महाराणा प्रताप की यादें ताजा कर देती है हल्दी घाटी

  • 2016-01-24 07:00:31.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

महाराणा प्रताप हमारे सबके भीतर राष्ट्रीय गौरव का भाव पैदा करने वाला एक ऐसा नाम है जिसे लेकर आज भी हर भारतीय गर्व की अनुभूति करता है और अपने इस शूरवीर के समक्ष श्रद्घा के साथ झुक जाता है। पिछले दिनों लेखक अपने परिवार सहित हल्दीघाटी में पहुंचा तो उस समय राजस्थान के राज्यपाल कल्याणसिंह का काफिला भी वहां पहुंचने वाला था, इसलिए बहुत अधिक गहराई से तो मैं अपने परिवार के साथ हल्दीघाटी का अवलोकन नही कर पाया, पर वहां जाकर वहां के कण-कण से महाराणा की जय-जयकार का गीत गूंजता हुआ मैंने अनुभव किया। महाराणा के बारे में कुछ बातें हम यहां पाठकों से शेयर करना चाहेंगे। जैसे-महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।

जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे, तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि-हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आएं ? तब माँ का जवाब मिला-उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मु_ी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना।

maharana pratap haldi ghaati महाराणा प्रताप

लेकिन बदकिस्मती से अब्राहीम लिंकन का वह दौरा रद्द हो गया था।
बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यूएसए ‘ किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं।
महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था।

कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि महाराणा कितने महान थे और कितने वीर थे? इतने वजन को लेकर भी शत्रु पर सुबह से शाम तक वार करना और अपने आपको सुरक्षित भी रखना कितने बड़े साहस की बात है।

आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

एक बार मुगल बादशाह अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है, तो आधे हिंदुस्तान के वारिस वह होंगे, पर केवल शर्त यह होगी कि वह मुझे बादशाह स्वीकार कर लें। यह बहुत बड़ा लालच था। लेकिन महाराणा प्रताप ने महाराणा ने मुगल बादशाह अकबर की किसी भी तरह की अधीनता स्वीकार करने से स्पष्ट मना कर दिया।

हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिकों ने भाग लिया था। अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए।

जब मैं हल्दीघाटी के मैदान में पहुंचा तो देखा कि वहां महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है। मैंने परिवार सहित उस महापुरूष और भारत के शौर्य के प्रतीक महाराणा को नतमस्तक अपने ‘उगता भारत’ परिवार की ओर से नमन किया।

महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा की फौज के लिए तलवारें बनाईं। इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढिय़ा लोहार कहा जाता है।

मुझे बताया गया कि हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था।

महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा श्री जैमल मेड़तिया जी ने दी थी, जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 दोनों पक्षों के योद्घा मारे गए थे। जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे। कहने का अभिप्राय है कि एक योद्घा ने मरने से पहले पांच मुगलों को मौत की नींद सुलाया था....
जब अंत समय आया तो कह गये कि अब मरते हैं, खुश रहना देश के प्यारो अब हम तो सफर करते हैं।


महाराणा प्रताप जब इस संसार गये तो जहां उनके मित्र संबंधी उनके लिए आंसू बहा रहे थे वहीं उनका घोर विरोधी और सदा उनसे शत्रुभाव रखने वाला अकबर भी रो पड़ा था। मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरों से रौंद डाला था । ये लोग महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे। आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं, तो दूसरी तरफ भील।

महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ। उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वह घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है, जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है।

यह ठीक है कि यह एक पशु के नाम पर बनाया गया मंदिर है, लेकिन इस मंदिर से हमें उस चौपाए वफादार पशु की वफादारी याद आती है, और उसके प्रति भी हृदय श्रद्घा से झुक जाता है। राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे। मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 प्रतिशत मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलों को छोडक़र वे 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।

महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 6 फुट थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी

मित्रो, आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ। रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुंनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।

वो लिखता है कि-जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी ।

एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद। आगे अल बदायुंनी लिखता है कि- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था ।

वो आगे लिखता है कि- उस हाथी को पकडऩे के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

अब सुनिए एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति।

उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया जहां अकबर ने उसका नाम पीर प्रसाद रखा। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही पानी पिया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि-जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया,  उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा.?

इसलिए प्रिय पाठको! हमेशा अपने भारतीय होने पर गर्व करो।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 266 )

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