क्या है वेद विहित धर्माचरण?

  • 2016-06-26 15:30:55.0
  • उगता भारत ब्यूरो

आचार: परमो धर्म: श्रुत्युक्त: स्मार्त एव तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विज।।

वेदों में कहा हुआ और स्मृतियों में भी कहा हुआ जो आचार: आचरण है, परम: धर्म: वही सर्वश्रेष्ठ धर्म है (तस्मात्) इसीलिए आत्मवान् द्विज: आत्मोन्नति चाहने वाले द्विज को चाहिए कि वह (अस्मिन) इस श्रेष्ठाचरण में (सदा नित्यं युक्त: स्यात्) सदा निरन्तर प्रयत्नशील रहे।

कहने, सुनने-सुनाने, पढऩे-पढ़ाने का फल यह है कि जो वेद और वेदानुकूल स्मृतियों में प्रतिपादित धर्म का आचरण करना, इसलिये धर्माचार में सदा युक्त रहे, जो सत्य-भाषणादि कर्मों का आचरण करना है वही वेद और स्मृति में कहा हुआ आचार है।

आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलं अश्नुते।
आचारेण तु संयुक्त: सम्पूर्णफलभाज्भवेत।।

आचारात् विच्युत: विप्र: जो धर्माचरण से रहित द्विज है वह वेदफलं न अश्नुते वेद प्रतिपादित धर्मजन्य सुखरूप फल को प्राप्त नहीं हो सकता, और जो आचारेण तु संयुक्त: विद्या पढ़ के धर्माचरण करता है, वही सम्पूर्णफलभाक् भवेत् सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होता है ।

एवं आचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम।
सर्वस्य तपसो मूलं आचारं जगृहु: परम।।

एवम् इस प्रकार आचारत: धर्माचरण से ही धर्मस्य धर्म की गतिम् प्राप्ति एवं अभिवृद्धि दृष्ट्वा देखकर मुनय: मुनियों ने सर्वस्य तपस: परं मूलम् सब तपस्याओं का श्रेष्ठ मूल आधार आचारम् धर्माचरण को ही जगृहु: स्वीकार किया है ।

विद्वद्भि: सेवित: सद्भिर्नित्यं अद्वेषरागिभि:।

हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत।।

अद्वेषरागिभि: सद्भि: विद्वद्भि: नित्यं सेवित:जिसका सेवन रागद्वेष रहित श्रेष्ठ विद्वान् लोग नित्य करें यो हृदयेन अभ्यनुज्ञात: धर्म: जिसको हृदय अर्थात् आत्मा से सत्य कत्र्तव्य जाने वही धर्म माननीय और करणीय है, तं निबोधत उसे सुनो।

जिसको सत्पुरूष रागद्वेषरहित विद्वान् अपने हृदय से अनुकूल जानकर सेवन करते हैं , उसी पूर्वोक्त को तुम लोग धर्म जानो।

कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता।
काम्यो हि वेदाधिगम: कर्मयोगश्च वैदिक:।।

क्यों कि इह इस संसार में कामात्मता अत्यन्त कामात्मता च और अकामता निष्कामता प्रशस्ता न अस्ति श्रेष्ठ नहीं है, वेदाधिगम: च वैदिक: कर्मयोग: वेदार्थज्ञान और वेदोक्त कर्म काम्य: ये सब कामना से ही सिद्ध होते हैं। अत्यन्त कामातुरता और निष्कामता किसी के लिए भी श्रेष्ठ नहीं, क्यों कि जो कामना न करे तो वेदों का ज्ञान और वेदविहित कर्मादि उत्तम कर्म किसी से न हो सकें, इसलिये।

संकल्पमूल: कामो वै यज्ञा: संकल्पसंभवा:।
व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजा: स्मृता:।।

जो कोई कहे कि मैं निष्काम हूँ वा हो जाऊं तो वह कभी नहीं हो सकता, क्यों कि सर्वे सब काम यज्ञा: व्रतानि यमधर्मा: यज्ञ, सत्यभाषणादि व्रत, यम-नियमरूपी धर्म आदि संकल्पजा: संकल्प ही से बनते हैं, काम: वै निश्चय से प्रत्येक कामना संकल्पमूल: संकल्पमूलक होती है अर्थात् संकल्प से ही प्रत्येक इच्छा उत्पन्न होती है।

अकामस्य क्रिया का चिद्दृश्यते नेह कर्हि चित्।
यद्यद्धि कुरुते किं चित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्।।

क्यों कि यत् यत् किंचित् कुरूते जो-जो हस्त, पाद, नेत्र, मन आदि चलाये जाते हैं (तत्तत् कामस्य चेष्टितम्) वे सब कामना ही से चलते हैं, अकामस्य जो इच्छा न हो तो काचिद्क्रिया आंख का खोलना और मींचना भी न दृश्यते नहीं हो सकता।

मनुष्यों को निश्चय करना चाहिये कि निष्काम पुरूष में नेत्र का संकोच, विकास का होना भी सर्वथा असम्भव है, इससे यह सिद्ध होता है कि जो-जो कुछ भी करता है वह-वह चेष्टा कामना के बिना नहीं है।

तेषु सम्यग्वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम।
यथा संकल्पितांश्चेह सर्वान्कामान्समश्नुते।।

उन वेदोक्त कर्मों में सम्यक् वर्तमान: अच्छी प्रकार संलग्न व्यक्ति अमरलोकतां गच्छति मोक्ष को प्राप्त करता है, च और यथा संकल्पितान् सर्वान् एव कामान् संकल्प की गई सभी कामनाओं को समश्नुते भलीभांति प्राप्त करता है।

वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनां आत्मनस्तुष्टिरेव च।।

सम्पूर्ण वेद अर्थात चारों वेद (च) और (तद्विदां) उन वेदों के पारंगत जिन्होंने 271 से 27224 में प्रिक्त विधिपूर्वक वेदाध्यन किया है, विद्वानों के (स्मृतिशीले) रचे हुए स्मृतिग्रन् अर्थात वेदानुकूल धर्मशास्त्र और श्रेष्ट गुणों से संपन्न स्वभाव (च) और (साधुनाम एवं आचार:)।

श्रेष्ठ सत्याचरण करनेवाले व्यक्तियों की (आत्मन:-त्रुष्टि:) अपनी आत्मा की संतुष्टि एवं प्रसन्नता अर्थात् जिस कर्म के करने में भय, शंका, लज्जा न हो अपितु सात्विक संतुष्टि और प्रसन्नता का अनुभव हो, ये चार (धर्ममूलम) धर्म के मूलस्त्रोत = उत्पत्ति- स्थान या आधार है।

इसलिये सम्पूर्ण वेद, मनुस्मृति तथा ऋषिप्रणीत शास्त्र, सत्पुरूषों का आचार और जिस-जिस कर्म में अपना आत्मा प्रसन्न रहे अर्थात् भय, शंका, लज्जा जिसमें न हो उन कर्मों का सेवन करना उचित है।

देखो! जब कोई मिथ्याभाषण चोरी आदि की इच्छा करता है तभी उसके आत्मा में भय, शंका, लज्जा, अवश्य उत्पन्न होती है, इसलिये वह कर्म करने योग्य नहीं है।

यह श्लोक मनु स्मृति के प्रमुख आधारभूत श्लोकों में से एक है ! यहाँ मनु द्वारा वर्णित धर्म के चार लक्षणों पर मनुक्त मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाता है तथा उनके स्वरुप को स्पष्ट किया जाता है।

धर्म के चार मूल स्त्रोतों या साक्षात लक्षणों में सर्वप्रथम स्थान वेद का है, चारों वेद धर्म निर्णय में परम प्रमाण है, इनको श्रुति भी कहा जाता है, वेद अपौरुषेय अर्थात ईश्वर रचित है, और इन्ही के द्वारा संसार की वस्तुओं,धर्मों का प्रथम ज्ञान प्राप्त होता है। वेद सभी सत्य विद्याओं के भण्डार है, क्यूंकि चारों वेद धर्म के प्रथम मूल स्त्रोत है, अत: इनका कुतुर्क आदि का सहारा लेकर खंडन नहीं करना चाहिए, और इस प्रकार जो वेदों की अवमानना करता है वह नास्तिक है तथा समाज से बहिष्कार के योग्य है।

चारों वेदों के ज्ञाता विद्वानों द्वारा रचित स्मृतियां और उनका श्रेष्ठ गुणसंपन्न स्वभाव धर्म का दूसरा मूल्स्त्रोत है, इन्हें धर्म शास्त्र भी कहते है, जिन विद्वानों ने पूर्ण ब्रह्मचर्य और धर्मपालन पूर्वक वेदों का अध्यन मनन किया है, वहीँ प्रामाणिक धर्म-शास्त्र के प्रणेता हो सकते है तथा वही धर्म विषयक संशय में प्रमाण है, अन्य नहीं। अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेट भवेत।

यं शिष्टा ब्राह्मण: ब्रूयु: स धर्म: स्यादंशकित:।।
धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेद: सपरिबृंहण:।
ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेया: श्रुतिप्रत्यक्षहेतव।।

धर्म का तीसरा मूल्स्त्रोत ‘सदाचार’ है, श्लोक के पूर्व पदों में उक्त भाव के अध्याहार और निम्नलिखित प्रमाणों से यह सिद्ध है कि ‘वेदवेत्ता विद्वानों’ का ‘श्रेष्ठ आचरण’ ही ‘सदाचार’ है, क्यूंकि धर्म के दूसरे लक्षण में वेदवेत्ताओं के स्वभाव को ही धर्म का स्त्रोत माना है। स्वभावानुसारी आचरण होता है, इस प्रकार यह भी वेदवेत्ताओं का होना चाहिए, इसकी पुष्टि स्वयं मनु ने की है ! 17136 (2717) में दिव्य गुणों से युक्त विद्वानों द्वारा सुशोभित देश को ‘ब्रह्मावर्त’ कहा है, उस देश में रहने वाले उन विद्वानों के आचरण को ही ‘सदाचार’ माना है। उन्ही से समस्त शिक्षाएं ग्रहण करने का कथन है, 17120 में भी रागद्वेष से रहित सदाचारी विद्वानों द्वारा सेवित और उन द्वारा ह्रदय से मान्य आचरण को धर्म माना है, वेदों में अपारंगत विद्वानों का आचरण ‘सदाचार’ नहीं कहा जा सकता।
- मोतीभाई रावल

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