मनुष्य धर्म और जलवायु परिवर्तन

  • 2015-12-10 02:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

climate changeटी.वी. पर गोमांस पर चर्चा चल रही थी। जिसमें एक मांसाहारी कह रहा था कि मैं क्या खाता हूं, क्या नही, इसे बताने वाले आप कौन होते हैं? यह मुझे निर्धारित करना है और मेरी चिंता है कि मैं क्या खाता हूं और मुझे क्या खाना चाहिए? इस प्रकार का कुतर्क सुनकर सारे मांसाहारियों को भी अच्छा लगा होगा और उन्होंने यह सोचा होगा कि सचमुच यह हमारा मानवाधिकार है कि हम क्या खाते हैं, और क्या नही?

इस कुतर्क पर विचार करने की आवश्यकता है। आप क्या खाते हैं, क्या नही या क्या करते हैं और क्या नही? इस पर सोचने-विचारने या चिंता करने का अधिकार केवल आपका ही नही है। इस पर मानवता (मानव धर्म) के भी कुछ अपने मानदण्ड हैं और उसके द्वारा नियत किये गये कुछ मानक हैं जिनसे मानवमात्र ही नही, वरन प्राणिमात्र को भी जीवन जीने का अधिकार दिया गया है।  इसलिए आपके कुछ करने या खाने-पीने पर नजर रखने के लिए समाज नाम की एक संस्था को भी बनाया गया है, जो धर्म और नैतिकता की मर्यादाओं को लागू करने की शक्ति और सामथ्र्य रखती है।

मानवता का अभिप्राय केवल मानव समाज तक नही निकाला जा सकता। मानवता का अभिप्राय प्राणिमात्र का हित चिंतन करना है, क्योंकिमानव हर प्राणी का संरक्षक है, कारण है कि मनुष्य सृष्टिï का सर्वोत्तम प्राणी है, जैसे एक संरक्षक किसी का भक्षक नही हो सकता, वैसे ही मानव भी अन्य प्राणियों का भक्षक नही हो सकता। यह मानव धर्म है, यही वेदधर्म है।

जो मनुष्य होकर भी मांसाहारी है और अन्य प्राणियों के जीवन का भक्षण करना अपना विशेषाधिकार मानता है, वह मानवधर्मी न होकर दानवधर्मी होता है। यह सर्वमान्य सत्य है कि धरती मानवतावाद से ही सुरक्षित रह सकती है, दानवता से नही।

इस बात को लेकर विश्व के विभिन्न सामाजिक संगठन और बहुत से संवदेनशील लोग चिंतित हैं कि मानव जीवन के लिए आसन्न संकटों से कैसे निपटा जाए? विश्व वन्य जीव कोष द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार पिछले चालीस वर्षों में हमारी पृथ्वी पर रहने वाले वन्य जीवों की संख्या घटकर आधी रह गयी है। इस संगठन ने 3430 प्रजातियों का अध्ययन किया। उसके अध्ययन के निष्कर्ष चौंकाने वाले थे। पता चला कि मीठे जल में रहने वाले प्रजातियों के जीवों की संख्या में 76 प्रतिशत, भूमि पर रहने वाली वन्य जीवों की संख्या में 39 प्रतिशत तथा समुद्रों में रहने वाले जीवों की संख्या में भी 39 प्रतिशत की कमी आयी है। जबकि मनुष्यों की संख्या विश्व में इसी कालावधि में 3.7 अरब से बढक़र 7.50 अरब हो गयी है।

इन निष्कर्षों के निकालने का एक कारण जहां जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट को माना गया है, वहीं एक कारण मनुष्य द्वारा बहुत से जीवों को मारकर खाते जाना भी है। जिससे विश्व में जीवों की अनेकों प्रजातियां पूर्णत: नष्टï ही हो गयी हैं। विश्व के वैज्ञानिक इस बात को लेकर गंभीर हैं कि मनुष्य को अन्य जीवों के प्रति भी मित्रता भाव प्रकट करना चाहिए। जिसे वह कर नही रहा है। यदि जीवों की प्रजातियों के विनाश का यह क्रम यूं ही चलता रहा तो इस संसार का विनाश निश्चित है। कुल मिलाकर वैज्ञानिकों की दृष्टिï और चिंतन में प्रत्येक प्राणी के जीवन के प्रति सम्मान का भाव स्पष्टï दिखायी देता है। जिसका अभिप्राय है कि वैज्ञानिक प्रत्येक प्राणधारी के जीवन का सम्मान चाहते हैं और व्यक्ति की मांसाहारी प्रकृति को जीवन और जगत के लिए हानिकारक मानते हैं। उनके चिंतन में मानवतावाद झलकता है, धर्म झलकता है। पर दुर्भाग्य की बात है कि यह मानवतावाद तब झलकना आरंभ हुआ है, जबकि मानव का अस्तित्व उन्हें संकट में दिखायी देने लगा है। जबकि हमारा धर्म हमें स्वाभाविक रूप से यह बताता है कि प्रकृति और सृष्टिï में हर प्राणी और चराचर जगत का कण-कण मनुष्य का स्वाभाविक मित्र है।

मनुष्य मूर्खता करते-करते आगे बढ़ रहा है। सभ्य मानव अपने ऊपर किसी प्रकार का प्रतिबंध नही चाहता। यह विरोधाभास है-एक ओर तो वह प्रतिबंध नही चाहता और दूसरी ओर हर प्राणी को तथा सृष्टिï के कण-कण को वह मनुष्य का मित्र बताता है, प्रकृति को अपने लिए वरदान मानता है, और दूसरी ओर प्रकृति के विनाश का तानाबाना बुनता रहता है। जिनके कारण विश्व में जलवायवीय संकट मंडरा रहा है। जहां अनेकों जीवों की प्रजातियां नष्टï हो गयी हैं, वहीं धरती पर स्थित कुछ द्वीपों के अस्तित्व को भी संकट उत्पन्न हो गया है। जलवायु परिवत्र्तन के कारण समुद्र का जलस्तर का निरंतर बढ़ता जा रहा है। ऐसी आशंका है कि मॉरीशस, लक्षद्वीप और अण्डमान निकोबार द्वीपसमूह के साथ-साथ श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों के लिए भी भविष्य में संकट उत्पन्न हो सकता है।

अब तक समुद्रीय जलस्तर बढऩे से विश्व में 18 द्वीप समूह पूर्णत: जलमग्न हो चुके हैं। विशेष रूप से सुंदरवन बाढ़, तूफान, लवणता तथा कटाव की बढ़ती समस्याओं से प्रभावित रहा है। यहां पिछले तीस वर्षों में कटाव के कारण सात हजार लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। भारत का एक लोहाचार नाम का द्वीप है जो 1996 में ही जलमग्न हो चुका है। इस द्वीप की जनसंख्या दस हजार थी, जिसे विस्थापित होना पड़ गया था। बंगाल की खाड़ी में स्थित घोड़ामारा द्वीप नौ वर्ग किलोमीटर से घटकर केवल 4.7 वर्ग किलोमीटर रह गया है। बंगाल की खाड़ी में समुद्र का जलस्तर 3.3 मिलीलीटर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रहा है। अन्य क्षेत्रों में भी कितने ही द्वीपों के अस्तित्व के लिए प्राण संकट उत्पन्न हो गया है।

यह सब विनाशकारी परिस्थितियां इसलिए उत्पन्न होती जा रही हैं कि मनुष्य ने यह कहना सीख लिया कि मैं ये करूं तो मेरी मर्जी और न करूं तो मेरी मर्जी। जबकि यहां ‘मेरी मर्जी’ नही चलती है, यहां तो सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना ही पड़ता है। इसलिए समाज की, राष्टï्र की, बड़ों की, वृद्घों की और धर्म की मर्यादाओं का पालन करना ही पड़ता है। अब भी मानव अपने मानवधर्म को अपना ले तो उसके प्राणों का संकट टल जाएगा अन्यथा जिस आग को आज वह अपने आप से दूर समझ रहा है वह एक दिन उसे सर्वांशत: ही जला डालेगी। मनुष्य की विवेकशीलता इसी में है कि वह अपने प्राणों को संकट में डालने के स्थान पर प्रकृति और प्राणिजगत के प्रति मित्र भाव स्थापित कर ले।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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