मोदी का मौन और आजम

  • 2015-11-20 02:30:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार के कैबिनेट मंत्री आजमखां इस समय कुछ अधिकही तल्ख हैं। उनके व्यंग्य बाण रोके नही रूक रहे हैं। सपा की अखिलेश सरकार उनके सारे नाटक को मौन होकर देख रही है। उसकी चुप्पी में तटस्थ भाव न होकर ‘आपराधिक भाव’ अधिक झलक रहा है। सारे छद्म धर्मनिरपेक्षी दलों की ‘असहिष्णुता’ इस समय सिर चढक़र बोल रही है। उन्हें केन्द्र में मोदी की सरकार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नही है। जो लोग कल परसों तक केन्द्र से कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान कर रहे थे, वही अब कांग्रेस सरकार का गुणगान कर रहे हैं। दोरंगी राजनीति और दोगला चरित्र सचमुच भारतीय राजनीतिज्ञों से ही सीखा जा सकता है।

आजम अपनी आलोचना की सीमाएं लांघ रहे हैं, वह संघ के लोगों को जाहिल कर रहे हैं। मुल्क में आतंक पनपा तो उसके लिए मोदी जिम्मेदार होंगे, ऐसे धमकी भरे बयान देकर यह सिद्घ कर रहे हैं कि-‘उनके आतंकवादियों से गहरे संबंध हैं।’ मोदी इस सारी स्थिति पर मौन हैं। पता नही उनकी बाध्यता क्या है और क्यों वह इस ‘शिशुपाल’ की गालियों की गिनती करते-करते समय व्यतीत कर रहे हैं?

भारतीय राजनीतिज्ञों और राजनीति का यह दोष रहा है या कहिए कि उनके चरित्र का एक संस्कार रहा है कि ये किसी भी ‘राष्ट्रद्रोही’ के विरूद्घ समय पर कार्यवाही नही करते हैं। समाज में शांति के परिवेश में आग लगाना और घृणा फैलाना आजम का प्रमुख कार्य हो गया लगता है इसलिए वह जो चाहें बोल जाते हैं। पर उन्हें पता होना चाहिए-

‘‘छोडऩे पर मौन को वाचाल होते देखा है,
तोडऩे पर आइने को काल होते देखा है।
मत करो ज्यादा हवन तुम आदमी के खून से,
जलने पर कोयले को लाल होते देखा है।।’’

आदमी के खून से हवन करना मानवता के विरूद्घ अपराध है। आजमखां ने मुजफ्फरनगर दंगों में जैसी भूमिका निभाई थी उसका सारा कच्चा चिट्ठा लोगों के सामने आ चुका है, बिसाहड़ा की घटना की जिम्मेदारी भी प्रदेश सरकार की थी, परंतु भाजपा के मौन ने सारा खेल बिगाड़ दिया और इसने बिसाहड़ा का सारा खेल अपने ऊपर ले लिया। अब आजम का कहना है कि इखलाक के परिजनों को 45 लाख तथा अलीगढ़ के गौरव को दस लाख देने में भी अंतर है। उनके अनुसार दादरी की घटना एक कलंक थी और अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने जैसा कलंक थी, जबकि अलीगढ़ का मामला कलंक नही है।

सपा के प्रमुख मुलायम सिंह अपने इस बड़बोले नेता के बयानों को लेकर सदा शांत रहते हैं। उन्हें कुर्सी चाहिए और उसके लिए वोटों का समीकरण चाहिए। उस समीकरण को सपा के पक्ष में मुस्लिम मतों का धु्रवीकरण करके अपने व्यंग्यपूर्ण शब्द बाणों से आजम जैसे लोग ही बनाते हैं। इन्हें सत्ता चाहिए और सत्ता के लिए वोटों का धु्रवीकरण भी आवश्यक है। जिसे केवल मोदी को मुस्लिम विरोधी सिद्घ करके ही बनाया जा सकता है। वैसे मोदी को भी यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि  देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता से दुखी हिंदू जनता ने उन्हें देश की बागडोर जब सौंपी थी तो उसका उद्देश्य यही था कि मोदी देश की इस समस्या से लोगों को मुक्ति दिलाएंगे पर प्रधानमंत्री बनने के पश्चात मोदी भी तुष्टिकरण की उसी नीति पर चले पड़े हैं जो पहले की कांग्रेसी सरकारें करती रही हैं। पाकिस्तान की प्रसिद्घ लेखिका तस्लीमा नसरीन का यह कथन अक्षरश: सत्य है कि भारत में हिंदू विरोध का नाम धर्मनिरपेक्षता मान लिया गया है। धर्मनिरपेक्षता शब्द के स्थान पंथनिरपेक्षता शब्द को रखकर देखने से स्पष्ट हो जाता है कि शासक को किसी भी पंथ के प्रति सापेक्ष नही होना चाहिए। पंथसापेक्षता ही साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता अर्थात ‘कम्युनलिटी’ का अभिप्राय है जिसमें व्यक्ति सम्प्रदाय विशेष के लाभ को या हानि को किसी अन्य संप्रदाय के लाभ या हानि से अधिक प्रमुखता देने लगे। व्यक्ति संप्रदाय विशेष के रक्षण, और संरक्षण की बात करे, और इससे आगे उसका चिंतन कुछ सोचे ही नही। आजमखां का आज तक का इतिहास तो साम्प्रदायिक ही रहा है, पर पता नही सरकारों को उनका आचरण क्यों नही दिखाई देता?

आग की ओर से आंखें फेरने की भूल महात्मा गांधी ने की थी, नेहरू ने उसका अनुकरण किया और देखते ही देखते जिन्नाह ‘जीरो’ से ‘हीरो’ बनता चला गया। परिणाम क्या निकला-देश का विभाजन हो गया। आज हम फिर कहीं एक ‘जिन्नाह’ को तो तैयार नही कर रहे हैं? जहां तक देश में या दुनिया में आतंकवाद की बात है तो इसे तो आज सारा संसार ही मान रहा है कि आतंकवाद को प्रश्रय कौन देता है और कौन सी विचारधारा आतंकवाद की जननी है? यह प्रसन्नता की बात है कि मौलाना मदनी जैसे लोग आतंकवाद के विरूद्घ मैदान में आये हैं। गंभीर और शांति प्रिय मुसलमान संसार में अन्यत्र भी आतंकवाद की आलोचना कर रहे हैं और इस प्रकार की गतिविधियों को इस्लाम और मानवता के लिए भयावह मान रहे हैं। निश्चय ही ऐसे लोगों का यह मानना भी सही है कि हिंदू अपने मूल स्वभाव में हिंसा और आतंक से दूर रहता है और उसकी पंथनिरपेक्षता में गहरी आस्था होने के कारण ही भारत में पंथनिरपेक्षता का सिद्घांत जीवित है। ऐसे लोगों के विचारों को भी आजम जैसे नेताओं को समझना चाहिए।

मुलायम सिंह यादव के लिए खतरे का संकेत यह है कि आगामी चुनावों के लिए प्रदेश का यादव समुदाय भी उनके विरूद्घ मन बना रहा है, क्योंकि अखिलेश सरकार के काल में जितने भर भी दंगे हुए हैं, उन सबसे यादव समुदाय को भी गहरी चोट लगी है। अखिलेश यदि इस समय शांति से सरकार चला रहे हैं तो इसके पीछे प्रदेश भाजपा की ‘निष्क्रियता’ है, जो 2017 के चुनावों के लिए कोई तैयारी नही कर रही है और वह ‘मोदी-शाह’ की जोड़ी के नाम पर ही 2017 की चुनाव वैतरणी को पार करने की प्रतीक्षा कर रही है। भाजपा ने अपनी गलत नीति का संकेत यह कहकर दे दिया है कि यूपी का चुनाव वह मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा किये बिना ही लड़ेगी। आजमखां 2017 को ध्यान में रखकर बोल रहे हैं और भाजपाई अभी ख्यालों में डोल रहे हैं। लगता है बिहार का भूत उत्तर प्रदेश में भी अपना असर दिखाएगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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