मोदी की कूटनीति और विदेश नीति-भाग-1

  • 2015-12-12 01:30:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

modi shriपिछले दिनों संसद में हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया था कि विपक्ष उनकी विदेश यात्राओं को लेकर उन पर व्यंग्य कसता है और उनकी सभी विदेश यात्राओं का उपहास उड़ाते हुए उन्हें निरर्थक सिद्घ करने का प्रयास करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद को यह भी बताने का प्रयास किया था, वह विदेशों में जाकर कैसे अपनी व्यस्तताओं में से भी उन रचनात्मक लोगों से मिलने का समय निकाल लेते हैं, जिनके अनुभवों से हमारे देश के मजदूरों, कृषकों और युवाओं का भला हो सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक लगभग ढाई दर्जन विदेश यात्राएं की हैं, उनकी विदेश यात्राओं को लेकर जो लोग आलोचना कर रहे हैं, उनकी आलोचना का एक कारण यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी बहुत अधिक कार्य करते हैं, जिससे नौकरशाही और मंत्रियों में कार्य के प्रति लगन बढ़ी है, उच्च स्तर पर अब आपको ‘टरकाऊ और लटकाऊ’ बातें करते हुए अधिकारी या मंत्रीगण दिखाई नही देंगे।  जिस देश में ‘टरकाऊ और लटकाऊ’ भाषा को सुनते-सुनते लोगों के कान पक गये थे, उसमें इतना सुधार आना एक स्वस्थ संकेत है। मनमोहन सरकार में किसी की भी कोई जिम्मेदारी नही थी इसलिए सर्वत्र गैर जिम्मेदारी का परिवेश बन चुका था।

सऊदी अरब की सरकार को भारत की मोदी सरकार इस बात के लिए मनाने में सफल रही कि वह कच्चे तेल पर ऑन टाइम डिलीवरी वन प्रीमियम चार्ज न लगाये। इस महत्वपूर्ण समझौते पर देश के युवा तेलमंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी सऊदी अरब की यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किये। इस अकेले समझौते से ही हमारे देश को हजारों करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत हुई। जिसका प्रभाव आज नही तो कल अवश्य दिखाई देगा और अंतत: देश का जनसाधारण भी उससे लाभान्वित होगा। भारत ने चार जल विद्युत पावर प्लांट और बांध भूटान में बनाने का निर्णय लिया है। ऊपरी तौर पर देखने से ऐसा  लगता है कि इससे भारत का क्या लाभ होगा? परंतु वास्तविकता यह है कि इस विद्युत पावर प्लांट और बांध से भारत को ग्रीन ऊर्जा का बहुत बड़ा भाग मिलेगा जिससे भारत अपना विकास करने में भी सफल होगा।

भारत नेपाल में रूचि दिखा रहा है, और बड़े शांतमन से  वह इस देश को अपना ही भाई समझकर इसके विकास के लिए $कृत संकल्प है, इसीलिए भारत नेपाल में सबसे बड़ा बांध बनाएगा। अब से पूर्व नेपाल से इस प्रोजेक्ट को पाने के लिए चीन भरसक प्रयास करता रहा था। भारत को इस बांध से बनने वाली बिजली का 83 प्रतिशत  भाग नि:शुल्क मिलेगा। जिससे हमें भविष्य में लाभ मिलना निश्चित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रहते जापान से भारत के संबंध और भी प्रगाढ़ हुए हैं और जापान सरकार ने भारत में बीस अरब डॉलर दिल्ली-मुंबई इनवेस्टमेंट काॉरिडोर परियोजना में लगाने का समझौता किया है।  प्रधानमंत्री ने वियतनाम से कूटनीतिक संबंध बढाये हैं, इस प्रकार चीन के भविष्य के उद्देश्यों को निष्फल करने के दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को नेपाल से लेकर वियतनाम तक अपने मित्रों से घेरने का सफल कूटनीतिक प्रयास किया है। इसे चीन को कितनी पीड़ा हो रही होगी यह केवल वही जानता है। वियतनाम ने भारत की तेल कंपनी ओएनजीसी विदेश से तेल खोजने का समझौता किया है, जबकि संप्रग की मनमोहन सरकार इस समझौते को चीन के दबाव में करने को तैयार नही थी। लेकिन जब साहसिक निर्णय लेने वाले राजनीतिज्ञ नेता के रूप में किसी देश को मिलते हैं, तो ऐसे निर्णय ले ही लिये जाते हैं।

अमेरिका के प्रतिबंध के उपरांत भी भारत द्वारा ईरान से तेल का अधिक आयात किया गया है। ईरान हमें भारतीय मुद्रा में तेल का निर्यात करता है, जिससे हम विदेशी मुद्रा बचा पाते हैं। इस प्रकार की मुद्रा के आने से या बचाने से हम डॉलर के उतार-चढ़ाव के प्रभाव से बच जाते हैं। भारत ने यहीं पर एक और भी ऐसी उपलब्धि प्राप्त की है जो उसके लिए सैन्य दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है, और वह है कि भारत को चबहार बंदरगाह के निर्माण का आदेश मिला है, इससे भारत पाकिस्तान को घेरने में सफलता प्राप्त कर सकेगा, क्योंकि जब ये बंदरगाह  बनकर तैयार हो जाएगा तो हमारी सेना के पोतों को यहां जाने की अनुमति होगी।

नरेन्द्र मोदी ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी अब्बोट को भारत को यूरेनियम सप्लाई करने के लिए मनाने में सफल रहे हैं। आज के समय में जब हमारा परंपरागत शत्रु पाकिस्तान परमाणु बम धड़ाधड़ बना रहा हो और हमें परमाणु युद्घ की धमकी देकर धमकाने की या हमें ब्लैकमेल करने का प्रयास कर रहा हो तब प्रधानमंत्री का यह निर्णय उनकी दूरदृष्टि और कूटनीतिक सफलता का द्योतक है। आज ऑस्टे्रलिया भारत को विद्युत उत्पादन के लिए यूरेनियम की सप्लाई करने पर सहमत है। इससे भी हमारे देश की उन्नति में बहुत सहयोग मिलने की संभावना है। जिसके लाभ हमें कुछ ही समय में दिखाई देने लगेंगे।

श्रीलंका में पिछले दिनों चुनाव हुए तो वहां राष्ट्रपति राजपक्षे चुनाव हार गये, जिनका झुकाव चीन की ओर रहा है। सीआईए की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि राजपक्षे को चुनाव हराने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। स्पष्ट है कि ऐसा केवल इसलिए किया गया है कि चीन को हमें घेरने से निषिद्घ किया जा सके। हमें स्मरण रखना होगा कि यूपीए सरकार ने हम्बनटोटा बंदरगाह की परियोजना को चीन को जाने दिया था। इस परियोजना से आज चीन ने हाथ खींच लिये हैं और अब इस परियोजना को भारत के प्रोजेक्ट प्रबंधक देख रहे हैं। इस प्रकार  चीन को भारत के बदले हुए नेतृत्व के गुणों का और साहस का परिचय मिल गया है। इसलिए वह अब देखकर और सोच-समझकर भारत से हाथ मिलाने की बात करता है। चीन का व्यापारिक घाटा बहुत बढ़ रहा था, नरेन्द्र मोदी ने चीन को विवश किया कि एनटी डंपिंग लगाई जाएगी, इसलिए चीन को चाहिए कि वह भारत में पैसा लगाए, परिणामस्वरूप चीन बीस अरब का निवेश भारत में करने के लिए कह चुका है। कहने का अभिप्राय है कि शत्रु को कूटनीतिक और साहस भरे अंदाज में भारत के नेतृत्व ने जितना इस समय शिकंजे में कस रखा है, उतना उसे पूर्व कभी नही कसा गया था।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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