लोकतंत्र में मीडिया धर्म-भाग-1

  • 2016-02-05 03:30:24.0
  • राकेश कुमार आर्य

लोकतंत्र में मीडिया का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें दो मत नही कि भारतवर्ष में आजादी के पश्चात मीडिया ने लोकतांत्रिक संस्थानों को बलशाली बनाने और सत्तारूढ़ दल की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने में सराहनीय भूमिका का निर्वाह किया है। परंतु इसके उपरांत भी ऐसे क्षेत्र भी हैं जिनमें लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की भूमिका कहीं संदिग्ध सी या गरिमा के प्रतिकूल सी लगती है। जैसे भारतीय संस्कृति, धर्म और इतिहास के विषय में मीडिया अपनी बहुत अच्छी भूमिका नही निभा पाया है। इसी प्रकार रचनात्मक समाचारों की अपेक्षा नकारात्मक समाचारों को मीडिया कहीं अधिक प्रमुखता से प्रकाशित करता है।

मीडिया अपने धर्म से विमुख क्यों हो गया? इसके कई कारण हैं। सर्वप्रथम कारण है समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अपनी आजीविका का साधन बना लेना और समाचारों को व्यापार की वस्तु बना देना। पैसे की इच्छा और सम्मान की भूख को लेकर लोग समाचार पत्र-पत्रिकाएं या न्यूज चैनल चला रहे हैं। जैसे राजनीति में हर ‘ऐरे गैरे-नत्थू खैरे’ को काम मिल जाता है वैसे ही मीडिया में भी ऐसे लोगों की बड़ी संख्या प्रवेश कर गयी है, जिनका उत्कृष्ट लेखन और जनसंवाद से कोई लेना देना नही है। कई समाचारों को पैसे लेकर छापा जाता है। तो अधिकांश संपादक दूसरों की बौद्घिक संपदा अथवा लेखों की चोरी करके उन्हें अपने नाम से छापते हैं। पैसे लेकर समाचार प्रकाशित करने का एक कारण यह भी है कि मीडिया में संपादक वर्ग के लोग अपने संवाददाताओं को वेतन के नाम पर कुछ नही देते या देते हैं तो अत्यल्प। अधिकतर संवाददाता ‘कमीशन बेस’ पर ही अपनी सेवाएं देते हैं। जिसके चलते वह अपने जीविकोपार्जन के लिए इधर-उधर मुंह मारने को बाध्य हो जाते हैं।
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दूसरा कारण है-मीडिया में तत्वदर्शी, धर्मदर्शी और विद्वानों का सर्वथा लोप होते जाना। बहुत कम ऐसे संपादक हैं जो अपने लेखों में भाषा की शालीनता और उत्कृष्टता को अपनाकर स्वयं अपना संपादकीय तैयार करते हों। बहुत से उद्योगपतियों ने और पैसे वालों ने अपने-अपने समाचार पत्र चला रखे हैं और उन्होंने वे ठेके पर दे दिये हैं-इन कथित संपादकों की ओर से लेख छपते हैं-संपादकीय छपते हैं पर उन्हें स्वयं यह नही पता होता कि तुमने आज अपने समाचार पत्र में क्या लिख दिया है, या उस लिखे हुए का क्या अर्थ है? ये लोग अपना समाचार पत्र या पत्रिका केवल इसलिए निकालते हैं कि समाचार पत्र के चलते रहने से उनके प्रभाव और वर्चस्व में वृद्घि होती है, लोग उन्हें एक संपादक के रूप में सम्मान देते हैं-उन्हें लोगों से, संस्थानों से, सरकार से, और सरकारी प्रतिष्ठानों से पैसा भी मिलता है-बड़े-बड़े विज्ञापन प्राप्त करने में वह अपनी ऊंची पहुंच के कारण सफल हो जाते हैं। ऐसे लोगों को किसी विचारधारा से कुछ नही लेना और ना ही अपने राष्ट्रीय मूल्यों से कुछ लेना देना है, उन्हें केवल पैसा चाहिए। कुछ समय पूर्व तक बड़े अखबारों को यशस्वी संपादक मिल जाया करते थे-परंतु अब ऐसे यशस्वी संपादकों का अकाल सा पड़ता जा रहा है। इसका कारण यह भी है कि ये उद्योगपति समाचार पत्रों के स्वामी स्वयं लक्ष्मी के उपासक होने के कारण सरस्वती के उपासक यशस्वी संपादकों का उचित सम्मान  नही करते हैं। सरस्वती को लक्ष्मी की आवश्यकता तो है-परंतु सरस्वती लक्ष्मी की दासी बनकर जीवन यापन करे-यह उसे स्वीकार नही होता। इसलिए तत्वदर्शी, धर्मदर्शी और महाबुद्घिमान संपादक या विद्वान लोग लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से मुंह फेरने लगे हैं। उद्योगपति मानसिकता के समाचारपत्रों के स्वामियों ने मीडिया का व्यावसायीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये लोग अपने समाचारपत्रों में न्यूज लगाने और न्यूज रोकने दोनों के कई बार बड़े-बड़े घोटाले कर लेते हैं, तब समाचारपत्र कार्यालयों में बैठे वास्तविक विद्वान लोगों का दिल टूट जाता है और वे समाचारपत्र-पत्रिकाओं का बहिष्कार कर घर चले जाते हैं। ऐसे विद्वानों द्वारा समाचारपत्र-पत्रिकाओं का बहिष्कार कर जाना सचमुच बहुत बड़े दुख की बात है। क्योंकि इनके बहिष्कार के पश्चात इनके खाली स्थान को निम्न स्तर के लोगों से भरने का प्रयास और प्रबंध किया जाता है। विद्वानों के स्थान पर निम्नस्तरीय लोगों का आना एक नई विडंबना को जन्म देता है। हम इस विडंबना को ‘बौद्घिक पलायन से उपजी बुद्घिशून्यता’ की स्थिति कह सकते हैं।

इस प्रकार की बुद्घि शून्यता को आप हमारे टीवी चैनलों पर आयोजित होने वाली चर्चाओं में एन्कर की मूर्खताओं को देखकर भांप सकते हैं। ये एंकर महोदय अपनी कला में प्रवीण होते हैं, जिसके चलते ये ‘रस्सी का सांप और सांप व की रस्सी’ बना देते हैं। ये चर्चा को अपने ढंग से मोड़ देते है, जिससे चर्चाएं प्रायोजित कार्यक्रम सी लगने लगती हैं। किसी तात्विक निष्कर्ष पर वह नही पहुंच पातीं और हम अक्सर स्तरहीन और निष्कर्षहीन चर्चाओं को एंकर की इच्छा के अनुसार समाप्त होते देखते हैं। ये टीवी चर्चाएं भारत में कभी होने वाले शास्त्रार्थों की याद दिलाती हंै, परंतु वास्तव में ये शास्त्रार्थों की पांवों की धोवन भी नही होतीं। इनमें विषय की गंभीरता से लेकर कभी भी अपेक्षित ऊंचाई देखने को नही मिलती। ये चर्चाएं पानी के बुलबुले की भांति बनती हंै और अपने आप मिट जाती हैं। हमने शाहबानो प्रकरण से लेकर राम मंदिर निर्माण, बाबरी मस्जिद विध्वंस, भगवा आतंकवाद, इस्लामिक आतंकवाद, सांई भगवान या नही, बिसाहड़ा काण्ड और पठानकोट काण्ड तक के हजारों सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टीवी चर्चाएं सुनी हैं-पर आपको किसी एक भी चर्चा की यह जानकारी नही होगी कि उस चर्चा में यह निर्णायक तथ्य सामने आ गया था और इसे लेकर सभी लोग सहमत हो गये थे? सारी चर्चाएं क्रिया प्रतिक्रिया की मानसिकता के साथ आरंभ होती हैं और इन्हीं के भंवरजाल में फंसकर चर्चा के दौरान ही मर जाती है, अंत में एंकर महोदय चर्चा के शव को शवोच्छेदन किये बिना ही उसका अंतिम संस्कार कर देता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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