मोदीजी रोगी का सही उपचार करो

  • 2016-04-23 05:30:07.0
  • राकेश कुमार आर्य

मोदीजी

देश में लोकतंत्र नाम की चिडिय़ा न जाने कब की उड़ चुकी है। राजनीति अब राजनेताओं की जननी नही रही है। अब यहां निहित स्वार्थों की पूत्र्ति का खेल खेलने वाले तीसरी चौथी पंक्ति के राजनीतिज्ञ दिखाई देते हैं। देश की समस्याओं का समाधान करने का समय आज की राजनीति के पास नही है। राजनीतिज्ञों का अधिक समय एक दूसरे का उपहास उड़ाने तथा एक दूसरे को नीचा दिखाने में व्यतीत हो जाता है। रचनात्मक चिंतन और रचनात्मक भाषण कला का लोप होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में भविष्य में यदि देश में लोकतंत्र को उखाडक़र कोई तानाशाह आ जाए तो कोई गलती नही होगी। कारण कि शासन के प्रति असावधानी, कत्र्तव्य में चूक, वाणी में असंतुलन समस्याओं से मुंह चुराने की प्रवृत्ति और निहित स्वार्थों को राष्ट्र हितों पर प्राथमिकता देने क ी राजनीतिज्ञों की मानसिकता किसी सैनिक तानाशाह के निर्माण की परिस्थितियां हैं। समय रहते यदि चेतने का प्रयास नही किया गया तो कुछ भी परिणाम आ सकता है। जब से केन्द्र में मोदी सरकार आयी है, तब से कांग्रेस का व्यवहार कुछ अधिक ही असंतुलित और असहिष्णुता वाला हो गया है संसद को न चलने देने की इस संगठन ने लगभग सौगंध ही उठा ली सी लगती है। अब यह तो राजनीति ठहरी, इसमें जो जैसा करता है उसके नहले पे दहला मारने की तैयारी तुरंत की जाती है। राहुल गांधी के रणनीतिकार संसद में मोदी को असहाय बना देखकर प्रसन्न हो रहे थे और मान रहे थे कि उनकी जीत हो गयी है। आजादी से पहले तो सरकारी कार्यों में विधानमंडलों में पहुंचकर अडंग़ा डालने की देशबंधु चितरंजनदास की नीति की कांग्रेस आलोचक थी, पर अब अचानक एक शताब्दी पश्चात राहुल गांधी की कांग्रेस विधायी कार्यों में अड़ंगा डालने की समर्थक हो गयी है। कहने का तात्पर्य है कि जो कांग्रेस क्रूर विदेशी सत्ताधीशों को सहन करके अपने धैर्य का परिचय दे सकती थी वही अब अपनों को ही सहन नही कर पा रही है। इसे आप क्या कहेंगे, नेतृत्व की दुर्बलता या राजनीति का पतन?

राहुल गांधी के रणनीतिकार मोदी की असहायावस्था पर ताली मारकर हंसें, भला यह मोदी के रणनीतिकारों को कहां पसंद था? इसलिए बड़ी गोपनीयता से खेल खेला गया और कांग्रेस के राहुल गांधी के नौसिखियेपन को घेरने के लिए उत्तराखण्ड का नाटक रच दिया गया। अब राहुल को ‘नानी याद’ आ गयी। ‘पप्पू’ की झल्लाहट पर कुछ प्रतिबंध लगा। उसे लगा कि जिन पर प्रहार किया जा रहा है उनके पास भी बुद्घि है और जिन्हें फंसाया जा रहा है वे अपनी शतरंजी चालों से तुझे भी घेर सकते हैं। राजनीति इसी को कहते हैं कि जब अपने विपक्षी की शक्ति का आप लोहा मान लें और जब आप अपने विपक्षी को नि:शस्त्र कर मौन साध लेने के लिए बाध्य कर दें।

पर इस प्रकार की राजनीति की अपनी सीमाएं हैं। कुशल राजनीतिज्ञ वही होता है जो अपने विपक्षी को घेर भी ले, गिरा भी दे, पर राष्ट्रहित को कोई चोट ना पहुंचे। नि:संदेह ऐसी राजनीति नेहरूजी के साथ ही देश से विदा हो गयी थी। आज की राहुल की राजनीति पर यदि विचार किया जाए तो कांग्रेस ने अब तक विधायी कार्यों में अड़ंगा डाल डालकर तथा संसद की कार्यवाही में व्यवधान डालकर देश का बहुत बड़ा अहित किया है। इसी प्रकार एक चलती हुई सरकार को ‘चलता करके’ भाजपा ने भी देशहितों के साथ खिलवाड़ किया है। हरीश रावत को विधि द्वारा स्थापित व्यवस्था के अनुसार विधानसभा में अपना बहुमत सिद्घ करने का समय मिलना ही चाहिए था। अपनी राजनीति करते-करते आप देश के संविधान की उपेक्षा कर दें, यह लोकतंत्र नही है। हां, लोकतंत्र के साथ ‘क्रूर उपहास’ इसे अवश्य कहा जा सकता है।
उत्तराखण्ड के उच्च न्यायालय ने देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की उपेक्षा न करके देश के संविधान की रक्षा करने का सराहनीय कार्य किया है। अब देखना यह है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय इस विषय में देश की राजनीति को क्या दिशा निर्देश देता है? मा. सर्वोच्च न्यायालय का चाहे जो निर्णय हो एक बात तो अब जनता के मन में रह रहकर उठती है कि क्या हमारे राजनीतिज्ञों को संविधान का ज्ञान नही है कि ऐसा करोगे तो यह असंवैधानिक होगा या वे केवल शतरंजी चालों को चलते रहने में ही व्यस्त और मस्त हैं। कुछ भी हो देश की राजनीति की ऐसी स्थिति ही हम सबके लिए बेचैनी उत्पन्न करने वाली है।

देश के प्रधानमंत्री मोदी से देश का शिक्षित और चिंतनशील वर्ग ऐसी, अपेक्षा नही करता है कि वे इंदिरा गांधी की गलतियों को दोहराकर अपने आपको अपयश का भागी बनायें। इतिहास अपने आपको दोहराता नही है, परंतु जब कोई इतिहास नायक किन्हीं विषम परिस्थितियों में फंसता है तो वह अपने पूर्ववर्ती इतिहास नायक का अनुकरण करने लगता है। मानव की यह दुर्बलता है कि वह जैसे ही कहीं फंसता है वैसे ही सोचने लगता है कि ऐसी परिस्थितियों में जब मेरे पिता या मेरे बड़े भाई फंसे थे तो उन्होंने ऐसा किया था तब वह तुरन्त वैसा ही कर बैठता है। यह नही सोचता कि तेरे पिता या बड़े भाई के ऐसा करने की आलोचना कितना हुई थी? लोग इसी प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति को ‘इतिहास अपने आपको दोहराता है’ ऐसा कह देते हैं। यदि हम इतिहास को सही संदर्भ में पढ़ें, समझें तो इतिहास अपयश की पूर्व घटनाओं को दोहराने से हमें रोकता है और कहता है कि सावधान! इस रास्ते से यदि निकलने की भूल की तो प्रायश्चित के अतिरिक्त कुछ हाथ न आएगा। अपयश को दोहराने का अभिप्राय है कि इतिहास के ‘प्रेयमार्ग’ का पथिक हो जाना और विचारपूर्वक विवेकशीलता से कार्य करने का अभिप्राय है इतिहास के श्रेयमार्ग का पथिक हो जाना, पीएम मोदी को देश दूसरे मार्ग पर चलता देखना चाहता है। राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता पर कार्य किया जाए, राबर्ट वाड्रा के घोटालों पर कार्य किया जाए। पी. चिदंबरम की राष्ट्रघाती सोच को नंगा किया जाए, इशरत जहां के विषय में कांग्रेसी घात को जनता के सामने लाया जाए कांग्रेस के भ्रष्टाचार से देश को हुई क्षति को सामने लाया जाए, कांग्रेस द्वारा विधायी कार्यों में व्यवधान डालने से देश को हो रही क्षति से देश को अवगत कराया जाए, देश के कालेधन को देश से बाहर ले जाने में कांग्रेस कैसे व्यस्त रही और वह कालाधन कहां-कहां कैसे-कैसे कैसे भेजा गया? इस पर कार्यवाही की जाए, उसकी सूची में संलिप्त नामों को देश को बताया जाए इत्यादि अनेकों ढंग से कांग्रेस को घेरा जा सकता है। कांग्रेस के पास इस समय नेता का अभाव है। भाजपा के लिए कांग्रेस की यह दुर्बलता ऊर्जा देने वाली है पर इसे भाजपा अपना सौभाग्य मानकर किसी प्रमाद के प्रदर्शन से स्वयं को बचाये अन्यथा इस देश की जनता अयोग्यों को भी योग्य बनाकर अपना नायक बना लेती है। भाजपा का नेतृत्व समझ ले कि केवल वही सर्वाधिक योग्य नही है। जब देश की जनता करवट लेगी तो भाजपा की ‘फीलगुड’ को थोड़ी सी देर में उतार देगी। मोदीजी निस्संदेह एक कुशल वैद्य हैं, उन्हें ‘रोगी’ का सही उपचार करना ही होगा।

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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