लोकतंत्र का प्राणतत्व है- राजनीति, कूटनीति और धर्मनीति

  • 2016-01-13 01:30:35.0
  • राकेश कुमार आर्य

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत में जातिसूचक सम्मेलन तो आयोजित किये जा सकते हैं, किन्तु धर्मसूचक सम्मेलन आयोजित नहीं किये जा सकते। जाति जो कि हमें विभाजित करती है कुछ अपनी विशेषताओं, मान्यताओं और परम्पराओं के आधार पर हमारे लिए सम्मेलन आयोजित करने का उचित आधार बन सकती है। जबकि धर्म जो कि मानवता को मुखरित करने वाले सार्वभौम नियमों का प्रतीक शब्द है हमारे लिए घृणा का शब्द हो गया है। ऐसी स्थिति भारतवर्ष में उन अज्ञानियों की देन है जो कि स्वयं को धर्मनिरपेक्ष मानते हैं। ये लोग सम्प्रदाय ‘हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई’ को धर्म मानते हैं। जबकि वास्तविकता ये है कि सम्प्रदाय ‘मजहब’ का स्थानापन्न है। जो कि हमें एक दूसरे के प्रति संकीर्ण भावों से भरता है। किन्तु धर्म हमें एक दूसरे के प्रति सहिष्णु और विनम्र बनने की सीख देता हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि सम्प्रदाय-मजहब हमें तोड़ता है जबकि धर्म जोड़ता है। इतना बुनियादी अन्तर धर्म और मजहब में है साथ ही धर्म कितना पवित्र और प्यारा शब्द है यह भी स्पष्ट हो जाता है। इसके उपरान्त भी हम धर्म सम्मेलनों के नाम से बिदकते हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति नहीं है तो और क्या है? कुछ तथाकथित विद्वान ऐसे भी हैं कि जो भारत को विभिन्न संस्कृतियों का देश मानते हैं। जबकि सच ये है कि संस्कृतियाँ कभी विभिन्न नहीं हुआ करतीं। संस्कृति सदा एक होती है। यदि वह विभिन्न जातियों, नस्लों, सम्प्रदायों और पंथों के लोगों को बड़ी आत्मीयता से आत्मसात कर लेती है तो इसका अभिप्राय उसका महान होना है। कारण कि वह सभी के साथ सहृदयता और सामंजस्य का बर्ताव करती है। भारतीय संस्कृति ऐसी ही तो है। इसकी इस महानता को इसके गलत व्याख्याकारों ने गलत रूप से प्रतिस्थापित किया है। पफलस्वरूप देश में भाषावाद, क्षेत्रवाद, प्रान्तवाद और जातिवाद के आधार पर राजनीति करने वाले निहित स्वार्थी लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन्हीं आधारों पर ये स्वार्थी रजनीतिज्ञ देश में बहुत सी संस्कृतियों के होने का भ्रम उत्पन्न करते हैं और जाति सम्मेलन कर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करते हैं। इस स्थिति से राष्ट्र की आत्मा आहत है।

तीन शब्द हमें आदिकाल से भारतीय वांग्मय में मिलते हैं-राजनीति, कूटनीति और धर्मनीति। इनमें लगे हुए विशेषण नीति पर विचार करें तो इसका अर्थ है नी=निश्चित, ति=व्यवस्था। कुछ विद्वानों के अनुसार नीति का अर्थ हैं कि अपने हितों की इस प्रकार रक्षा करना कि जिससे दूसरों को कष्ट या क्षति न पहुँचे। किन्तु जब यह नीति शब्द राजनीति, कूटनीति या ध्र्मनीति के रूप में हमारे सामने आता है तो इसके अर्थ बदल जाते हैं। राजनीति में केवल स्वार्थों की या हितों की बातें की जाती हैं। इसीलिए राजनीति में कोई किसी का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। वहाँ
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केवल स्वार्थों को देखा जाता है। स्वार्थ किस प्रकार पूरे होते हैं-इस बात पर ही सबका ध्यान केन्द्रित होता है। जबकि कूटनीति में अपने स्वार्थों और हितों की दूसरे से जबकि कूटनीति में अपने स्वार्थों और हितों की दूसरे से जबकि कूटनीति में अपने स्वार्थों और हितों की दूसरे से बड़ी सावधानी से रक्षा करनी होती है। इतनी सावधानी से कि उसे जरा भी ज्ञात न हो कि कोई मुझसे अपनी बात मनवा गया है। कई बार वार्ता और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से हम कूटनीति के द्वारा एक व्यक्ति को दूसरे के अधिकार छीनते भी देखते हैं। जैसे अमेरिका परमाणु अप्रसार संध् िके माध्यम से भारत की रक्षा के उसके आत्माधिकार को क्षति ग्रस्त कर गया है।

लेकिन धर्मनीति सबसे अलग है। इसमें स्वार्थ की रक्षा नहीं होती। अपितु परमार्थ का ध्यान रखा जाता है। व्यक्ति अपनी वस्तु को भी दूसरे की वस्तु मानता है। किसी भी बुजुर्ग से आप पूछकर देखना कि बाबा यह घर जो उसी का है किसका है? वह तपाक से कहेगा आप ही का है भैया। भारतीय समाज में आप हर क्षेत्र में ऐसी दिव्य भावनाओं को देखेंगे। यह भावनाएँ देवता लोगों की होती हैं। इसीलिए हमारी संस्कृति को देव संस्कृति कहते हैं। इसका एक कारण ये भी है कि इसे देव पुरूषों ने ही निर्मित किया है। ऐसे देव पुरूषों ने जिन्होंने परमार्थ के कारण अपनी अस्थियों का भी दान कर दिया था।

हमने परमार्थ की इस धर्मनीति पर विचार करना बंद कर दिया। इसलिए आज समाज में केवल अनीति है। राजनीति को धर्महीन बना दिया। जबकि राजनीति पर धर्म की नकेल रखनी आवश्यक थी। इसलिए मानवता को मुखरित करने वाले सारे मानवीय मूल्यों से राजनीति हीन हो गयी है। जो लोग राजनीति और धर्म का मेल नहीं मानते वे भारतीयता के शत्रु हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि धर्म और राजनीति दोनों अन्योन्याश्रित है। धर्म लोक कल्याण चाहता है और राजनीति लोक कल्याण को स्थापित करती है। इस प्रकार धर्म विधायिका है तो राजनीति कार्यपालिका है। एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनों के इस स्वरूप की स्थापना युगों की तपस्या, त्याग और साधना के फ लस्वरूप हुई।

बहुत दु:ख की बात है कि जो लोग भारतीयता के विषय में कुछ भी नहीं जानते वे भारतीय संस्कृति के कर्णधार बने बैठे हैं। इस महान देव संस्कृति को विविध संस्कृतियों के रूप में प्रति स्थापित कर रहे हैं और इसके मौलिक स्वरूप में अपने स्वार्थी और दूषित चिंतन का प्रदूषण घोल रहे हैं। फ लस्वरूप भारतीय संस्कृति की गंगा में प्रदूषण वैचारिक स्तर पर बड़े घातक रूप में फैलता और बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रवादी लोग इस अवस्था पर अश्रु बहा रहे हैं। किन्तु स्वार्थी लोग ताली बजा-बजाकर मजा लूट रहे हैं। आने वाले कल में हम देखेंगे कि राष्ट्र के भीतर कितनी राष्ट्रीयताओं का प्रचार-प्रसार हो जायेगा। दलित सेना, रणवीर सेना, प्रताप सेना इत्यादि ये हमारी स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति की परिचायक हैं जिनसे कल को राष्ट्र की एकता को खतरा उत्पन्न होना संभावित है।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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