मैं क्यों ऋषि दयानन्द से प्रभावित हूँ

  • 2015-12-07 08:30:01.0
  • अमन आर्य

maharshi dayanandकृत युग, त्रेता युग, द्वापर युग के ऋषियों के सामने परिस्थितियाँ कुछ सरल थीं । मनुस्मृति के आधार पर राज्यव्यवस्था लागू थी, गुरूकुल शिक्षा का बोलबाला था, ऋषियों के लिए वनों में रहकर तपस्या करना अधिक सरल था, सर्वत्र धर्मपरायण लोग निवास करते थे जो ऋषियों के उपदेशों को शीघ्र ग्रहण कर लेते थे, ब्राह्मणों के तप के लिए भोजन व्यवस्था राजाओं और धार्मिक प्रजा के कारण होती थी । इन सब परिस्थितियों में ऋषि बनना सहज था । ब्रह्मचर्य के द्वारा उच्च चरित्र का रखना भी सहज ही था । सत्य उपदेश करना भी सहज था ।
परन्तु जैसी विकट स्थिती में ऋषि दयानन्द जी का आगमन हुआ वे बहुत ही अलग थीं । 800 वर्ष के मुसलमानी रक्तपात से त्रस्त हिंदू समाज, अंग्रेज़ सरकार की पक्षपात पूर्ण नीतियाँ, पादरियों का हिंदू समाज को प्रताडि़त करके ईसाई बनाने हेतु प्रयाप्त धन का बहाना, मुसलमान युवकों का हिंदु विदवाओं से बड़ी संख्या में विवाह कर उनको मुसलमान बनाना, अशिक्षा और अँधकार में डूबे हुए हिंदू समाज में असंख्य कुरीतियों का होना, पौराणिक पंडों के द्वारा जातीवाद की आग में दलित वर्ग को जलाना। ये सब अनेकों विकट परिस्थितियाँ जब थीं तब के समय में कहीं देव दयानंद का आगमन हुआ ।
भीम जैसा बल, कपिल-कणाद-गौतम जैसी तर्कणा शक्ति, शिव-पतंजली जैसी योगसाधना, पाणिनी-पतंजली-चाक्रवर्मन-व्याग्रभूति जैसी शब्द शक्ति, वशिष्ठ-अर्जुण जैसी एकाग्रता, भीष्म-हनुमान जैसा चमकता ब्रह्मचर्य । ऐसे ही अनेकों गुणों से युक्त थे ऋषि दयानन्द सरस्वति जी ।
महाभारत के 5000 वर्ष के बाद के समय के अन्तरगत एक ही ऐसे विलक्षण महामानव हुए हैं जिन्होंने सोए हुए भारत को झंझोड़ा और आह्वान किया आर्यों लौट चलो वेदों की ओर ।
जो कष्ट ऋषि दयानन्द ने सहे वे कष्ट किसी अन्य ऋषि को सहन न करने पड़े । ऋषि दयानन्द को मुसलमानों, ईसाईयों, नास्तिकों आदि अनेकों पंथीयों से शास्त्रार्थ करके वेदिक धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करनी पड़ी । 17 बार विष पीना पड़ा, गालियाँ खानी पड़ीं, निन्दा सहनी पड़ीं, ईँटें- पत्थर खाने पड़े । लेकिन सत्य पर अडिग ऋषिवर दयानन्द ने अंतिम श्वास तक सत्य वेदमत की स्थापना के लिए संघर्ष किया ।
प्राचीन काल में पाणीनि ऋषि को जंगल में सिंह ने खा लिया, भीष्म का ब्रह्मचर्य केवल अपने पिता की मर्यादा के लिए था, ऋषि दधिची का बलिदान भी समाज के लिए उदाहरण था, लक्षमण का अपने भाई राम के लिए पत्नि त्याग वन में प्रस्थान भी अद्भुत था ।
परन्तु तुलना करने पर मैंने ऋषि दयानन्द में ही ऐसी विलक्षणता देखी जिन्होंने अत्यन्त विकट स्थिती में आर्यवर्त के लिए मोक्ष सुख त्यागकर जीवन न्योछावर कर दिया ।

अमन आर्य ( 359 )

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