केजरीवाल जी! तब क्या कहोगे?

  • 2015-12-17 01:30:06.0
  • राकेश कुमार आर्य

arvind kejriwalजब व्यक्ति का वाचिक तप भंग होता है तो उसके अनेकों शत्रु उसे घेरकर मारने के लिए दण्ड पेलने लगते हैं। वाणी व्यक्ति का सबसे बड़ा मित्र है और सबसे बड़ा शत्रु भी। जब इससे नपे-तुले, संतुलित, मर्यादित और धैर्यपूर्वक विचारे हुए शब्द निकलते हैं तो यह वाणी ही हमसे ईष्र्या या शत्रु भाव रखने वालों तक को हमारा मित्र बना देती है, और जब इससे बिना सोचे-विचारे शीघ्रता से असंतुलित अमर्यादित और कटाक्ष भरे बाण रूपी शब्द निकलते हैं तो यह वाणी ही हमारे मित्रों तक को भी हमार शत्रु बना देती है। व्यक्ति स्वाभिमानी के नाम पर अभिमानी और गंभीर के नाम पर चिड़चिड़ा हो जाता है, उसके अपने व्यक्तित्व का पतन होता जाता है, और उसे स्वयं को भी ज्ञात नही होता कि ऐसा क्योंकि और कैसे हो रहा है?

भारत की राजनीति इस समय ‘बच्चों के’ हाथ का खिलौना बनी हुई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अभी दो दिन पूर्व ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को ‘बच्चा’ कहा था, तो मंगलवार को जब केजरीवाल प्रधानमंत्री मोदी के लिए ‘कायर और मनोरोगी’ कह गये तो पता चला कि उनका अपना स्तर भी क्या है? सारी राजनीति को हमारे जनप्रतिनिधियों ने इस समय ‘बृहन्नला धर्मी’ बना दिया है। देश की जनता इस बृहन्नला नृत्य को देखकर दुखी है।

एक समय था जब सपा के आजम खां और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेताओं को लेकर समाचार पत्रों में लेख छपते थे कि ऐसे लोग भारतीय राजनीति के योग्य नही हैं। यह अलग बात थी कि उनकी इसी योग्यता के कारण उन्हें अपनी अपनी पार्टियों में स्थान मिला हुआ था। पर आज आजम खां और दिग्विजय सिंह दोनों को ही आत्मिक प्रसन्नता हो रही होगी कि उनके ‘स्टाफ’ में अप्रत्याशित वृद्घि हुई है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने देश की संसद में ही झूठ बोल दिया कि उन्हें आर.एस.एस. के कुछ कार्यकर्ताओं ने एक मंदिर में प्रवेश नही करने दिया। उन्हीं की पार्टी के एक बड़े नेता ने उनका यह कथन यह कहकर असत्य सिद्घ कर दिया कि राहुल गांधी स्वयं ही मंदिर के नियमों के अनुसार धोती पहनकर भीतर जाने को तैयार नही थे, जबकि मंदिर प्रबंधक और मुख्य पुजारी ने भी ‘युवराज’ की बात को असत्य बताया।

देश की संसद का कभी इतना भारी अपमान होगा, यह कांग्रेस के महान नेता नेहरू ने अपने प्रधानमंत्री रहते संभवत: कभी नही सोचा होगा। नेहरू की जिस विरासत को राहुल गांधी उठाने को तैयार हो रहे हैं उनके लिए यही उचित है कि वह पहले नेहरू को पढ़ लें। देश की संसद को जाम करके रख देने का अर्थ है अपनी तानाशाही चलाकर लोकतंत्र का गला घोंटना। लोकतंत्र के किसी भी पावन संस्थान को आप बंधक बनाते हैं तो यह आपकी घोर असहिष्णुता है। संसद का विधायी कार्य फिर नही निपट पा रहा है। महत्वपूर्ण बिल अधर में लटक गये हैं, कांग्रेस अपना अलोकतांत्रिक आचरण दिखाकर देश की जनता के साथ अन्याय और अत्याचार कर रही है।

दिल्ली की एक कालोनी में कुछ झुग्गियों को गिरा दिया गया है। इस पर कांग्रेस के राहुल गांधी जब इस कार्य के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और प्रधानमंत्री मोदी को लपेट गये तो दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उन्हें ‘बच्चा’ कह दिया। इस पर राहुल गांधी भडक़ गये।

हमारा मानना है कि झुग्गी झोंपडिय़ों पर कोई राजनीति नही होनी चाहिए। इन्हें दिल्ली से बाहर किया ही जाना चाहिए। रेलवे के इर्द-गिर्द हर शहर में झुग्गी झोंपडिय़ों से निकलने वाले लोग खुले में शौच जाते हैं और सुबह शाम जब ये लोग शौच करते दिखाई देते हैं तो हर किसी को बुरा लगता है। देश में स्वच्छता अभियान के अंतर्गत इन्हें हर शहर में रेलवे की भूमि से उठाकर दूर पुनर्वासित किया जाना उचित होगा। जिसके लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायी जानी अपेक्षित है। हर राजनीतिक दल को इस ओर गंभीरता से विचार करना चाहिए, एक राष्ट्रीय नीति बनाने में अपना रचनात्मक सहयोग देना चाहिए। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का इन झुग्गी झोंपडिय़ों में रहने वालों से मात्र इतना कह देना पर्याप्त नही है कि अबकी बार जब आपकी झुग्गियों को तोड़ा जाए तो आप मुझे बुलायें। पूरा देश जानता है कि इस देश पर सबसे अधिक नेहरू-गांधी परिवार ने ही शासन किया है। और ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर भी ‘गरीबी बढ़ाओ’ की नीतियों पर कार्य किया है। शीला दीक्षित दिल्ली पर दस वर्ष शासन करके गयी हैं, वह एक अच्छी प्रशासिका होकर भी झुग्गी वालों का भला नही कर पायीं।

हमारा मानना है कि झुग्गी झोंपडिय़ों को लेकर स्वस्थ राजनीति हो। प्रथमत: तो ऐसी नीतियां बनें कि झुग्गी झोंपडिय़ों में रहने के लिए कोई अभिशप्त न हो और यदि कोई फिर भी रहता है तो उसे भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं।

अब आते हैं दिल्ली में मुख्यमंत्री के प्रिंसीपल सचिव राजेन्द्र सिंह के कार्यालय में सी.बी.आई. द्वारा मारे गये छापों के प्रश्न पर। इसमें सी.बी.आई. की ओर से गलत कुछ भी नही किया गया है। सी.बी.आई. को ऐसा ही करना चाहिए और अचानक उन ‘मगरमच्छों’ पर छापे डालने चाहिए जो किसी न किसी प्रकार से संदेह के घेरे में आते हैं। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आज जो कुछ भी हैं, उसमें उनके द्वारा भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के विरूद्घ छेड़ी गयी जंग की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि वह आज अपने एक अधिकारी का बचाव करते दिखाई पड़ रहे हैं तो यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही कहा जा सकता। इस  प्रकरण में सर्वाधिक दुखद पहलू यह रहा है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल देश के प्रधानमंत्री मोदी को ‘कायर और मनोरोगी’ कह गये हैं। इतने स्तरहीन शब्दों का प्रयोग देश की राजनीति करने लगी है-इसे देखकर हर संवेदनशील भारतीय को कष्ट हुआ है। मुख्यमंत्री ने अपने बचाव में यह कहा है कि वह एक गांव के परिवेश से निकले हैं, इसलिए उनके शब्द गलत हो सकते हैं। इसका अभिप्राय है कि गांवों में गंवार लोग बसते हैं जिन्हें अपने शब्दों की गरिमा का ध्यान नही होता है। जबकि मुख्यमंत्री को पता होना चाहिए कि इस देश में तीसरी पास रहे कामराज राजनीति के इतने कुशल खिलाड़ी थे कि नेहरू जी भी उनके सामने पानी भरते थे और वही कामराज ग्रामीण परिवेश से ही आये थे, पर उनके शब्द कभी गंवारू नही होते थे। चौधरी चरण सिंह भी ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे चौधरी देवीलाल, रामचंद्र विकल, लालबहादुर शास्त्री, सहित देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद और उन जैसे अनेकों नेता ग्रामीण पृष्ठभूमि से रहकर भी मर्यादित और शालीन भाषा का प्रयोग करते रहे। केजरीवाल जी! देश के 5 लाख ग्रामों और उनमें बसे लोगों का अपमान मत करो, क्योंकि उन्हीं में देश की आत्मा बसती है। राष्ट्रहित में सोचो और उसी के लिए काम करो, अन्यथा दिल्ली की जनता ‘ताज’ छीन लेगी और ‘राज’ हड़प लेगी, तब क्या कहोगे?