कश्मीर: ‘नेहरू की ससुराल’

  • 2015-11-23 02:30:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

Jawahar Lal Nehru kashmir15 अगस्त सन 1947 ई. को जो स्वतंत्रता हमें मिली थी, वह लंगड़ी-लूली स्वतंत्रता थी, क्योंकि विभाजित भारत हमें मिला, अखण्ड भारत तो अंग्रेजी साम्राज्यवाद की कुचालों के भूचाल में और सियासत की शतरंजी चालों के सागर में विलीन हो गया था।

कोई दुष्ट दुष्टता करके कहीं छिप गया था। फिर भी शतरंज बिछी रह गयी। चौपड़ सजी रही। फलस्वरूप चालें चली जाती रहीं। राजनीतिज्ञों ने राष्ट्र को ठगा, बार-बार झूठ बोला और उनके द्वारा यह कहा जाता रहा कि-
कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’

कश्यप ऋषि का मर्ग (घर) आज का कश्मीर है। इसका अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास है, गौरवपूर्ण अतीत है। इसके दर्द की बात चली है तो इसके विषय में थोड़ा बहुत जान लेना भी आवश्यक है।

कश्मीर का हजारों वर्ष पुराना इतिहास है जिसमें पिछली लगभग सात शताब्दियों का इसका इतिहास उत्पीडऩ, बलात्-धर्मांतरण और अत्याचारों का इतिहास है। इससे इस धरती के स्वर्ग का वास्तविक स्वरूप ही परिवर्तित हो गया है।

सरदार पटेल हंसी-मजाक में इस पवित्र भूमि को ‘नेहरू जी की ससुराल’ कहा करते थे। क्योंकि नेहरूजी को कुछ विशेष कारणों से कश्मीर से विशेष लगाव था। प्रथम दृष्टया उसका एक ही कारण बताया जाता है कि नेहरू जी कश्मीर की देन थे, इसलिए यह अनुराग था जबकि विशेष अनुराग का यह कारण जंचता नही।

यदि ऐसा था तो फिर कश्मीर के भारत में अंतिम विलय की सारी संभावनाओं को अंतिम और वास्तविक मानकर नेहरू जी इसे अंतर्राष्ट्रीय मंच यू.एन.ओ. में नही ले जाते।

वस्तुत: पटेल साहब के शब्दों में ‘‘नेहरू जी भारत के एकमात्र राष्ट्रवादी मुसलमान थे।’’  अपनी इसी छवि को बनाये व बचाये रखने के लिए राजनीति को बीच में डालकर कश्मीर के प्रति नेहरू जी ने अपना विशेष अनुराग प्रदर्शित किया था।

देखिए श्यामाप्रसाद मुखर्जी के यह शब्द बड़े ही सार्थक हैं कि-

‘‘भारत की एक-एक इंच भूमि पर भारत की 35 करोड़ जनता का अधिकार है, किसी विशेष क्षेत्र में रहने वाली किसी विशेष जाति का नही। कश्मीर भारत में था, है और रहेगा। वे लोग जो भारत में सम्मिलित रहना नही चाहते उनका दिल जहां चाहे वे जा सकते हैं, किंतु अपने साथ भारत की एक इंच भूमि को भी नही ले जा सकते।’’

नेहरू जी विशेष मजहब की ओर आकर्षित थे, जिसने राष्ट्र धर्म के निर्वहन में नेहरू जी से चूक करा दी। जबकि श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सामने केवल और केवल राष्ट्र धर्म ही प्रथम और सर्वोपरि था। इसलिए उनके शब्दों में राष्ट्रधर्म  की गंध मिलती है, जबकि नेहरू जी के विचारों में दोगलापन और दिन में सपने देखने की पुनरावृत्ति स्पष्ट झलकती है।

इस दोगलेपन के कारण शेख अब्दुल्ला के राज में कश्मीर की वादियां शांति का नही अपितु भ्रांति का शंखनाद करने लगीं। कश्मीर की शांत वायु में आतंकवाद की आग लग गयी। कश्मीर धू-धू करके जलने लगा, मजहबी जुनून ने अपना रंग दिखाया और कश्मीर धर्मांतरण से मर्मांतरण की ओर चल दिया, बिना इस बात का ध्यान किये कि-

‘‘मेरा इतिहास भारत का इतिहास है। मेरी संस्कृति शमशीर की नही अपितु देववाणी, वेदवाणी को नि:सृत करने की है। मानव धर्म मेरा सबसे बड़ा धर्म है। मजहब को तो मैं जानती तक नही हूं। भारतीय राष्ट्र पर मेरा भी अधिकार है और मैं स्वयं उसी का एक अंग हूं। उसके बिना मैं और मेरे बिना वह आधे-अधूरे हैं।’’

विभाजित भारत के साथ कश्मीर का दर्द हमने लुभाव में लिया। इस लुभाव को भारत के ‘सैक्यूलर’ शासकों ने लुभाव ही समझा।

इस लुभाव के साथ कितना घाटे का सौदा हमने किया, इस ओर भारतीय राष्ट्र का ध्यान दिलाने का प्रयास नही किया गया बल्कि ये ढोल पीटा गया कि अंग्रेजों को यहां से भगाकर हमने बहुत बड़ा काम कर दिया है। हमें वीर कहो, बहादुर कहो, क्योंकि हमने देश को स्वतंत्र करा लिया है।

इन नगाड़ों के शोर में राष्ट्र को नही समझने दिया गया कि ‘अश्वत्थामा’ मर गया है? अर्थात राष्ट्र खंडित हो गया है। कितना बड़ा छल था? कितना बड़ा धोखा था-राष्ट्र के साथ? जो ऐसा करके दिखा रहे थे वही बाद में ‘राष्ट्रनिर्माता’ और ‘युगनिर्माता’ बन गये। यह उनका सौभाग्य रहा। शायर के शब्दों में राष्ट्र की आत्मा
का इनसे प्रश्न है-


तेरे बुलंद मनसिफ की, खैर हो या रब्ब।

जिसके लिए किया तूने खुद ही को हलाल।।

ऊंचे पद के लिए आपने अपनी अंतरात्मा की स्वयं हत्या कर ली, इसके लिए आपको बधाई।

कश्मीर के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी

नीलमत पुराण के अनुसार प्रजापति कश्यप ने अपनी घोर तपस्या से कश्मीर का निर्माण किया था, यथा-

क: प्रजापतिरदिृष्टी: कश्यपश्च प्रजापति:।

तेनेद निर्मित देशं कश्मीराख्यं भविष्यति।।

जब कभी संपूर्ण उत्तर भारत जल प्रलय से विनष्ट हो गया था, कश्मीर निर्माण का यह प्रकरण उसी समय की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। अत: इसे उस समय आबाद करने में ऋषि को निश्चित रूप से घोर तपस्या ही करनी पड़ी होगी।

इस प्रकार वर्तमान ज्ञात इतिहास में कश्मीर को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यदि ऐसा भी कहा जाए कि भारत के वर्तमान ज्ञात इतिहास में पहला पृष्ठ कश्मीर के नाम से ही आरंभ होता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नही होगी।

कश्यप ऋषि के भागीरथ प्रयास से वितस्ता (झेलम) के आस-पास नगर ग्राम बसाये गये। उनकी नाग जाति का इन नगर ग्रामों के बसाने में विशेष स्थान रहा।

इसके पश्चात उन्हीं के पुत्र नील को इस प्रदेश का प्रथम राजा होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्होंने बड़ी कुशलता से कश्मीर का शासन संभाला, इनकी शासन व्यवस्था और कश्मीर की संपन्नता की ख्याति ने दूर-दूर के देशों का ध्यान आकृष्ट किया।

उन्हीं के नाम से ‘नीलमत पुराण’ की रचना अब से हजारों वर्ष पूर्व की गयी थी, जिसमें कश्मीर के विस्तृत इतिहास की जानकारी दी गयी है। वैसे पुराणों का शोधन करने पर पता चलता है कि इनमें इतिहास और इतिहास की बहुत सी घटनाओं को बहुत अच्छे ढंग से समाहित किया गया है। वास्तव में इन घटनाओं के शोधन परिशोधन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराण वास्तव में इतिहास ही हैं, इनका वैदिक अध्यात्म से कोई संबंध नही है।

नागपूजामत, बौद्घमत, शैवमत जैसे मतों ने इस प्रदेश को सांस्कृतिक रूप से समृद्घ किया। वेदों की ऋचाओं का गान इस रमणीक और शांतिपूर्ण प्रदेश के कण-कण में रचा बसा है।

आज भी वैदिक ऋषियों के तप और त्याग का  व्यापक प्रभाव इस प्रांत के वायुमंडल को सर्वोपयोगी, सर्वहितकारी और सबको लुभाने वाला बना रहा है, हमारे इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है जो विश्व इतिहास में अन्यत्र दुर्लभ है।

हर एक ऋषि को यहीं अपनी तपश्चर्या करने और विद्यादान करने हेतु विद्यालय, विद्यापीठ, शिक्षाकेन्द्र स्थापित करने का एक चस्का सा लग गया था। इसलिए यहां विद्वानों पंडितों की भरमार थी।

कालांतर में सभी कश्मीरियों को पंडित कहे जाने की परंपरा ही चल पड़ी, इसीलिए कश्मीर के हिंदुओं को आज तक भी लोग कश्मीरी पंडित कहकर ही पुकारते हैं। उनका यह नाम कश्मीर के ऋषियों की तपश्चर्या की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।

राजतरंगिणी : राजतरंगिणी के लेखक ‘कल्हण’ ने कश्मीर का इतिहास लिखा। इस ग्रंथ में आगे आने वाले कई विद्वानों ने अपने-अपने समय में कश्मीर के विभिन्न राजाओं के कार्यों का उल्लेख किया। इस प्रकार कश्मीर का इतिहास जानने में कल्हण की राजतरंगिणी का विशेष स्थान है।

जब भी कोई शोध प्रबंध तैयार किया जाता है या कश्मीर के अतीत के विषय में जानकारी लेने की इच्छा व्यक्ति के भीतर जाग्रत होती है तो, राजतरंगिणी उसका विशेष मार्गदर्शन करती है। महाभारत के युद्घ से पूर्व कश्मीर में ‘गोनंद’ नामक राजा था। इसने श्रीकृष्ण के विरूद्घ जरासंध का भी साथ दिया था। इसके पश्चात इसके
दामोदर’ नामक लडक़े ने कश्मीर पर शासन किया।

गोनंद को भी श्रीकृष्ण द्वारा ही मारा गया था तो इस दामोदर का विनाश भी उन्हीं के द्वारा हुआ। क्योंकि इसने उन पर उस समय हमला कर दिया था जब वह गंधार में एक विवाह संस्कार में सम्मिलित होने के लिए गये हुए थे। इसके पश्चात श्रीकृष्ण के द्वारा दामोदर की पत्नी रानी ‘यशोमती’ को कश्मीर की गद्दी पर बिठाया गया। यह रानी उस समय गर्भवती थी, जिसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसे इतिहास ‘गोनंद द्वितीय’ के नाम से जाना गया। कल्हण के अनुसार गोनंद द्वितीय के बाद 35 राजा हुए। इनमें से 23 राजा पांडव वंश के थे। मार्तण्ड तथा भव्य मंदिरों के भग्नावेश  पांडवलरी या ‘पांडव भवन’ कहलाते हैं।

अर्जुन के प्रपौत्र ‘हरनदेव’ जो कि हस्तिनापुर के राज्य के लिए अपने भाई जन्मेजय से लड़ा था, हस्तिनापुर से भागकर यहां पहाडिय़ों में आ छिपा था। यही एक दिन गोनंद की सेना में भर्ती होकर प्रधानमंत्री के पद पर पहुंच गया था। गोनंद द्वितीय के पश्चात यही प्रथम पांडव शासक के रूप में कश्मीर के अंदर स्थापित हुआ। यहां का शंकराचार्य मंदिर पाडव नरेश संदीपन की देखरेख में बनाया गया था। भीमसैन इसी वंश का एक ऐसा शासक था, जिसके समय में कश्मीर का राज्य विस्तार होकर वह दूसरे देशों तक फैला। इसके पश्चात इस भव्य प्रांत पर सम्राट अशोक का भी आधिपत्य रहा। उसके पश्चात कनिष्क, मिहिरकुल, मेधवाहन, दुर्लभवर्धन जैसे शासकों ने भी कश्मीर पर अपनी अच्छी बुरी छाप छोड़ी। इसके पश्चात अरब हमलावरों का मुख मोडऩे वाला महान शासक चंद्रापीड कश्मीर को मिला। इसके सन 713 में चीनी दरबार में अपना एक दूत इस आशय से भेजा था कि चीन की सहायता से वह अरब से युद्घ करे।

गोपीनाथ श्रीवास्तव जी के अनुसार चीन भी इस महान शासक की महत्ता को स्वीकार करता था। यह एक न्यायप्रिय शासक था। अरब आक्रमणों को रोकने के लिए चीन की सैनिक टुकडिय़ों कश्मीर के राजा चंद्रापीड़ की सहायतार्थ पहुंची। इससे पूर्व हर्षवर्धन की केन्द्रीय सत्ता के अधीन कश्मीर को रहना पड़ा था।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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