‘कौशल विकास’ से पहले ‘राष्ट्रीय चरित्र विकास’

  • 2016-04-10 06:15:09.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

कौशल विकास से पहले ‘राष्ट्रीय चरित्र विकास’

पिछले दिनों देश में जाट आंदोलन चला। यह आंदोलन आरक्षण को लेकर था। जब देश में आरक्षण का जातिगत आधार बनाने की मूर्खता हमारे राजनीतिज्ञों ने कर ही रखी है तो जाटों का भी जातिगत आधार पर आरक्षण प्राप्त करना मौलिक अधिकार था। जिसे अब हरियाणा की खट्टर सरकार ने मान लिया है। अब देश में स्वर्णकार समाज सरकार की ओर से स्वर्णाभूषणों पर लगायी गयी एक प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी को हटवाने के लिए आंदोलनरत है। इन लोगों का मानना भी यही है कि शांतिपूर्ण आंदोलन करके सरकार से अपनी मांगें मनवाना उनका भी संवैधानिक अधिकार है।

हमें जाटों के आरक्षण से कोई आपत्ति नही है, स्वर्णकार समाज की  मांगों से भी हमें कोई आपत्ति नही है। ऐसे आंदोलन लोकतंत्र में उठते ही हैं, और उठते भी रहने चाहिए। परंतु लोकतंत्र और संविधान की उस गारंटी या उसके द्वारा प्रदत्त वह मौलिक अधिकार जिसके द्वारा शांतिपूर्ण सभा आयोजित किया जाना या धरना प्रदर्शन किया जाना हमें मिला है, का अभिप्राय यह तो नही कि आप देश की तीस हजार करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति को आग लगा दें? माना कि हमें कोई अधिकार मिला है, पर उसके साथ दूसरों के भी अधिकार हैं, ‘जीने और आजीविका उपार्जन’ का अधिकार भी तो संविधान सभी को उपलब्ध कराता है। आपने अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हुए कितने लोगों की आजीविका को ही जलाकर खाक कर दिया और कितनी सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाकर अपने ही प्रदेश को विकास की गति में पीछे धकेल दिया, इसका जवाब भी उन्हीं लोगों को देना पड़ेगा, जो शांतिपूर्ण आंदोलन न करके हिंसक आंदोलन कर बैठते हैं। वैसे जातिगत आरक्षण की व्यवस्था को हवा देना राजनीतिज्ञों द्वारा सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का एक उपाय है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय गृहमंत्री जब यू.पी. में जाकर चुनाव पूर्व जाटों को आरक्षण देने का वचन दे रहे थे तभी उन्हें यह सोचना चाहिए था कि इसे पूरा कैसे और कब कराया जाएगा? वह दिल्ली आकर सो गये, जब हरियाणा की आरक्षण की आग ने दिल्ली को सेंकना आरंभ किया तो ‘ठाकुर साहब’ की आंखें खुलीं। पर तब तक उनके दिये वचन की कीमत के रूप में देश तीस हजार करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति को खाक होते देख चुका था।

अब स्वर्णकार समाज की चिंता और धमकी आ रही है कि उसे भी जाटों के रास्ते पर आ जाना चाहिए। उनकी बात में भी दम है-क्योंकि सरकारों का यह रवैया हो गया है कि जब तक आपका आंदोलन हिंसक न हो जाए तब तक वे जागती नही हैं। इसलिए सोती हुई सरकारों को जगाना लोगों के लिए बड़ा कठिन होता जा रहा है। फलस्वरूप लोग हिंसक आंदोलन करने पर उतारू होते जाते हैं।

वैसे देश में मोदी सरकार सुधारों की प्रक्रिया को जिस प्रकार चला रही है, और कालेधन पर अंकुश लगाने का काम कर रही है, स्वर्णाभूषणों पर लगायी गयी एक प्रतिशत की एक्साइज ड्यूटी उसी का एक अंग है। हम नही मानते कि मोदी सरकार ने यह कोई गलत कार्य किया है पर स्वर्णकार समाज की विशेष चिंता यह है कि उसने आम चुनावों के समय मोदी सरकार को अपना समर्थन दिया था। आज मोदी सरकार उन्हीं पर यह शिकंजा कसके उनके साथ गलत कर रही है। स्वर्णकार समाज की इस बात में बल हो सकता है, परंतु यह पूर्ण सत्य नही है। सरकार अपने मतदाता और दूसरों के मतदाता के मध्य अंतर करके निर्णय लेने लगेगी तो देश से लोकतंत्र ही समाप्त हो जाएगा। पर हम मतदाताओं की एक सोच बन गयी है कि सरकारें कठोर निर्णय लें पर उस कठोर निर्णय से हमें बाहर रखें। सारे देश को तो सुधारने के लिए कठोर कानून बनाये जाएं, पर उस कठोर कानून की जद में मैं या मेरा वर्ग ना आए। इसलिए ‘मैं’ ने अपने आपको और अपने स्वार्थों को बचाने के लिए विभिन्न वर्गीय, साम्प्रदायिक, जातीय, संगठन या कर्मचारी, अधिकारी संघ बना लिये हैं, जिससे कि सरकार पर दबाव बनाकर अपना उल्लू सीधा किया जा सके। ऐसे में सरकारी स्तर पर कार्य किया जाना बड़ा कठिन होता जा रहा है।

काल धन रूके और उस पर प्रतिबंध लगे यह तो सब चाहते हैं पर मेरे पास यदि कोई कालाधन है या मैं आयकर की चोरी कर रहा हूं या कोई अपना धंधा चलाकर सरकार को चूना लगा रहा हूं, या अपने सरकारी या निजी कार्य में किसी प्रकार की शिथिलता अपनाकर या उसे विधिक ढंग से न करके अपना व्यवसाय चमका रहा हूं तो उधर सरकारी हाथ न आने चाहिए। ऐसे कैसे देश चलेगा? यह सोच तो उपयुक्त नही कही जा सकती। देश चलाना सरकार की ही जिम्मेदारी नही है, देश चलाना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। हर व्यक्ति को मताधिकार देने का अभिप्राय है कि देश की सरकार में हर व्यक्ति का हिस्सा है। या हर व्यक्ति सरकार का एक हिस्सा है। जिस दिन इस गुत्थी को सीधा कर लिया जाएगा उस दिन बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। अब यदि सरकार (हर नागरिक) ही यह सोचने लगे कि मुझे तो चोरी करने दो या अवैधानिक और अनैतिक कार्य करने दो, पर दूसरों को सुधार दो तो इससे तो सरकार (सारी व्यवस्था) ही दूषित हो उठेगी।

प्रधानमंत्री मोदी इस समय कौशल विकास पर विशेष ध्यान दे रहे हैं, हमारा मानना है कि वे कौशल विकास से भी राष्ट्रीय विकास पर ध्यान दें। सारा देश ही मर्यादा पथ से भटक गया है। सभी का केन्द्र हिला हुआ है, सभी बीमार हैं, इसलिए बीमारी को पहचानकर उसका उपचार किया जाना समय की आवश्यकता है।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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