मेरा पारसमणि-भारत महान

  • 2015-11-02 04:30:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

indian-is-myसत्यार्थ प्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में महर्षि दयानन्द लिखते हैं-

‘‘आर्यावत्र्त देश ऐसा है कि जिसके सदृश भूगोल में दूसरा ‘‘आर्यावत्र्त देश ऐसा है कि जिसके सदृश भूगोल में दूसरा ‘‘आर्यावत्र्त देश ऐसा है कि जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई नहीं है इसलिए इस भूमि का नाम सुवर्ण भूमि है, क्योंकि यही सुवर्णादि रत्नों को उत्पन्न करती है।..... जितने भूगोल में देश हैं, वे सभी इसी देश की प्रशंसा करते हैं और आशा रखते हैं कि पारसमणि पत्थर सुना जाता है, वह बात तो झूठी है, परन्तु आर्यावत्र्त देश ही सच्चा पारसमणि है कि जिसको लोहे रूपी दरिद्र विदेशी छूते के साथ ही सुवर्ण अर्थात  धनाढय़ हो जाते हैं।’’

सचमुच भारत पारसमणि है। पर यह देश दो प्रकार से पारसमणि है-एक आध्यात्मिकता की दृष्टि से तथा दूसरे भौतिक दृष्टि से। आध्यात्मिक रूप से विश्व को जितना भारत ने समृद्ध किया है, उतना किसी अन्य देश ने नहीं किया। मैक्समूलर ने लिखा है:-

‘‘यदि मैं विश्व में उस देश को ढ़ूंँढऩे के लिए चारों दिशाओं में आंख उठाकर देंखँू जिस पर प्रकृति देवी ने अपना सम्पूर्ण वैभव, पराक्रम तथा सौन्दर्य खुले हाथों लुटाकर उसे पृथ्वी का स्वर्ग बना  दिया है, तो मेरी अंगुली भारत की तरफ उठेगी...यदि मुझसे पूछा जाये कि अन्तरिक्ष के नीचे कौन सा वह स्थल है जहां मानव के मानस ने अपने स्वरूप को पूर्णरूपेण विकसित किया है, उनमें से अनेक को इस प्रकार सुलझाया है किजिसको जानकर प्लेटो तथा कांट का अध्ययन करने वाले मनीषी भी आश्चर्यचकित रह जायें तो मेरी अंगुली भारत की ओर उठेगी.....

अगर मैं अपने आप से पूछूं कि हम यूरोपवासी जो अब तक केवल ग्रीक, रोमन तथा यहूदी विचारों में पलते रहे हैं, किस साहित्य से यह प्रेरणा ले सकते हैं जो हमारे भीतरी जीवन का परिशोध करे, उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करे, व्यापक बनाये, विश्व जनीन बनाये, सही अर्थों में मानवीय बनाएं, जिससे हमारे इस पार्थिव जीवन की ही नहीं, हमारी सनातन आत्मा को भी प्रेरणा मिले तो पुन: मेरी अंगुली भारत की ओर उठेगी......।’’

हर भारतवासी अपने उसी भारत की वन्दना करता है जिसके लिए मैक्समूलर की लेखनी से शब्दों के ये अनमोल मोती निकले और विश्व धरोहर के पृष्ठों पर बिखर गये।

महाभारत के भीष्म पर्व अ0 9 श्लोक सुन्दर 5-9 में भारत की कीर्ति गाथा को बड़े ही सुन्दर ढंग से उल्लेखित किया गया है। लिखा है:-

‘‘आओ हे भारत! अब मैं तुम्हें भारत देश का कीर्तिगान


सुनाता हूं। वह भारत जो इन्द्रदेव को प्रिय है, जो मनु वैवस्वत, आदिराज पृथुवैन्य और महात्मा इक्ष्वाकु को प्यारा था, जो भारत, ययाति, अम्बरीष, मान्धाता, नहुष, मुचुकुन्द और औशीनर, शिवि को प्रिय था, ऋ षभ ऐल और नृग, जिस भारत को प्यार करते थे, और जो कुशिक गाधि, सोमक, दिलीप और अनेकानेक शक्तिशाली सम्राटों को प्यारा था! हे नरेन्द्र! उस दिव्य देश की शक्तिशाली कीर्ति कथा मैं तुम्हें सुनाऊंगा।’’

महाभारत के इस प्रकरण से लगता है कि जैसे मानवता का इतिहास अतीत के गौरवमयी थाल को अपने पुनीत हाथों में सजाकर वत्र्तमान के द्वार पर आ खड़ा हुआ हो और भारत को जगा रहा हो कि उठो और अतीत की ज्योति को लेकर वत्र्तमान की छाती पर चढक़र भविष्य की कहानी लिख डालो।

अब भारत के विषय में भौतिक समृद्धि के उस पक्ष पर भी विचार करते हैं जिसके कारण यह सोने की चिडिय़ा कहलाया और विश्व ने इस महान देश की आर्थिक समृद्धि का लोहा माना। 712 ई0 में मौहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध पर आक्रमण किया। जब वह राजा दाहर को हरा चुका था तो उसने उसकी राजधानी में भयंकर लूटपाट करनी आरम्भ की। उसे एक राजकोष से ही जो धन मिला उसमें बताया जाता है कि उसमें बताया जाता है कि 40 देंगे सोने की थी, देंगे सोने की थी, देंगे सोने की थी, जिनमें 17200 मन सोना भरा था। इसके अतिरिक्त मन सोना भरा था। इसके अतिरिक्त 6000 मूर्तियां मूर्तियां ठोस सोने की थीं, जिनमें सबसे बड़ी मूर्ति का तोल 30 मन था। हीरा, पन्ना, मोती, लाल, और माणिक्य इतने थे जिन्हें कई ऊंटों पर लादा गया। जिस ब्राहमण और जिन सेनापतियों ने राजा दाहर से विद्रोह किया था उन्हें कासिम ने कत्ल करा दिया।’’

कासिम के पश्चात महमूद गजनी ने भारत पर एक के पश्चात एक कितने ही आक्रमण किये। नगरकोट के मन्दिर से इसे जो धन मिला था उसके विषय में बताया जाता है कि इसमें 600 मन सोने चांदी के पात्र, 680 मन सोना, 2000 मन चांदी और 20 मन हीरे, मोती,  जवाहरात लूटे। यहां हमने केवल ये दो उदाहरण दिये हैं।

भारत के इतिहास के पृष्ठों में लूटों के ऐसे असंख्य उदाहरण भरे पड़े हैं। लूट का यह सिलसिला दस बीस वर्षों की कहानी का नहीं है, अपितु सदियों तक चलने वाला रहा है। यदि आज के नेताओं के स्विस बैंक खातों तक इसे ले आयें तो कहा जा सकता है कि लूट का क्रम अभी भी रूका नहीं है। अपार सम्भावनाओं और असीम क्षमताओं वाला देश है भारत। इसी भारत के तप:पूत स्वामी विवेकानन्द अपने जीवन काल में एक बार कई वर्षों तक विदेशों में रहे। विदेशों में रहते स्वामी जी महाराज अपने देश की स्मृति में कई बार विह्वल हो उठते थे। वह भारत लौटने के लिए व्याकुल हो उठते थे। अन्त में स्वदेश आने का कार्यक्रम बन ही गया। तब उनके एक विदेशी मित्र ने उनसे पूछा कि निरन्तर कई वर्षों तक आप भारत से बाहर रहे हैं, अब भारत जाने पर आपको भारत कैसा लगेगा।’’

भावुक होकर स्वामीजी महाराज ने कहा, कि पश्चिमी देशों में आने के पूर्व मैं भारत से प्यार करता था, परन्तु अब तो भारत की हवा और मिट्टी तक मेरे लिए पवित्र है। भारतवर्ष अब मेरे लिए परम पावन तीर्थ बन चुका है।’’ जो भारत अपना इतना गौरवमय अतीत रखता है और जिसके पास ढ़ाई अरब हाथ किसी एक काम में हाथ डालने के लिए एक साथ हैं, वह क्या आज पारसमणि नहीं बन सकता? हमारा मानना है कि निस्सन्देह बन सकता है। आवश्यकता पारस्परिक सामंजस्य बैठाने की है, दृष्टिकोण में साम्यता, वाणी में सौम्यता, विचार में समता, हृदय में साहस और कर्म में पवित्रता लाने की है। हम चूक कर रहे हैं और चूक करते हुए ये मान रहे हैं कि जैसे हमने भारत को कहीं खो दिया है, पर सच ये है कि पराधीनता की अंधेरी रात्रि में विलीन हुआ भारत हमें 15 अगस्त 1947 को पुन: मिला था। हम यह नहीं समझ पाये कि हमें भारत पुन: मिल गया है। हमने भारत को न पाकर ‘इण्डिया’ को पाया हुआ मान लिया और लग गये ‘इण्डिया’ के निर्माण में।...... और तभी से हम ‘इण्डिया’ को ही बनाते जा रहे हैं। हम जिस पश्चिमी जगत का अन्धानुकरण करने लगे हैं तनिक उस पर विचारें और सोचें कि पश्चिमी जगत के विचारकों के मत हमारी संस्कृति के विषय में क्या है? विक्टर कोसिन के ये विचार हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं:-‘‘जब हम पूर्व की ओर और उसमें भी शिरोमणि स्वरूप भारत की साहित्यिक और दार्शनिक वृत्तियों का अवलोकन करते हैं, तब हमें ऐसे अनेक गम्भीर सत्यों का पता चलता है, जहां पहुंच कर यूरोपीय प्रतिभा कभी-कभी रूक गयी है, हमें पूर्व के तत्वज्ञान के आगे घुटना टेक देना पड़ता है।’’ मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां भी हमारे लिए मार्गदर्शन कर सकती है:-

‘‘हां, वृद्ध भारत वर्ष ही संसार का सिरमौर है,
ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है?’’
भगवान की भवभूतियों का यह प्रथम भंड़ार है,
विधि ने किया नर सृष्टि का पहले यहीं विस्तार है।’’

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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