यू.पी. के मतदाता किधर जाएंगे

  • 2015-11-21 02:30:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

Voters2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब दूर नही है। सभी पार्टियां चुपचाप तैयारियों में लग गयी हैं। बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों ने विपक्षी दलों को नई ऊर्जा दी है और बिहार में हुए महागठबंधन की तर्ज पर यू.पी. में भी भाजपा को परास्त करने का उपाय विपक्षी दलों को मिल गया है। यू.पी. में भी चुनाव के जातीय समीकरण बनते हैं और सपा बसपा को या कांग्रेस भाजपा को अपनी-अपनी परमपरागत वोटों के साथ कुछ थोड़े और मतों के मिल जाने से ही सत्ता का मिलना अवश्यम्भावी हो जाता है।

2014 के लोकसभा चुनावों में सपा को लोकसभा की मात्र पांच सीटें मिली थीं, पर उसकी वोटों का प्रतिशत 22.2 फीसदी था। जबकि बसपा को 19.6 प्रतिशत मत मिले थे, हालांकि उसे लोकसभा की एक भी सीट प्राप्त न हो सकी थी। अब कहीं कहींराजनीति विश्लेषक यह अनुमान लगा रहे हैं कि यू.पी. में सपा बसपा एक साथ आ सकते हैं, और यदि ये दोनों एक साथ आ जाते हैं तो इनके मतों का प्रतिशत 44.8 प्रतिशत हो जाएगा। तब ये भाजपा को पटखनी देने में सफल हो सकते हैं।

सपा बसपा का उत्तर प्रदेश में साथ आना बहुत दूर की कौड़ी है। पर फिर भी राजनीति में असंभव कुछ भी नही है। इस सबके उपरांत भी यह ध्यान रखना होगा कि यू.पी. में बसपा किसी भी स्थिति में अखिलेश को मुख्यमंत्री देखना नही चाहेगी जैसा कि बिहार में लालू ने नीतीश के लिए मान लिया था कि चाहे सीटें अधिक जा जाएं पर मुख्यमंत्री नीतीश ही होंगे। जिस समय लालू इस प्रकार का ‘शपथ पत्र’ भर रहे थे उस समय उनका अपना आत्मविश्वास भंग था और उन्होंने खोए हुए आत्मविश्वास की स्थिति में नीतीश के सामने घुटने टेकते हुए उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान लिया था। उत्तर प्रदेश में मायावती सपा के डर से यू.पी. विधानसभा में केवल तभी प्रवेश करती है जब उन्हें सरकार बनाने के लिए प्रदेश की जनता अपना निर्णय सुनाती है। वह विपक्ष की नेता के रूप में प्रदेश की विधानसभा में रहना ही नही चाहती है। कहने का अभिप्राय है कि उन्हें केवल मुख्यमंत्री रहते ही प्रदेश विधानसभा में जाना अच्छा लगता है। इसके उपरांत भी उन्हें जनता अपना नेता मानती है, तो इसका कारण यही है कि वह प्रदेश में जातीय समीकरणों का गुणा-भाग लगाने में कुशल हैं। उनका वोट बैंक यह नही देखता कि तुम्हारे लिए मायावती के पास कितना समय है, या वह प्रदेश के लिए कितना समय दे सकती हैं?

यही स्थिति सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव की है उनकी राजनीति भी जातीय ‘समाजवाद’ पर टिकी है। जाति के आधार पर उनके साथ संप्रदाय भी आ जुड़ता है, तुष्टिïकरण भी आ जुड़ता है और इन्हीं अपनी तीनों ताकतों के आधार पर वह राजनीति करते हैं। वह केन्द्र की भी राजनीति करते हैं और अब प्रदेश में बेटे अखिलेश को जमा चुके हैं। सारी दुनिया चाहे आजमखां को उनकी कमजोरन्ी कहे पर वह स्वयं उन्हें अपनी ताकत मानते हैं और यह मानकर चलते हैं कि जितना आजम खां अधिक बोलेंगे उतना ही उन्हें लाभ मिलेगा।

अब आते हैं कांग्रेस की ओर। इसमें नेतृत्व का संकट है। राहुल गांधी चाहे जितना बोल रहे हैं, पर उनके बोलने का कोई महत्व नही है। उनका वाकसंयम  अनर्थकारी है, और तार्किक भाषणशैली के अभाव में वह ऐसा बोल जाते हैं जो किसी भी दृष्टिïकोण से उचित नही माना जा सकता है। नेहरू जी की वंश परंपरा में वह अब तक के सर्वाधिक दुर्बल उत्तराधिकारी हैं। वैसे भाषणशैली की जहां तक बात है तो वह नेहरू जी की भी उत्कृष्टï नही थी। पर वह समय कुछ ऐसा था जब लोगों को उत्कृष्टï भाषणशैली वाले नेता की आवश्यकता भी नही थी। उस समय नेहरू नेता इसलिए थे कि उस समय उनके सामने कोई नेता नही था। सरदार पटेल उन्हें चुनौती देते थे, पर सरदार पटेल 1950 की 15 दिसंबर को संसार से चले गये तो सारा मैदान ही नेहरूजी के लिए खाली हो गया। उनके पश्चात इंदिरा गांधी आईं तो उन्हें लगा कि मैदान में कोई नेता पैदा न होने देना ही सफलता की गारंटी है। क्योंकि उन्होंने अपने पिता से यही संस्कार लिया था। इसलिए उन्होंने अपने सामने कोई नेता पैदा नही होने दिया। उनके पश्चाते राजीव गांधी आए, तो वह समझ नही पाए कि एकच्छत्र राज कैसे किया जाता है, और अपने सामने नेता पैदा होने से कैसे रोके जाते हैं? यही कारण रहा कि वह ना तो नेहरू बन पाए और न ही इंदिरा गांधी बन पाए। जब उनके सीखने का समय आया और सीखकर कुछ-2 तैयार हुए तो वह संसार से चले गये। अब सोनिया गांधी हैं जो अंधेरे में लाठी घुमाते-2 सत्तासुख भोग गयीं। राहुल गांधी, सोनिया गांधी से अंधेरे में लाठी घुमाने की इसी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। नही लगता कि वह अधिक दूर तक कांग्रेस को ले जाने में सफल होंगे। ऐसी परिस्थितियों में राहुल गांधी दिल्ली में केजरीवाल के जीतने पर तालियां बजाते हैं, और बिहार में लालू, नीतीश के जीतने पर मिठाइयां बांटते हैं। कांग्रेस का सत्यानाश कर दिया, फिर भी अंधेरे में लाठी घुमाते-2 मां अपने बेटे को तैयार कर रही है और कब यह लाठी बेटे को मिल जाए, कुछ कहा नही जा सकता।

भाजपा उत्तर प्रदेश के लिए अपना कोई नेता तैयार नही कर रही है। योगी आदित्यनाथ और वरूणगांधी को भाजपा आगे नही लाएगी। वह चाहती है कि उत्तर प्रदेश के लिए कोई ‘खट्टर’ ढूंढ़ लिया जाएगा। यदि भाजपा ऐसा सोचती है तो वह भूल कर रही है। ‘खट्टर’  चाहे कितने ही भद्र पुरूष क्यों न हों, पर राजनीति में लोग चेहरा भी देखते हैं। राजनीति में केन्द्र के लिए लोगों को एक चेहरे की खोज थी, जो उन्हें मोदी के रूप में उचित लगा तो उन्हें केन्द्र सौंप दिया गया। अब मोदी जी को भ्रम हो गया कि तेरा चेहरा ही ग्राम प्रधानी के चुनाव में दिखा दिया जाए तो उचित रहेगा। पर मोदी का चेहरा तो प्रदेशों में भी नही चल सकता। उन्हें लोग प्यार कर सकते हैं, उन्हें अच्छा प्रधानमंत्री मान सकते हैं, पर उन्हें अपना मुख्यमंत्री अपना ही चाहिए। ऐसा मुख्यमंत्री जो संघर्षशील हो और जनता के काम करता हो। बिहार में कोई ऐसा नेता भाजपा के पास नही था तो परिणाम क्या निकला? आज बिहार नेताविहीन है, तो भाजपा शर्मसार है और यूपी में उसका भविष्य बड़ी सहजता से समझा जा सकता है। इस लोकतंत्र के खेल देखिए कि बिहार की जनता ने नीतीश को नकार दिया, उन्हें अपना नेता नही माना, पर वही बिहार के नेता हैं। ऐसी परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश का मतदाता अपनी सत्ता किसे सौंपेगा, यह वह स्वयं भी नही समझ पा रहा है, उसके यक्ष प्रश्न का उत्तर कौन देगा? यह समय ही बताएगा।