क्या यह वही देश है...भाग-2

  • 2015-11-16 02:30:20.0
  • राकेश कुमार आर्य

India-Mapहम अपना चेहरा अवश्य विकृत बना बैठे। आज उसी की परिणति है, गाजियाबाद का नृशंस हत्याकांड। हमने नाटककारों की पूजा की जो केवल अभिनय करते थे उन अभिनेताओं को पूजा और नेताओं को भुला दिया। हमने अपसंस्कृति के नाम पर परोसी गयी ‘परायी सोच’ को पूजा और भारतीयता को भुला दिया। हमने निर्मम और नृशंस बनी व्यवस्था और उसके कानूनों को सम्मान दिया और उसे पूजा। हमने विद्यालयों में यह बताना छोड़ दिया कि विमान की खोज ऋषि भारद्वाज ने की थी, हमने बच्चों को पढ़ाया कि विमान की खोज ‘राइट ब्रदर्स’ ने की थी। हमने विद्यालयों में किसी फिल्म के दृश्य को ‘राइट ब्रदर्स’ दिखाया या किसी गीत को सुनाया और बच्चों की ‘आईक्यू टैस्ट’ के लिए उनसे पूछा कि बताओ ये दृश्य किसका है, या ये गीत किस फिल्म का है?

इस प्रकार अभिनय का झूठ यहाँ सच बनाकर पूजा जाने लगा और सच को कूड़ेदान में फेंक दिया। क्योंकि ‘सच’ के पास फि ल्मी हस्तियों का सा पैसा नही था जो सरकारी भोंपू टी.वी. और मीडिया को वह खरीद सकता, इसलिए सच की कब्र खोदकर उसे दबाया गया। फ लस्वरूप फि ल्मों की अश्लीलता, अभद्रता, हिंसा और आपराधिक कुसंस्कृति का इंजेक्शन इस देश की युवा पीढ़ी की नसों में दिया गया। उसी सोच ने उस समय ‘गाजियाबाद’ को बदनाम किया था।

ऐसी घटनाओं में सचमुच हमारे आदर्शों का हमारी सोच का, हमारी दिशा का और हमारे चिंतन का पता चला करता है और यहि यह सच है तो गाजियाबाद की घटना ने हमें बता दिया था कि हम क्या हैं? और हम कैसे समाज की रचना कर रहे हैं? सत्य के पुजारी इस देश में यहाँ आर्यों को विदेशी बताया गया-ताजमहल को सवाई राजा जय सिंह के पूर्वजों की संपत्ति न बताकर शाहजहाँ के ‘झूठ महल’ (ताजमहल) के रूप में पूजा गया, कुतुबमीनार को वराह मिहिर की वेधशाला न बताकर कुतुबुद्दीन द्वारा बनायी बताया गया। टेलीफोन का आविष्कारक ग्राहम बेल को बताया गया जबकि जगदीश चंद्र बोस ने इसका अविष्कार किया था, धरती के ग्रह और गतिशील होने की जानकारी हमें महर्षि भास्कराचार्य जी से मिली थी, लेकिन इसका श्रेय गैलीलियो को दिया गया, बिजली का आविष्कार महर्षि अगस्त्य ने किया था, लेकिन इसका श्रेय बैंजामिन को दिया गया, स्वयं ईसाई जगत जिस ईसा मसीह के अस्तित्व को लेकर संशय में है, उसे हमने काल्पनिक न मानकर वास्तविक माना। अपने सच को सच कहना जिस जाति में या देश में शर्म की बात माना जाने लगता है, उस जाति या देश की जनता स्वाभिमान के स्थान पर आत्महीनता के भावों से भर जाया करती है और देर सवेर उस जाति या देश के समाज में गाजियाबाद जैसी कहानियाँ जन्म लेने लगती हैं। देश की युवा पीढ़ी को यहाँ ‘कलम चढ़ी संस्कृति’ पढ़ायी जा रही है। अपनी चाल भूलकर दूसरों की चाल का अनुकरण किया जा रहा है। इसलिए सामन्ती व्यवस्था नये परिवेश में नये ढंग से जन्म ले चुकी है। अपराधी और पुलिस, पुलिस और नेता, तथा नेता और अपराधी जहाँ मिलकर कार्य कर रहे हों उस देश में कानून व्यवस्था की स्थिति ढीली होनी स्वाभाविक है। अपराधी को यहाँ अपराध करने पर ‘अपराध बोध’  नही होता, क्योंकि उसे व्यवस्था का ही कहीं न कहीं किसी प्रकार का संरक्षण प्राप्त होता है।

यही कारण है कि अपराधी को देश का समाज भी अपराधी न मानकर उसे काम निकलवाने के लिए प्रयोग कर रहा है। अपराधी राजनैतिक पकड़ बनाता है और लोगों के काम अधिकारियों से कराता है। कई बार अधिकारी भी इतने निकम्मे और कामचोर होते हैं कि वह बिना गालियों के काम ही नही करते। देवभाषा (बिना गालियों की भाषा, प्रेम की भाषा) को कोई सुनता ही नही। यहाँ तो दैत्यभाषा (गाली गलौच) को सुना जाता है। जब ऐसे प्रमादी लोगों को विधि और व्यवस्था में लगाया जाता है तो अपराधी अपराध करता है, उसका मनोबल बढ़ता है और उसकी हिंसा में क्ररता, निर्ममता और जघन्यता आ जाती है। गाजियाबाद में हुई घटना में मरे 7 लोगों को हम अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते है, परंतु साथ ही प्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार से अपेक्षा करते हैं कि अराजकता की ओर बढ़ रहे समाज को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाने के लिए भारतीयता को अपनाने पर बल दिया जाए और पुलिस अधिकारी नेता और अपराधियों के बीच बढ़ रही प्रेम की पीगों को समाप्त कराया जाए, अन्यथा विपत्ति को सँभाला नही जा सकेगा।

(यह लेख ‘उगता भारत’ साप्ताहिक के संबंधित अंक में पूर्व में प्रकाशित किया गया था।)