मानव विकास सूचकांक को सुधारे बजट

  • 2016-03-05 09:30:58.0
  • उगता भारत ब्यूरो

सतपाल

नीति नियंताओं को चाहिए की सामाजिक क्षेत्र पर व्यय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे आगामी बजट में प्राथमिकता दी जाए। मानव विकास सूचकांक में सम्मानजनक स्थान पर बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है

आगामी कुछ दिनों में हिमाचल प्रदेश में वित्त वर्ष 2016-17 का वार्षिक बजट पेश होना है, जिस पर जनता की निगाहें टिकी हुई हैं। साधारण शब्दों में बजट एक वित्त वर्ष में किसी देश या प्रदेश के आय-व्यय का लेखा-जोखा है। करों के रूप में जनता द्वारा किया जाने वाला भुगतान सरकारी खजाने में वृद्धि का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। यह एकत्रित धन सरकार द्वारा विभिन्न विभागों में खर्च किया जाता है, जिससे कि जनता को कई प्रकार की सुविधाओं का लाभ मिल सके। आय-व्यय बजट के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं, जिसमें ब्यौरा दिया जाता है कि किस प्रकार जनता का पैसा जनता के ऊपर खर्च किया जाए। बजट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें विभिन्न प्रकार के करों को इस तरह लगाया जाता है, ताकि जनता पर बोझ कम से कम हो, वहीं एकत्रित धन को कैसे खर्च किया जाए कि जनता को अधिकतम लाभ हो। अत: यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जनता का वार्षिक बजट, सरकार के वार्षिक बजट पर निर्भर करता है।
मानव विकास सूचकांक को सुधारे बजट


बजट में व्यय का लेखा-जोखा वित्त वर्ष में व्यर्थ की फिजूलखर्ची से सरकारी खजाने को बचाने के लिए होता है। बजट को तभी उपयुक्त समझा जाना चाहिए यदि नीतिगत व विकासात्मक व्यय को गैर नीतिगत व गैर विकासात्मक की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया गया हो। हिमाचल के पिछले वर्षों के बजट में हम यही देखते आए हैं और आने वाले बजट में भी यही उम्मीद करते हैं। वार्षिक बजट में सरकार द्वारा आर्थिकी के विभिन्न क्षेत्रों पर किए जाने वाले व्यय का निर्धारण किया जाता है, जिनमें सामाजिक क्षेत्र पर व्यय सबसे महत्त्वपूर्ण है। सामाजिक क्षेत्र पर व्यय से अभिप्राय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छ पेयजल एवं निकासी, आपदा प्रबंधन इत्यादि मदों पर व्यय से है। सामाजिक क्षेत्र की ये सारी मदें किसी भी प्रदेश के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। यही वे मदें हैं, जो प्रदेश को मानव विकास सूचकांक जैसे पैमानों पर बेहतर पहचान दिलाती हैं। हिमाचल इन मदों में उत्कृष्ट कार्य के लिए देश के कई राज्यों से आगे है। इसके लिए प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार मिले हैं, परंतु अभी भी प्रदेश कई प्रकार की अव्यवस्थाओं का सामना कर रहा है। इनमें से एक है स्मार्ट सिटीज की पहली सूची में हिमाचल से कोई भी शहर शामिल न होना। प्रदेश की कई मानकों पर, जैसे की स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता, ग्रामीण विकास, सडक़ सुविधा, सैनिटेशन की उपयुक्त व्यवस्था आदि में स्थिति संतोषजनक नहीं है। इसकी ओर ध्यान देने की जरूरत है।

शिक्षा में गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की अगर बात की जाए, तो तस्वीर कुछ धुंधली सी नजर आती है। शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में पिछले कुछ समय से बदलाव देखने को मिला है। इनमें निजीकरण व व्यावसायीकरण का दीमक लग चुका है, जो समाज के लिए एक खतरे की घंटी है। जब प्रथम पंचवर्षीय योजना की शुरुआत हुई, तब शिक्षा एवं स्वास्थ्य में हम पिछड़े हुए थे। सरकारी विद्यालयों में अध्यापकों के अभाव के कारण अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ाने पर विवश है, परंतु निजी विद्यालयों में भी मनमाने ढंग से फीस वसूली जाती है, क्योंकि उनका उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना होता है। जिन लोगों के पास धन का अभाव नहीं है, वे तो अपने बच्चों को मनचाही फीस देकर निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, लेकिन गरीब तबका साधनों के अभाव में अपने बच्चों को अध्यापक रहित विद्यालयों में पढ़ाने को मजबूर हैं। ऐसे में हम किस प्रकार कुशल नागरिकों की उम्मीद कर सकते हैं? आज अगर हम सरकारी एवं निजी विद्यालयों में पढऩे वाले छात्रों की तुलना करें, तो एक बाहरी अंतर उनके स्तर में देखने को मिलता है। अत: नीति निर्माताओं को इस ओर ध्यान देने की सख्त जरूरत है।

अगर स्वास्थ्य की बात करें, तो यहां भी लोगों का सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र की तरफ पलायन हुआ है। आज कहने को तो गांव-गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, परंतु अधिकतर केंद्रों में स्टाफ  की कमी देखने को मिलती है। अत: नीति नियंताओं को चाहिए कि सामाजिक क्षेत्र पर व्यय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे आगामी बजट में प्राथमिकता दी जाए। प्रदेश को मानव विकास सूचकांक में सम्मानजनक स्थान पर बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है। महज विशालकाय भवनों के निर्माण से स्थिति सुधरने वाली नहीं है। इन भवनों में अध्यापकों-चिकित्सकों का होना भी उतना ही जरूरी है। शिक्षा तथा स्वास्थ्य ऐसे दो क्षेत्र हैं, जिन्हें विकास की नींव माना जाता है। यदि प्रदेश के लोग शिक्षित तथा स्वस्थ होंगे, तो इससे राष्ट्र निर्माण में भी उनकी भागीदारी अधिकतम होगी तथा सामाजिक बुराइयों पर भी लगाम कसेगी।

(साभार)

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