लोकनिर्णय और मोदी क्रांति

  • 2016-05-28 07:58:51.0
  • राकेश कुमार आर्य

PM_Modi

भारत में राजनीति का अध्यात्म के साथ समन्वय प्राचीन काल से ही रहा है। इसका कारण यह है कि राजनीति का उद्देश्य मानव निर्माण कर एक ऐसा परिवेश उपलब्ध कराना होता है जिसमें व्यक्ति अपना सर्वांगीण विकास करते हुए मानव से देवता बन सके, जबकि अध्यात्म भी यही चाहता है। राजनीति को अध्यात्म की चेरी बनाकर चलने वाले सम्राटों की हमारे देश में लंबी श्रंखला रही है।

ऐसे ही एक सम्राट थे-महाराज सगर के वंशज राजा खटवांग। राजा खटवांग परम धार्मिक और विरक्त स्वभाव के थे। उन्होंने धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। प्रजाभक्ति उनमें कूट-कूटकर भरी थी। ऋषियों के उपदेशामृत को उन्होंने उनके श्री चरणों में बैठ बैठकर पिया था, और उसी के अनुसार वह अपनी जीवनचर्या का निर्वाह करते थे। इसलिए राज्य में कोई व्यक्ति अभावग्रस्त ना रहे इसके लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। फलस्वरूप राज्य में कोई अत्याचार या उत्पीडऩ किसी प्रकार का नही था। राजा शरणागत की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

एक बार देवता असुरों से पराजित होकर उनकी शरण में आ गये। राजा ने अपनी सेना को आदेश देकर असुरों का नाश करा दिया। तब देवताओं ने कहा-‘‘महाराज आपनेे हमारी सहायता कर हमें उपकृत किया है। आप इच्छानुसार वर मांगो।’’

राजा ने कहा-‘‘मैंने अपनी सभी इच्छाएं भगवान के श्रीचरणों में समर्पित कर दी हैं, उसकी भक्ति की भेंट चढ़ा दी हैं। अब मेरी एक मात्र इच्छा यही है कि अंतिम श्वांस तक अपने धर्म (जिसका अभिप्राय राजकीय और मानवीय आचार संहिता के पालन करने से है) का पालन करता रहूं और उसी अवस्था में प्राण त्याग दूं।’’ उन्होंने देवताओं से कहा कि-‘‘कृपा करके मुझे यह बताइये कि मेरी आयु कितनी शेष है?’’

तब राजा को देवताओं ने बताया कि-‘‘राजन आपकी आयु अब मात्र दो घड़ी ही शेष है। आप चाहें तो हम आपकी आयु बढ़ाने का आशीर्वाद वरदान रूप में आपको दे सकते हैं।’’ राजा ने भगवान का ध्यान लगाकर प्रार्थना की कि-‘‘प्रभु मैंने सारा जीवन आपकी भक्ति में बिताया, प्रजा का हित साधन किया। इन अंतिम घडिय़ों में मुझे अपनी शरण में ले लो।’’ देखते ही देखते राजा का शरीर शांत हो गया।

राजा और ईश्वर भक्ति ये दोनों आज के युग में दो विपरीत बातें मानी जाती हैं। जो लोग हम भारतवासियों को ये उपदेश देेते हैं कि राजा और ईश्वर भक्ति का कोई योग नही, वही अपने-अपने देशों में इस बात की पूरी व्यवस्था करते हैं कि ‘राजा’ को गॉड या खुदा के प्रति परम आस्थावान होना चाहिए।

भारत की राजनीति का यह दुर्लभ संयोग है कि उसे प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी एक ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी पुरूष मिले हैं जिनकी ईश्वर के प्रति अगाधनिष्ठा है। उनकी ‘मन की बात’ जब ईश्वर से होती है या होती होगी तो उसमें निश्चय ही मानव-कल्याण राष्ट्रकल्याण और विश्वकल्याण की त्रिवेणी का पावन संगम होता होगा। वह प्रात:काल नित्यप्रति योग करते हैं और उसके पश्चात ध्यान की अवस्था में जाकर 24 घंटे के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं। उनके चेहरे की शांति बताती है कि वे ध्यान योग की अवस्था में लोककल्याण की कामना करते हुए स्वयं को ईश्वर के लिए अंतिम क्षणों तक समर्पित रखने की प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार प्रधानमंत्री श्री मोदी भारत की प्राचीन अध्यात्म परंपरा के संवाहक प्रधानमंत्री हैं।

प्रधानमंत्री श्रीनरेन्द्र मोदी की इस विलक्षण प्रतिभा का ही परिणाम है कि उनके सामने उनके विरोधी टिकते नही है। ईश्वरीय अनुकंपा उनके आभामंडल को दीप्तिमान रखती है। जिसमें आने वाला हर शत्रु ‘शांत’ हो जाता है। हर संकट समाधान में परिवर्तित हो जाता है, हर विरोधी झुक जाता है। आप तनिक विचार करें गोधरा काण्ड की स्याही को। इस स्याही ने उन्हें कितनी देर मानसिक उत्पीडऩ दिया? पर वह उस उत्पीडऩ को झेल गये। परिस्थितियों ने उन्हें दीर्घकालीन धैर्य के पश्चात निर्दोष सिद्घ कर दिया। उन्होंने ‘न्याय’ के लिए प्रतीक्षा की और एक दिन विजयी हुए। उन्होंने कठोर निर्णय लिये हैं और उन निर्णयों के परिणामों को भी पूरी कठोरता से सहन किया है। परिवार को छोडऩा बड़ा कठोर निर्णय था और उस निर्णय पर आज भी अडिग रहना और भी कठोर निर्णय है। ऐसा नही है कि परिवार की इच्छा उनके भीतर ना हो रही होगी और आज भी हो सकती है पर परिवार को उन्होंने अपने लक्ष्य में बाधक माना और आज भी मानते हैं। इसलिए परिवार को विस्तार देकर उसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तक की सीमाओं में ले जाना उनका जीवनोद्देश्य बन गया है।




गोधरा के भूत को जीवित रखरखकर उनके विरोधियों ने उन्हें घेर-घेरकर मारने का पूर्ण प्रबंध किया। अब सारे षडय़ंत्र सामने आ रहे हैं कि पिछली संप्रग सरकार के मंत्री उनकी ‘राजनीतिक हत्या ’ करने के लिए किस-किस प्रकार के निम्नस्तरीय षडय़ंत्रों में सम्मिलित रहे। जैसे ही श्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात से दिल्ली की ओर पग बढ़ाने का निर्णय लिया वैसे ही उनके विरोधियों ने उनके मार्ग में कांटे बिखेरने आरंभ कर दिये। पर नरेन्द्र तो ‘नरेन्द्र’ ही थे इसलिए उन्होंने कांटों के साथ संघर्ष करना आरंभ किया और अपने बढ़ाये पगों  को निरंतर आगे ही आगे बढ़ाते गये। ईश्वरीय अनुकंपा उनके सिर पर थी और उसी के पुण्य प्रताप से मार्ग का हर कांटा और बाधा स्वयं ही हटती चली गयी। बढ़े हुए कदमों को जनता जनार्दन का ऐसा समर्थन मिला कि श्री मोदी स्वयं भी आश्चर्य में पड़ गये कि अंतत: यह हो क्या रहा है?

जब तक भाजपा ने यह नारा गढ़ा कि ‘हर हर मोदी-घर घर मोदी’ तब तक ‘हरि कृपा’ से अभिभूत श्री नरेन्द्र मोदी का घर-घर में प्रवेश हो चुका था। घर-घर नही नर-नर (नर-नारी) की वाणी पर उनका नाम चढ़ चुका था। उनके विरोधियों ने उन्हें घेरने का प्रबंध किया पर श्री मोदी थे कि किसी के बंधन में नही आ रहे थे। उनके विरोधियों ने जितना अधिक शोर मचाया कि-‘मोदी आ लिया, इसे घेरो, पकड़ो और....।’ उतना ही जनता को लगा कि मोदी निश्चय ही किसी क्रांति का नाम है।...और हमने देखा कि 2014 के आम चुनाव से पूर्व घर-घर में ‘मोदी-क्रांति’ की रोटी वैसे ही पहुंच गयी जैसे 1857 की क्रांति से पूर्व क्रांति की सफलता के लिए संदेश के रूप में लोगों ने रोटी को देश के घर-घर में पहुंचाया था। मोदी जी का क्रांतिरथ था कि रोके नही रूक रहा था।

हमसे असहमत लोग कह सकते हैं कि मोदी को इस सबके उपरांत भी वोट तो मात्र 17-18 करोड़ लोगों का ही मिल पाया था? हम मानते हैं कि श्री मोदी को सन 2014 के आम चुनाव में इतना ही वोट मिला। पर यह वोट भाजपा को नही श्री मोदी को मिला था और उस मोदी को मिला था जो गुजरात के मुख्यमंत्री पद से उठकर दिल्ली की ओर चला था। देश के एक प्रांत के मुख्यमंत्री को देश की जनता ने उस प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी से खींचकर दिल्ली की ओर लाने का निर्णय लिया और देश के हर क्षेत्र और हर आंचल के मतदाता ने उनके साथ अपनी सहमति व्यक्त की। ऐसा निर्णय अब से पूर्व देश की जनता ने कभी नही लिया था। देवेगौड़ा को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से उठाकर प्रधानमंत्री बनाने के निर्णय की श्री मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री पद से उठाकर प्रधानमंत्री बनाने के निर्णय से तुलना नही की जा सकती। क्योंकि श्री देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने में राजनीतिज्ञों के स्वार्थ थे और श्री मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में लोक निर्णय प्रभावी था। ऐसा लोकनिर्णय अब से पूर्व कभी नही आया था, इसलिए इस लोकनिर्णय को इतिहास में चमत्कार ही कहा जाएगा।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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