लोकतंत्र में मीडिया धर्म-भाग-2

  • 2016-02-06 03:30:14.0
  • राकेश कुमार आर्य

ऐसी प्रवृति को देखकर लगता है कि ये टीवी चैनल वाले लोग जनता के साथ कितना अशोभनीय उपहास करते हैं? इनके इस प्रकार के उपहास के भी कुछ कारण होते हैं, यथा-अधिकतर ऐसा होता है कि जो एंकर होता है उसे स्वयं भी पता नही होता कि उसे जो विषय दिया गया है उसकी गंभीरता क्या है? उसे वही करना होता है जो उसके लिए पहले से ही निश्चित होता है। इसमें हम राजनीतिक चर्चाओं को रख सकते हैं। एंकर जिस राजनीतिक विचारधारा का मानने वाला होता है वह उसी विचारधारा से प्रेरित होकर चर्चा को अपने अनुसार मोडऩे का प्रयास करता रहता है, या उस पर टीवी चैनल के स्वामी का जैसा दबाव होता है, या वह टी वी चैनल जिस किसी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से प्रवाहित होता है उसी के अनुसार चर्चा को मोड़ लिया जाता है। जबकि यही चर्चा यदि भारतीय धर्म, संस्कृति और इतिहास पर होने लगे तो उस क्षेत्र में तो इन एंकरों का अधकचरा ज्ञान और भी अधिक क्षतिकारक हो उठता है। अधिकतर एंकरों को धर्म की परिभाषा ज्ञात नही है, वह संस्कृति शब्द की भी परिभाषा नही जानते और इतिहास का उन्हें कामचलाऊ ज्ञान ही होता है। वह संप्रदायों को धर्म मानकर बोलते जाते हैं और अपने ढंग से ही चर्चा का संचालन करते रहते हैं। वह अपने ज्ञान को विस्तार देना नही चाहते और संस्कृत का लगभग शून्य ज्ञान होने के कारण वेद-उपनिषद या स्मृतियों के उद्वरणों को ना तो समझ पाते हैं और ना ही उनका प्रयोग करते हैं। इसलिए वह कभी-कभी तो किसी की अत्यंत तार्किक बात को भी ‘विवादास्पद’ कह देते हैं। टी.वी. चैनलों पर या समाचार पत्र-पत्रिकाओं में ऐसे समाचार अक्सर सुनने पढऩे को मिल जाते हैं जिन्हें मीडिया वाले लोग अपनी ओर से ही ‘विवादास्पद’ बना देते हैं या उसका महिमामंडन इसी रूप में कर देते हैं, क्या यह सब कुछ अलोकतांत्रिक नही है?  इसमें हमें तो कहीं भी मीडिया धर्म दिखाई देता नही है।
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उदाहरण के रूप में हम बिसाहड़ा काण्ड को लें। इस काण्ड में मीडिया पहले वही बोलता रहा जो ठीक नही था। जब बिसाहड़ा के ही लोगों ने मीडिया पर पथराव करके उसे भगाना आरंभ किया तो कुछ मीडिया बंधुओं की आंखें खुलीं और उन्होंने कुछ तथ्यात्मक बातें उठानी आरंभ कीं। पत्थर खाकर बिसाहड़ा की भ्रामक बातों पर इन्होंने मौन साधा तो मालदा की घटना पर पूर्णत: मौन रहकर बता दिया कि ये देश में साम्प्रदायिक माहौल को बिगाडऩे वालों के प्रति कितने ‘कठोर’ हैं? बिसाहड़ा काण्ड के पश्चात कुछ नही बातें सामने आयीं। मीडिया ने अपनी धर्मनिरपेक्षतावादी बुद्घि का परिचय देते हुए गोमांस को इंग्लिश में ‘बीफ’ कहना आरंभ कर दिया। अब बीफ पर चर्चा होती है, मानो वह गोमांस की बात ही नही कर रहे हों। ऐसे बुद्घिशून्य और मूर्ख लोगों के बयान समाचारपत्रों में छपते हैं जिन्हें गोवंश की वैज्ञानिकता का कोई बोध नही है, और वे कह देते हैं कि बीफ को यदि कुछ लोग खाना चाहते हैं तो खा सकते हैं। इसका कारण वह यह बताते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें हर व्यक्ति को अपने ढंग से जीवन जीने का अधिकार है। इसलिए अपना पहनावा और खान-पान भी उन्हें तय करने का मौलिक अधिकार है। मीडिया ऐसे मूर्खों के बयानों को प्रगतिशीलता का परिचायक मानकर प्रमुखता से छापता है।

गोमांस के प्रति ऐसी मूर्खता पूर्ण बातों पर यदि चिंतन किया जाए तो इन बयानों से सामाजिक व्यवस्था के तार-तार हो जाने की और अराजकता फैल जाने की पूरी संभावना है, यदि हर व्यक्ति को अपने अनुसार जीवन जीने की छूट दे दी जाएगी और इसे ही लोकतंत्र या प्रगतिशीलता का नाम दिया जाएगा तो फिर आतंकियों को भी उनके अनुसार जीवन जीने देने की मांग का उठना स्वाभाविक है। हत्यारे, लुटेरे, डकैत और बदमाश लोग भी फिर यही कहेंगे कि उन्हें भी उनके अनुसार जीवन जीने दिया जाए। तब क्या होगा? उत्तर पर प्रकाश डालने की आवश्यकता नही है।

इसका अभिप्राय है कि सबको अपने ढंग से जीवन जीने का अधिकार नही है। उसे लोकशांति और लोक-व्यवस्था बनाये रखने के लिए सामाजिक परहितकारी नियमों के पालने में परतंत्र रहना ही पड़ेगा। यह परतंत्रता मर्यादा की परतंत्रता है। कहने का अभिप्राय है कि सडक़ पर गाड़ी चलाते समय जैसे आप किसी दुर्घटना से बचने के लिए सडक़ के नियमों का पालन करने के लिए मर्यादा से बंधे हैं, वैसे ही संसार चक्र में भी आपको मर्यादा में रहने के लिए कुछ नियमों का पालन करना पड़ेगा। जैसे आतंकियों से आपको सुरक्षा चाहिए वैसे ही संसार में जीवन चक्र को चलाये रखने के लिए प्रकृति को भी अपने हर प्राणी की रक्षा के लिए उन आतंकियों से उनकी रक्षा करने का अधिकार है जो इस जीवनचक्र को मिटा देना चाहते हैं। मनुष्य जीवहिंसा से अपना जीवन चलाये-यह उसका अधिकार नही है। इसके विपरीत वह जीवहिंसा का प्रतिरोध करे-यह उसका अधिकार (कत्र्तव्य नही कह रहे हैं हम) है, और यह अधिकार उसका इसलिए है कि इसी अधिकार से उसका जीवन सुरक्षित रह सकता है। जीव हिंसा करते-करते मनुष्य मनुष्य को खाने लगा है। ग्रेटर नोएडा में एक रिक्शा चालक को मारकर दक्षिणी अफ्रीकी छात्रों ने उसका मांस फ्रीज में रख लिया था, बाद में पता चला कि वह ऐसा पूर्व में भी करते रहे थे। ऐसी मानसिकता का भण्डाफोड़ करते हुए मीडिया के लोगों को चाहिए कि वह प्रगतिशीलता के नाम पर विश्व को जीव हिंसा युक्त परिवेश दिलाने की दिशा में ठोस कार्य करे। न्यूज चैनलों पर बीफ को लेकर चर्चाएं नही होनी चाहिए, अपितु जीव हिंसा निषेध कितना अनिवार्य है ऐसे विषयों पर चर्चा हो। इन चर्चाओं को ऊंचाई देने के लिए जीव हिंसा निषेध पर अपनी पकड़ रखने वाले वैदिक विद्वानों को ही आमंत्रित किया जाए। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली के माध्यम से बड़े बन गये एंकर किसी चैनल के नौकर हो सकते हैं वे भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ नही हो सकते।

मीडिया की गिरती शाख को उठाने के लिए आज इस क्षेत्र में व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। इन सुधारों में भाषा संबंधी दोषों को भी दूर करने की ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। हमारे समाचार पत्रों की भाषा में विभिन्न भाषाओं के शब्द होते हैं, जिससे देश में अपनी संस्कृत भाषा को तो मृतभाषा मानने का भूत जन्म ले चुका है और हिंदी को एक क्लिष्ट या पिछड़ी भाषा  बना दिया गया है। इस प्रवृत्ति के चलते समाचार पत्रों की भाषा खिचड़ी भाषा बन गयी है और हम विश्व में एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक भाषा रखने वाले देश के नागरिक होकर भी उसकी दावेदारी से दूर होते जा रहे हैं। ‘हिंग्लिश’ या उर्दू मिश्रित इस भाषा को किसी भी दृष्टिकोण से एक सभ्य और सुसंस्कृत भारत जैसे देश की भाषा नही कहा जा सकता। यदि मीडिया भी साहित्य सेवा में प्रमाद करेगा तो राष्ट्र निर्माण की शाश्वत प्रक्रिया को आगे बढ़ाना या चलाना कठिन हो जाएगा। हमें स्मरण रखना होगा कि लोकतंत्र में किसी देश की संस्कृति, धर्म और इतिहास को परोसने, समझने और उसे अपने युवा वर्ग तक सकारात्मकता के साथ सांझा करने का दायित्व मीडिया का ही होता है। यदि भारत में मीडिया इस ओर प्रमाद प्रदर्शित कर रहा है तो मानना पड़ेगा कि लोकतंत्र को भारत में सही अर्थों में अपना आकार लेने में अभी समय लगेगा और हम अभी परिपक्व लोकतंत्र की ओर बढऩे से दूर हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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