लोकतन्त्र की प्राणशक्ति: गोपनीयता और मंत्रीपद

  • 2015-12-01 01:45:23.0
  • राकेश कुमार आर्य

लोकतंत्र में शासन तन्त्र की प्राणशक्ति गोपनीयता और मंत्रीपद को माना जा सकता है। राजा की योजनाऐं और अति महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों की जानकारी जनसाधारण हो या विशिष्ट व्यक्ति हों, किसी को भी समय पूर्व नही होनी चाहिए।

महाराज युथिष्ठिर को समझाते हुए महाभारत के शान्तिपर्व (69/14-15) में भीष्म पितामह ने गोपनीय विषयों पर अपनी सम्मति प्रदान करने वाले लोगों का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा है कि ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय एवम वैश्य को भी मन्त्री बनने एवं मंत्रणा देने का अधिकार है। भीष्म पितामह के मतानुसार मन्त्री का कुलीन एवं धर्मज्ञ होना भी उसकी एक अनिवार्य योग्यता है। मन्त्रणा के योग्य मंत्री के भीतर भीष्म ने जिन गुणों की चर्चा शान्तिपूर्ण में की है, उनमें एक मंत्री का परममित्र, स्वरूपवान, मृदुभाषी, क्षमाशील, शिष्टाचारी, बुद्घिमान, स्मृतिवान, कुशल, दयालु, यशस्वी एवम् सामथ्र्यवान पुरूष से द्वेष नही रखने वाला तथा किसी भी परिस्थिति में धर्म सामथ्र्यवान पुरूष से द्वेष नही रखने वाला तथा किसी भी परिस्थिति में धर्म सामथ्र्यवान पुरूष से द्वेष नही रखने वाला तथा किसी भी परिस्थिति में धर्म को न छोडऩे वाला, जैसे गुणों को वर्णित किया है। भीष्म कहते हैं कि जो मंत्री उक्त गुणों से सुशोभित होते हैं, वही अपने राजा से सम्मानित होते हैं। क्योंकि ऐसे महान् विचारक और धर्मशील मंत्राी ही राजा की गोपनीयता को बनाये रखने में कुशल हो सकते हैं।

मंत्री के कर्तव्य पर भी पितामह भीष्म ने प्रकाश डाला है। राजा को पहले तीन मंत्रियों से अलग-अलग कर उस पर विचार करना चाहिए। तत्पश्चात कुलपुरोहित से सलाह लेनी चाहिए। उनकी स्वीकृति मिलने पर ही उस मन्त्रणा को कार्यान्वित करना चाहिए।

मन्त्रणा के समय वहाँ से विकलांग, एवम् विकृतांग स्त्री, हिजड़ों को अलग कर देना चाहिए। राजा एवम् मंत्री की मन्त्रणा राजा एवम् मंत्री की मन्त्राणा एकान्त समतल कुशरहित मैदान या राजभवन के उपरी तल पर करनी चाहिए। मंत्रिमण्डल में विद्वान, प्रगल्भ, स्नातक, चार ब्राह्मण, बलशाली शस्त्राधारी, आठ क्षत्रिय, धनसम्पन्न 21 वैश्य एवम् विनीत, पवित्रा कर्म करने वाले तीन शूद्रों को भी रखना चाहिए, किन्तु उन्हें इनकी गोपनीयता की रक्षा करनी चाहिए।

आचार्य शुक्र ने मंत्री के लिए नीतिशास्त्र का ज्ञानी होना आवश्यक माना है। आचार्य शुक्र ने मंत्री पदासीन व्यक्ति में आत्म स्वाभिमान की भावना को भी आवश्यक माना है। अनुचित आज्ञा को टाल देना चाहिए, एवम् राजा के साथ अनीतिपूर्ण आचरण नही करना चाहिए। महाविद्वान विदुर ने गोपनीयता को मंत्री का सबसे बड़ा गुण माना है।

राजा निरंकुश नही होता’

राजा के लिए मंत्रिपरिषद का होना, उसको सलाह के लिए परामर्शदाता लोगों की उपस्थिति और ऐसे परामर्शदाता लोगों का कुलीन और धर्मज्ञ होना यह स्पष्ट करता है कि राजा निरंकुश नही हो सकता। राजा के स्वेच्छाचारी और निरंकुश स्वरूप की ऐसी परिस्थितियां मध्यकाल की देन हैं। उस समय ‘राजा’ के स्वरूप में गिरावट आ चुकी थी। राजा की ओर से होने वाली विजय यात्राएं लोककल्याण के लिए नहीं, अपितु ‘स्वकल्याण’ के लिए होने लगीं। इससे राजा के भीतर अहंकार और दम्भ में वृद्घि होने लगी। ऐसी स्थिति का कारण ये था कि राजा ने चाटुकार लोगों को अपना मंत्री बनाना आरम्भ कर दिया। ऐसे चाटुकार लोगों ने मंत्री पद पाकर स्वयं को उपकृत माना और वो राजा के इस उपकार के कारण राजा के मंत्रिमण्डल के नहीं, अपितु कीर्तिमण्डल के सदस्य बन गये। जहाँ राजा की पूजा करना और मानो आरती उतारना भी उनका जीवनोद्देश्य बन गया।

मंत्रणा के सम्बन्ध में हमें स्मरण रखना चाहिए कि ये सदा ही विद्वानों के साथ हुआ करती है। सामान्य बुद्घि के व्यक्ति के साथ कभी भी मन्त्रणा नही हुआ करती। इसलिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि बनने वाले मंत्री की स्वयं की प्रतिभा बोलनी चाहिए। क्षेत्रीय, भाषाई और साम्प्रदायिक सन्तुलन को बनाकर रखने के लिए यदि ‘राजा’ अपने मंत्रियों का चयन करेगा जैसा कि आज होता है तो वह लोग राजा को उचित परामर्श नही दे पायेंगे। उनके परामर्श में भी संकीर्णता का विखण्डनवाद होगा और राष्ट्र वितण्डावाद का शिकार हो जायेगा।

गोपनीयता को विद्वान ही बनाये रख सकता है

गोपनीयता को विद्वान ही बनाये रख सकता है गोपनीयता को विद्वान ही बनाये रख सकता है गोपनीयता के सम्बन्ध में हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि संकीर्ण मानसिकता का व्यक्ति कभी भी गोपनीयता को भंग कर सकता है। उसका धैर्य थोड़ी सी विषमताओं का सामना करते ही समाप्त हो सकता है। जबकि एक विद्वान अपने धैर्य को अधिक समय तक बनाये रख सकता है। अच्छे मंत्री को ‘राजा’ से किसी समय मतभेद हो जाने पर भी अपने द्वारा गोपनीयता बनाये रखने के सिद्घान्त को कभी विस्मृत भी नहीं करना चाहिए। ऐसी परिपक्व मानसिक अवस्था लोकतन्त्र के लिए आवश्यक होती है। हमारे संविधान ने भी गोपनीयता को लोकतन्त्र की प्राणशक्ति के रूप में ही मान्यता प्रदान की है।

यह दु:ख का विषय है कि हमने गोपनीयता के सिद्घान्त को वेद सम्मत राजनीति से लिया परन्तु संविधान में कहीं पर भी प्रधानमंत्री और मंत्रियों की योग्यता एवम् बौद्घिक क्षमताओं का राष्ट्र की अपेक्षाओं के रूप में निरूपण नही किया।

यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति है कि देश के प्रधानमंत्री को हमने विभिन्न दबाव गुटों, औद्योगिक घरानों, शक्ति सम्पन्न लोगों आदि के उपर छोड़ दिया है। नि:स्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा करने वाले परम विद्वत्मण्डल की कृपा दृष्टि से नही अपितु निहित स्वार्थों के लिए शक्ति संचय कर सत्ता प्रतिष्ठानों को हड़पकर अपनी मु_ी में रखने वाले कुछ स्वार्थी लोगों के द्वारा प्रधानमंत्री की नियुक्ति होने लगी है।

‘उपकार’ का यह खेल किसी प्रधानमंत्री को स्वतन्त्र और स्वस्थ निर्णय लेने से रोकता है। वह स्वयं बन्धनों में जकड़ा हुआ और संकीर्ण गलियों से निकलकर चलने वाला एक असहाय व्यक्ति बना दिया गया है। हमारे अब तक के अधिकांश प्रधानमंत्रियों की स्थिति ऐसी ही रही है। ऐसी स्थिति परिस्थितियों में कुछ प्रधानमंत्री कभी भी अपने विवेक से विद्वान लोगों को अपने मंत्रिमण्डल में स्थान नहीं दे पाये। इसका एक कारण ये भी होता है कि मंत्री यदि योग्य हो और प्रधानमंत्री ‘अयोग्य’ हो तो मंत्री सत्ता पलट कभी भी कर सकता है। इसलिए अपनी ‘कुर्सी’ को बचाये रखने के लिए भी दुर्बल मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है।

गोपनीयता टूट जाती है’

ऐसी परिस्थितियों में गोपनीयता का भाग हो जाना स्वाभाविक है। यदि लक्ष्य दूर तक जाना नही है, तो कहीं निकट ही ‘साध्य’ टोहना मानव की प्रकृति में सम्मिलित है। जिसे साध्य मिल गया अर्थात् ऐश्वर्य का साधन मंत्री पद मिल गया। वह बहुत दूर तक राष्ट्र के कल्याण के लिए अथक परिश्रम कर राष्ट्रोत्थान के लिए नई नई नीतियाँ लाने और स्थापित करने के प्रति समर्पित नही हो सकता। स्वार्थ पूर्ति के लिए या तो वे स्वयं साथ छोड़ जाते हैं या उन्हें छोड़ दिया जाता है। छूटने या छोडऩे की कोई सी भी अवस्था के उपस्थित होते ही, ‘गोपनीयता की शपथ’ तार-तार हो जाती है। तब सत्ता और सत्ता में बैठे लोग, राजनीति और राजनीति कर रहे लोग उपहास का पात्रा बनते देखे जाते हैं। भारत में ऐसा स्वतन्त्रता के पश्चात् बार-बार होता रहा है।