राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-4

  • 2016-09-07 12:30:45.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-4

राकेश कुमार आर्य
''प्रजा को जितेन्द्रिय राजा ही वश में रखता है''
चाणक्य कहते हैं-
''वृद्घसेवाया विज्ञानम्। विज्ञानेन आत्मानं सम्पादयेत।
सम्पादियतात्मा जितात्मा भवति''
वेदवेत्ता विद्वानों से विशेष विद्याज्ञान प्राप्त करके आत्मा की उन्नति करे। आत्मोन्नति से संपन्न (व्यक्ति) ही जितेन्द्रिय हो सकता है।
महर्षि मनु का कथन है :-
इन्द्रियाणांजये योगम समातिएठेदिदवानिशम्।
जितेन्द्रियों हि शवनोतिवशे स्थापयितुं प्रजा:।। ।। 44।। (29)
''जब सभासद और सभापति इंद्रियों को जीतने अर्थात अपने वश में रखके सदा धर्म में वर्ते और अधर्म से हटे हटाये, इसलिए रात-दिन नियत समय में योगाभ्यास भी करते रहे, क्योंकि जो जितेन्द्रिय की अपनी इंद्रियों जो मन, प्राण और शरीर प्रजा है, इसको जीते बिना बाहर की प्रजा को अपने वश में स्थापन करने की समर्थ कभी नही हो सकता।''
(सत्यार्थ प्रकाश 144)

मनु ने स्पष्ट किया है कि राजा को पहले अपने भीतर की प्रजा को जीतने का पुरूषार्थ करना चाहिए। उसकी अपनी प्रजा (मन, प्राण और शरीर) यदि वश में है तो बाहरी प्रजा पर वह बड़ी सरलता से शासन कर सकता है। प्रजा तभी विजय की जा सकती है, जब राजा का मन अपने वश में हो। इस श्लोक का अर्थ यह भी है कि प्रजा पर शासन करने का अर्थ उसे जीतना है और प्रजा को जीतने का अर्थ कभी भी उसे डंडे से जीतना नही है। श्लोक सीधे-सीधे बता रहा है कि प्रजा को जीतने से पहले राजा अपने मन को जीते। कहने का अभिप्राय है कि राजा को प्रजा का हृदयसम्राट होना चाहिए। ऐसा राजा ही जनता में किसी भी प्रकार का विक्षोभ या क्रोध उत्पन्न न होने देता है, और वह जैसे चाहता है जनता वैसे ही करती है। यदि जनता अपने राजा के प्रति क्षोभ व्यक्त करने लगे या राजा के आदेशों का पालन करना बंद कर दे, तो समझना चाहिए कि राजा की नीति और नियत में कहीं दोष है।

इस श्लोक से यह भी स्पष्ट होता है कि राजा की शिक्षा-दीक्षा और उसके सारे कार्य व्यवहार उसे जितेन्द्रिय बनाने वाले हों। जो 'राजा' जितेन्द्रियता की भट्टी में पडक़र सोने से कुंदन बन जाता है वास्तव में राजा कहलाने का अधिकारी वही होता है। कौटिल्य ने भी महर्षि मनु की बात का समर्थन किया है और उनके अनुसार ही अपने प्रसिद्घ ग्रंथ 'कौटिल्य का अर्थशास्त्र' में राजा के जितेन्द्रिय होने को आवश्यक माना है।
इन दोनों महानुभावों से पूर्व अथर्ववेद ने यह व्यवस्था दी है :-
'ब्रह्मचर्येणतपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति।'
(अथर्ववेद 11/5/4/1)
अर्थात राजा ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय रहकर तपस्या से राष्ट्र की रक्षा करता है।
वेद राजा को यदि ब्रह्मचारी, तपस्वी और जितेन्द्रिय होने की व्यवस्था कर रहा है तो स्पष्ट है कि उसने भी राजा से कितनी बड़ी अपेक्षा की है। आज के किसी भी संविधान ने विश्व के किसी भी देश में राजा के लिए इतनी बड़ी 'अग्निपरीक्षा' का विधान नही किया है। कारण स्पष्ट है कि सत्ता के चोरों ने अपने आपको किसी भी 'अग्निपरीक्षा' से ऊपर रखने की व्यवस्था की है। यदि आज के संविधानों में 'राजा' की योग्यता में ऐसी व्यवस्थाओं को सम्मिलित कर लिया जाए तो सारी व्यवस्था ही सीधी होती चली जाएगी।
'अजितेन्द्रिय राजा के व्यसन'
अब जो राजा जितेन्द्रिय नही है, या नही हो सकता उसके भीतर कौन-कौन से दोष आ सकते हैं? इस पर भी विचार किया जाना अपेक्षित है। इसके लिए महर्षि दयानंद सत्यार्थप्रकाश में (144) मनुस्मृति के निम्न श्लोक को उद्घृत करते हैं-
मृगया अक्षोदिवास्वप्न: परिवाद: स्त्रियोमद:।
तौर्यत्रिकं वृथावया च काम जो दशको गण:।। ।। 47।। (32)

इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए महर्षि दयानंद जी महाराज लिखते हैं-''काम से उत्पन्न हुए व्यसन गिनाते हैं,.......मृगया=शिकार खेलना, अक्ष अर्थात चौपड़ खेलना, जुआ खेलना आदि, दिन में सोना काम कथा व दूसरों की निंदा किया करना स्त्रियों का अतिसंग, मादक द्रव्य, अर्थात मद्य, अफीम, भांग, गांजा, चरस आदि का सेवन, गाना-बजाना, व नाच कराना सुनना व देखना, वृथा इधर-उधर घूमते रहना ये दश कामोत्पन्न व्यसन हैं।''

इस श्लोक में मनु स्त्रिय: अर्थात स्त्रियों का अतिसंग करने की बात कह रहे हैं। इसका अर्थ है कि राजा को एक से अधिक विवाह नही करने चाहिए। यदि राजा एक से अधिक स्त्रियों का भोग करेगा तो वह कामज व्यसनों में फंस जाएगा राजा दशरथ ने इस नियम को तोड़ा तो उसका क्या परिणाम निकला? सभी जानते हैं। उस दुष्परिणाम को पुन: न भोगा जाए इसलिए रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी ने अपना विवाह हो जाने पर सूर्पणखा के विवाह प्रस्ताव को सविनय ठुकरा दिया।

इसके पश्चात जब हमारे देश के आर्य राजा बहुविवाह करने लगे तो उसका परिणाम भी क्या आया? यही कि देश को गुलामी के पतनोन्मुखी काल से निकलना पड़ा और लाखों-करोड़ों लोगों को या तो अपना बलिदान देना पड़ा या फिर धर्मांतरण करना पड़ा। हमारा मानना है कि यदि इस देश में राजा अपने राजधर्म से पतित होकर इन देश कामज व्यवसनों में न फंसते तो आज देश की कई समस्याएं जड़ मूल से ही नही होतीं। जो हमारे भाई भय, आतंक या लोभ के कारण कभी मुसलमान बनने के लिए बाध्य हुए वह ना बनते, और ना ही आज देश में इस्लामिक आतंकवाद होता। राजा अपने धर्म से गिरे और अपनी प्रजा के धर्म की रक्षा नही कर सके फलस्वरूप प्रजा विधर्मियों के आतंक के शिकंजे में पिसती रही और उसने अपने ढंग से समय के अनुसार निर्णय ले लिया। कालांतर में ये धर्मांतरित लोग ही मर्मान्तरित होकर अलग देश की मांग करते गये और देश बंटता गया।

राजाओं ने राजधर्म तोड़ा तो राष्ट्र की हानि हुई। राष्ट्र टूट गया। अब जो लोग मनु की बिना सोचे समझे आलोचना करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि मनु को न समझकर या मनु की व्यवस्था का उल्लंघन करके हम देश का कितना बड़ा अहित कर चुके हैं और अब भी मनु को स्थापित करने के स्थान पर उसे उखाडऩे में ही अच्छाई देख रहे हैं, तो क्या भारत को मिटाने का ही ठेका ले लिया है हमने? अच्छी बात यही होगी कि मनु की राज्य व्यवस्था पर बहस चले और सबसे पहले राजनीतिज्ञों को उसे अपनाने के लिए बाध्य किया जाए।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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