चलकर देखने वाला महाबुद्घिमान सिद्घ करने का प्रयास करते हैं। हमें इस बहस में नही पडऩा कि मौहम्मद तुगलक पागल था या महाबुद्घिमान था, हमें केवल यह देखना है कि उसकी नीतियां जनहित के लिए कितनी उपयोगी सिद्घ हुईं या हो सकती थीं? जब इस पर विचार करते हैं तो उसके मूर्खतापूर्ण निर्णयों और नीतियों में उसकी दिल्ली से देवगिरि ले जाकर राजधानी बसाने के निर्णय पर  सर्वप्रथम दृष्टिपात करना उचित होगा। सुल्तान ने राजधानी का परिवर्तन किया, केवल इस बात को लेकर कि दिल्ली में उसे लोग रहने देना नही चाहते थे, जिन लोगों को उसके यहां बने रहने से घृणा थी वही हिन्दू लोग पत्थर के साथ कागज बांधकर उसके महल में फेंकते थे, जिस पर लिखा होता था कि केवल सुल्तान ही पढ़े। सुल्तान उस पत्र को पढ़ता और झुंझलाकर रह जाता। पत्र में लिखा होता था कि दिल्ली को जल्दी छोड़ दो। अन्यथा हम तुम्हें नही छोड़ेंगे। अंत में दु:खी होकर बादशाह ने दिल्ली छोड़ दी। पर अनिवार्य शर्त लगा दी कि सभी दिल्लीवासी देवगिरि चलें।

जब सुल्तान देवगिरि पहुंचा तो वहां के लोगों ने भी उसका वहां जीना हराम कर दिया। तब उसे बैरंग दिल्ली के लिए लौटना पड़ा। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गये, उनके मरने का पाप इतिहास के किसके सिर बांधेगा? निश्चित रूप से सुल्तान के लिए ही यह पाप मिलना चाहिए। पर सुल्तान ने अपने जीते जी इस पाप का कोई प्रायश्चित ही नही किया था। क्योंकि वह सुल्तान था, और सुल्तान अपराधबोध या पापबोध से ऊपर होते हैं। आज दिल्ली का ‘सुल्तान’ दिल्ली में जब वाहनों के सम-विषम नंबरों के आधार पर लोगों को राजधानी में वाहन चलाने का कानून बनाना चाह रहा है, तो सारा देश उसे दूसरा ‘तुगलक’ मानकर उसका उपहास उड़ा रहा है।

दिल्ली में एक समाजसेवी अन्ना आया, जिसने भ्रष्टाचार के विरूद्घ आंदोलन चलाया, जिसमें कई ‘सडक़ छाप’ रातों-रात नेता बन गये। ये ऐसे नेता थे जिन्हें ये भी नही था कि यदि तुम दिल्ली के सुल्तान बन गये तो तुम्हारे कपड़े कैसे होंगे? जनता ने उनके मफलर, स्वेटर, पैंट, शर्ट, बोलने की शैली सब पर टिप्पणी कीं, पर उन पर कोई प्रभाव नही पड़ा। ये रातों-रात नये-नये सब्जबाग दिखाने की तैयारी करते और सुबह सुबह जनता के नाश्ते की प्लेट में उन्हें बड़ी खूबसूरती से परोस देते थे। कुछ दिन में जनता इनके मफलर, स्वेटर आदि को भूलने लगी और इनके द्वारा नाश्ते में परोसे जाने वाले सब्जबागों को चटकारे के साथ खाने लगी। जैसे-जैसे जनता इन्हें खाती गयी वैसे-वैसे ही  ‘मौहम्मद तुगलक’ का जादू जनता के सिर चढक़र बोलने लगा।

इसी परिवेश में चुनाव हुए। पहले चुनाव में ‘मौहम्मद तुगलक’ सत्ता से कुछ दूर खड़ा रह गया। देश के संवेदनशील लोगों को लगा कि दोबारा यदि चुनाव हुए तो इस ‘मौहम्मद तुगलक’ को जनता विदा कर देगी। पर ऐसा हुआ नही। ‘मौहम्मद तुगलक’ ने और भी जोरदार ढंग से सपने बेचे और जनता का मूर्ख बनाने में सफल हो गया। जनता ने प्रचण्ड से भी प्रचण्ड बहुमत देकर और विपक्ष का लगभग सफाया करके दिल्ली ‘मौहम्मद तुगलक’ की थाली में रखकर उसे परोस दी।

अब ‘मौहम्मद तुगलक’ अपने शाही फरमानों को जो उसने सब्जबागों के रूप में जनता के सामने परोसे थे, फाड़-फाडक़र फेंक रहा है। जनता को समझ में आने लगा है कि दिल्ली विधानसभा में विपक्ष का सफाया करके उसने अपनी थाली से क्या-क्या छीन लिया है? विधायकों का वेतन ‘आप’ सरकार ने दो लाख पैंतीस हजार रूपया कर दिया है, इतना वेतन हमारे देश के प्रधानमंत्री का भी नही है। जो व्यक्ति भ्रष्टाचार के विरूद्घ लड़ रहा था, और जनलोकपाल की बात करता था, उसने जनलोकपाल भी ऐसा दिया है कि जिसे देखकर लोगों ने बोलना और कहना आरंभ कर दिया है, कि यह जनलोकपाल नही अपितु ‘जोकपाल’ है। इस ‘जोकपाल’ ने केजरीवाल का वास्तविक चेहरा जनता के सामने ला दिया है, कि उन्हें जनहितकारी लोकपाल लाने में कोई रूचि नही थी। देश की राजधानी के निवासियों की समस्याएं ज्यों की त्यों हैं, और बहुत जल्दी लोग शीला दीक्षित के शासन को याद करने लगे हैं। यदि लोगों की मानसिकता ऐसी बनती जा रही है तो स्पष्ट है कि उन्हें केजरीवाल मुख्यमंत्री के रूप में पसंद नही आए हैं।

देश की राजनीति ठगों की बस्ती बनकर रह गयी है। यहां वही व्यक्ति बड़ा जादूगर माना जाता है जो जनता की आंखों में धूल झोंककर या उनको मूर्ख बनाकर मौज उड़ाने में पारंगत हो। ठगों की यह बस्ती बड़ी सफाई के साथ ठगी का काम करती है, और इसका चमत्कार देखिए कि प्रजा के बीच रहने वाले ठगों को यह महाठगिनी दंड देने का दंभ भरती है। जिसका अपना दामन साफ नही, जिसकी अपनी नींव छल, फरेब, ठगी और बेईमानी पर टिकी हो वही दूसरों के महलों की नींव नापती है? यह व्यापार झूठ का व्यापार है जिसे अधिक देर तक नही चलाया जा सकता। पर बड़ी सफाई के साथ राजनीति के जादूगर इस देश को सपने बेच-बेचकर पिछले 68 वर्ष से ठग रहे हैं।

केजरीवाल के राजनीति उसी राजनीति का एक अंग है जिसे हम ‘महाठगिनी’ कह रहे हैं। जिस संविधान की शपथ लेकर केजरीवाल और उन जैसे अन्य नेता देश के जिम्मेदार पदों पर विराजमान होते हैं वही लोग संविधान की धज्जियां उड़ाते हैं और बड़ी शान से कहते हैं कि-‘‘सारे जहां से हिंदोस्तां हमारा।’’ ये लोग ऐसा इसलिए कहते हैं कि क्योंकि जितनी मौज इनकी हिंदुस्तान में है इतनी कही भी किसी भी देश के राजनीतिज्ञ की नही है। जहां केवल मौज ही मौज हों और एक घंटे में वेतन चार सौ गुना बढ़ा देने की छूट हो वहां से बढिय़ा स्वर्ग और कहां होगा?

वास्तव में देश की जनता इस समय राजनीति, राजनीतिज्ञ, राजनैतिक मूल्य और राजनीतिक व्यवस्था सभी की पूर्ण समीक्षा चाहती है। इसके लिए ‘तुगलकी फरमान’ जारी करने वाले सुल्तानों को वह सबसे पहले समीक्षित करना चाहेगी, क्योंकि यह वही लोग थे जिन्होंने नई व्यवस्था  देने का वचन लोगों को दिया था, और यही लोग आज पुरानी व्यवस्था को तार-तार कर रहे हैं, इस पाप का ‘भागी’ कौन होगा? केजरीवाल उत्तर दें।