लोकतंत्र को तार-तार करते हमारे राजनीतिज्ञ

  • 2015-12-25 03:14:43.0
  • राकेश कुमार आर्य

देश का लोकतंत्र इस समय अनुभवहीन, दिशाहीन और असहिष्णु उच्छ्रंखल लोगों के शिकंजे में फंसा पड़ा है। लोकतंत्र की परिभाषा लोगों का, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा शासन अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दी। पर जब इसे व्यावहारिक रूप से लोगों ने निकट से देखा तो इस परिभाषा को राजनीतिक मनीषियों ने इस प्रकार सुधार लिया-मूर्खों का, मूर्खों के द्वारा, मूर्खों के लिए शासन ही लोकतंत्र है।

अब प्रश्न है कि विश्व के लिए जिस शासन व्यवस्था को सर्वाधिक उपयोगी और औचित्यपूर्ण माना गया, उसे ही राजनीतिक चिंतकों ने इतनी निर्ममता का प्रदर्शन करते हुए इस प्रकार संशोधित क्यों किया। इसका कारण यही रहा कि राजनीतिक लोगों ने शासन में जन सहभागिता को सुनिश्चित करने में अपने स्वार्थों का अधिक ध्यान रखा। जैसे राजतंत्र में राजा और उसके लोग प्रजा को शिक्षित न करके अशिक्षित रखने पर बल देते थे, या भूटान जैसे देशों में आज भी देते हैं, उसी प्रकार लोकतंत्र में भी राजनीतिक लोगों ने अपना खानदानी शासन स्थापित करके जनसाधारण को उससे दूर करने का हरसंभव प्रयास किया है। भारत में ऐसे अनेकों परिवार हैं जिन्होंने लोकतंत्र के नाम पर खानदानी शासन को देश में स्थापित करने का प्रयास किया है। इस विषय में कांग्रेस के प्रथम परिवार (नेहरू गांधी परिवार) ने अन्य लोगों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतंत्र की इस दुविधा पूर्ण स्थिति को समझा और उन्होंने इस बात की सौगंध उठाई कि वह अपने परिवार या किसी नाती संबंधी को अपने निकट नही फटकने देंगे। उनकी सोच है कि वह लोकतंत्र का द्वार जनता के लिए खोलेंगे और अपनी ओर ऐसा कोई अलोकतांत्रित आचरण या व्यवहार नही करेंगे। जो लोकतंत्र की आत्मा को कष्ट देने वाला हो। उनकी यह सोच लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं के अनुकूल है। पर इसको यदि वह बोल-बोलकर लागू करेंगे तो इसके देश के उन राजनीतिज्ञों को कष्ट होगा जो अपने जीते जी अपने बेटे-बेटियों और दामादों को राजनीति में स्थापित करने में लगे हैं, और जिन्होंने राजनीति को व्यापार बनाकर रख दिया है।
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यही कारण है कि कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी जो इस समय कैंसर से पीडि़त हैं, मोदी के प्रति असहिष्णु हैं। उनके साथ वे सारे राजनीतिज्ञ मोदी का एकस्वर से विरोध कर रहे हैं जो राजनीति में लोकतंत्र के वास्तविक गुणों के विकास के विरोधी हैं। अभी यह लुकाछिपी का खेल है मोदी अपनी फॉर्म में आकर इसे सडक़ की लड़ाई बनाने के मूड में नही हैं। क्योंकि उनका वास्तविक उद्देश्य देश को विकास के रास्ते पर लेकर चलना है। वह चुनाव के वर्ष में सडक़ों पर आना चाहेंगे-पर तब तक बहुत देर हो जाएगी।

कांग्रेस ने अपने बचाव के लिए संसद में बचकानी व्यूह रचना करनी आरंभ कर दी है। वह संसद के हर सत्र को शोर शराबे की भेंट चढक़र मोदी सरकार के विधायी कार्यों में अड़ंगा डालने की आत्मघाती नीति पर चल रही है। जिसे उचित नही माना जा सकता। जी.एस.टी. बिल से देश को लाभ हो सकता था पर उसे लटकाये रखकर कांग्रेस देश को आर्थिक क्षति पहुंचाने के राष्ट्र विरोधी कार्य को बल प्रदान कर रही है। बात स्पष्ट है कि कांग्रेस देश को अपने ढंग से हांकने की ‘तानाशाही’ दिखाने पर तुली है।

पिछले संसदीय सत्र में कांग्रेस ने ललित मोदी और व्यापम घोटाले को लेकर संसद को चलने नही दिया था। उनका कोई समाधान नही निकला तो उन्हें इस सत्र में कांग्रेस को फिर उठाना चाहिए था पर इस सत्र में कोई चर्चा उन प्रकरणों को लेकर नही की गयी। स्पष्ट है कि कांग्रेस लोकसभा को बंधक बनाने की अलोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन कर रही है। उसका उद्देश्य केवल काम रोकना है। यह असहिष्णुता की पराकाष्ठा है।

कांग्रेस और उसके सहयोगी दल संसद में राजनीतिक छुद्रता का व्यवहार कर रहे हैं। जिससे देश को आर्थिक रूप से पिछडऩे के लिए विवश होना पड़ रहा है। हम जिधर जा रहे हैं उधर विरोध और प्रतिशोध का एक अंतहीन क्रम दिखाई दे रहा है।

जब लोकतंत्र को राजतंत्र की कब्र पर स्थापित किया गया था तो लोगों को लगा था कि यह शासन प्रणाली उनके लिए सर्वथा अनुकूल होगी। पर आज लोकतंत्र भी जनहितों से पूर्णत: खिलवाड़ कर रहा है, तो अधिकतर लोगों का अब इस शासन प्रणाली से भी मोहभंग होता जा रहा है। यदि इसकी भावनाओं के साथ अधिक खिलवाड़ किया गया तो इससे ‘तानाशाही’ का जन्म हो सकता है।  वह तानाशाही देश के बिगड़ैल राजनीतिज्ञों को ही सुधारने का पहला कार्य करेगी और बहुत संभव है कि देश की जनता भी उसका समर्थन करे। जब देश की संसद पर आतंकी हमला हुआ था तो देश के अधिकांश लोगों को प्रतिक्रिया ऐसी रही थी कि इन राजनीतिज्ञों के साथ अवश्य ही कुछ हो जाना चाहिए था। क्योंकि ये देश के लोगों की भावनाओं के प्रति पूर्णत: उदासीन हो गये हैं। देश की जनता इन राजनीतिज्ञों को संसद में दो भैंसों की तरह लडऩे झगडऩे के लिए नही भेजती है, अपितु राजनीतिक मनीषियों के रूप में सम्मानित कर देश की समस्याओं के समाधान के लिए गंभीर चिंतन देने के लिए यदि अब स्वयं ही देश के लिए एक समस्या बनने लगे हैं तो समझना चाहिए कि देश में लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पहली सरकार में अपनी धुर राजनीति विरोधी हिंदू महासभा के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उद्योग मंत्रालय जैसा भारी भरकम मंत्रालय दिया था। यह ऐसे ही नही दिया गया था। नेहरू लोकतंत्र के प्रति समर्पित थे, और अपने धुर राजनीतिक विरोधियों का समर्थन प्राप्त करने में ही लोकतंत्र की मजबूती देखा करते थे। उनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि था। राहुल गांधी के लिए नेहरू जी तो दूर की कौड़ी हो जाएंगे-उन्हें तो वह नही समझ पाएंगे-अच्छा हो वह अपने पिता राजीव गांधी के उन दिनों को स्मरण करें जब वह लोकसभा में पराजित कांग्रेस के नेता के रूप में एक गंभीर भूमिका का निर्वाह करते थे। उनकी मृत्यु पर अटलजी ने कहा था कि विपक्ष के नेता के रूप में उनकी संतुलित भूमिका से वह अत्यंत प्रभावित हुए थे। पर राहुल तो सत्ता पक्ष में रहकर भी कागज फाड़ रहे थे, और विपक्ष रहकर भी यही कर रहे हैं, यह सब अब तक चलेगा?

हमारा मानना है कि यह संसार प्रेम से, प्रेम के द्वारा, प्रेम के लिए बना है, यह प्रेम लोक से, लोक के द्वारा लोक के लिए मिलता है। प्रेम और लोक जहां मिलकर नई सृजना करें वही लोकतंत्र होता है। जहां प्रेम के स्थान पर घृणा और लोक के स्थान पर साम्प्रदायिकता दलगत हित आ जाते हैं, वहां उग्रवाद आ जाता है, जिसमें सृजना ना होकर केवल विध्वंस होता है। इसलिए भारतीय ऋषियों ने सृजना के लिए प्रेम और लोक का समन्वय स्थापित किया, और लोकतंत्र को वैश्विक व्यवस्था का मूल आधार स्वीकार किया। यदि राहुल गांधी किसी भी प्रकार से लोकतंत्र की इस मूल भावना के विपरीत जा रहे हैं या देश की राजनीति किन्ही विपरीत दिशा में बह रही है तो समय रहते उसे इस दिशा में बढ़ते अपने कदमों को रोकना चाहिए। लोकतंत्र का मूलमंत्र असहिष्णुता और घृणा को बढ़ावा देना न होकर प्रेम से लोक का सृजन करना है। हमारे राजनीतिज्ञ उसी दिशा में आगे बढ़ें तो अच्छा है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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