कश्मीर में हिंदू शरणार्थियों की समस्या

  • 2016-02-10 03:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

आजादी में भी पीड़ा होती है इस सत्य को जितना अधिक पाकिस्तान से 1947 में आया हिन्दू शरणार्थी समझ सकता है, उतना कोई अन्य नहीं। अपने देश में बेगाने बनकर रहने से कितना दर्द होता है, ये उनसे पूछा जा सकता है। भारत की सरकार का इन शरणार्थियों के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार आज तक निरन्तर जारी है। भारत की स्वतन्त्रता के काल में भी हर वर्ष पन्द्रह अगस्त का सूर्य इनके लिए वैसे ही निकलता है जैसे औरंगजेब के यातनापूर्ण काल में तत्कालीन हिन्दुओं के लिए निकला करता था।

बांग्लादेश से आये लगभग तीन करोड़ लोग देश के लिए बिना बुलाये मेहमान हैं। वोटों के सौदागर नेताओं के लिए देश की संसद या किसी राज्य की विधानसभा में पहुँचने का ये लोग अच्छा साधन हैं, किन्तु पाकिस्तान से आये अपने लोग उनके लिए बेगाने हैं। मेहमानों को बसाना, खिलाना और पिलाना इनके लिए धर्मनिरपेक्षता है और अपनों की बात को सुनना साम्प्रदायिकता है। यद्यपि सभी समझते हैं और जानते भी हैं कि इन लोगों ने जिस प्रकार की क्षति देश को पहुँचाई है या पहुँचा रहे हैं उसकी पूर्ति होना असंभव है। पंडितों, विद्वानों, तत्वदर्शियों और गूढ़ रहस्यों के जानने वाले आप्त पुरूषों का प्रदेश कश्मीर आज दानवता के दावानल से ग्रस्त है। मूल निवासियों को वो सुविधाएँ उपलब्ध् नहीं है जिनके वह अधिकारी हैं।
kashmiri pandit


1953 में जम्मू कश्मीर की सरकार ने यह कानून बनाया था कि राज्य की विधानसभा के चुनाव में वही नागरिक मतदाता होगा जो कि जम्मू कश्मीर का स्थायी नागरिक होगा। स्थायी नागरिक वही माना जायेगा जो कि सन् 1944 से पहले वहाँ का स्थायी नागरिक था। इस प्रकार पाकिस्तान से आये 2 लाख हिन्दू शरणार्थियों को अपने राजनीतिक भाग्य के निर्णय से वंचित कर दिया गया। दुर्भाग्यवश ये बेचारे समय के मारे आज तक इस पीड़ा को झेल रहे हैं। सारा भारत चुप है।

दुर्भाग्य का दौर यहीं नहीं थमा अपितु यह तो मात्र प्रारम्भ था। आगे भी क्या हुआ- आप देखिये। सन् 1954 में कानून बनाया गया कि सीमा पार से आये शरणार्थी के बच्चों को छोडक़र सभी लोगों के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जायेगी। 1976 में कानून बना कि बुढ़ापा और विकलांग पेंशन उन्हीं को मिलेगी जो कि राज्य में 1944 से पूर्व से स्थायी निवास कर रहे हैं। लगता है कि वृद्घावस्था और विकलांग जनित असहायावस्था में सम्मिलित नहीं है। सारे मानवाधिकारवादी संगठन और बुद्घिजीवी इस व्यवस्था पर आश्चर्यजनक रूप से मौन हैं। जम्मू कश्मीर में ये स्थिति है और प. बंगाल में या पूर्वोत्तर के प्रान्तों के उन जिलों में जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों ने स्थानीय जन सांख्यिकीय आंकड़ों को बिगाड़ा है, वहाँ मानदण्ड दूसरे हैं। वहाँ मानवाधिकारों की बातें होती है। समानता की बातें होती है। क्यों?

24 नवम्बर 1976 ई. में एक कानून बना कि जिन लोगों के हाथ पाँव या शरीर का कोई अंग टूट गया है और व्यक्ति अपंग हो गया है तो राज्य सरकार (हिन्दू शरणार्थी को छोडक़र) उन्हें स्थायी नागरिकता के आधर पर कृत्रिम अंग उपलब्ध् करायेगी।

सन् 1976 में ही शेरे कश्मीर शेख अब्दुल्ला ने कानून बनाया कि जिन शरणार्थियों को पहले जमीन पर किरायेदार माना गया था अब उनसे किरायेदारी का अधिकार वापिस लिया जाता है।

इसे कहते हैं राज्य के अत्याचार। जब शासक शोषक, उत्पीडक़ और अत्याचारी हो जाता है, तब समाज में शोषण, उत्पीडऩ और अत्याचार का बोल-बाला बढ़ा करता है। परिणाम हम कश्मीर में देख रहे हैं वहाँ के तथाकथित मूल निवासियों के द्वारा (अपवादों को छोडक़र) जिस प्रकार हिन्दू लोगों के साथ दमन और अत्याचार किया जा रहा है वह तथ्य अब किसी से छुपा नहीं है। वहाँ के राजकीय कानूनों में जो प्रावधान है उनसे अलगाववादी और हिन्दू दमनकारी शक्तियों का मनोबल बढ़ता है और परिणाम आता है: हिन्दुओं पर अत्याचार के रूप में। टी.वी. पर फैंचकट विद्वान कभी इन बिन्दुओं पर आपको चर्चा करते नहीं मिलेंगे। उन्हें नरेन्द्र मोदी तो सद्दाम नजर आता है पर जो वास्तविक सद्दाम है, उन्हें वह सद्दाम कहने का साहस नहीं जुटा पाते। राष्ट्रहित इसी में है कि जो कोई भी गलत है उसे गलत ही माना जाये।

कानूनों का ये सिलसिला आगे भी थमा नहीं है। 1980 में कानून बनाया गया कि गाँवों का नम्बरदार वही व्यक्ति बन सकता है जो कि राज्य का स्थायी नागरिक होगा। जहाँ हिन्दू शरणार्थी बहुसंख्या में निवास करते थे वहाँ भी बाहरी तथाकथित मूल निवासी को ही उन पर थोप दिया गया। अपनी बात और अपने दर्द को अपने आप शासन प्रशासन से कहने के मौलिक अधिकार से भी उन्हें वंचित कर दिया गया। 15 दिसम्बर 1984 को नियम बनाया गया कि बीस सूत्री कार्यक्रम के अन्तर्गत उन्हीं निर्धनों को कानूनी सहायता नि:शुल्क दी जायेगी जो कि राज्य के स्थायी नागरिक हैं। हिन्दू शरणार्थी पुन: एक अधिकार से वंचित कर दिए गए। एक और नियम कि 1947 में पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थी या उनके बच्चे जम्मू कश्मीर में कोई सरकारी नौकरी नहीं कर सकते, यहाँ तक कि चपरासी भी नहीं बन सकते हैं।

शेष भारत में आप देखिये क्या हो रहा है। मुस्लिमों को उनकी जनसंख्या की प्रतिशतता के आधार पर देश के बजट का 15 प्रतिशत भाग दिया जायेगा। अर्थात् उन पर व्यय किया जायेगा, लेकिन जम्मू कश्मीर में आर्थिक शोषण हिन्दू का जारी रहेगा क्योंकि उसने गलती ये की थी कि वह पाकिस्तान से अपने देश के लिए आ गया था। जिसे उसने अपना समझा था उसमें आकर सर्वाधिक बेगाना और सर्वाधिक असुरक्षित हो गया है। जिस कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों ने इस 15 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को भारत में लागू करने का राष्ट्रघाती निर्णय लिया है उनसे उचित रूप से पूछा जा सकता है कि यही बात वह जम्मू कश्मीर में उपेक्षा और उत्पीडऩ के शिकार बने लोगों के प्रति क्यों नही करते? राष्ट्रधर्म से च्युत वातानुकूलित भवनों में बैठे लोग ऐसा नहीं करा सकते। क्योंकि ये वही लोग हैं जिन्होंने 1954 में धारा 370 के आधार पर भारत के संविधान की धारा 35ए जोड़ दी थी। जिसके आधार पर जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान से आये लोगों को मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया था।

उजाडऩे वाले हाथों से बसाने की आशा करना चील के घोंसले में मांस ढूँढऩे के समान है । जिन्होंने माँगों का सिंदूर धो डाला, घरों को उजाड़ दिया, जीवन में निराशा निशा की गहरी अँधियारी रात पसार दी वो हाथ भारतीय लोकतंत्र की पावन ज्योति को पकडऩे के पात्र नहीं है।
जिन्हें दर्द का अहसास नहीं होता वो चिकित्सक नहीं हो सकते हैं। मरीज की चिल्लाहट को भी जो साम्प्रदायिकता के आधार पर बुरी और कम बुरी के रूप में देखने के अभ्यासी बन गए हों
, वो शासक के रूप में नकारा सिद्घ हो चुके हैं। भारत की जनता इस सत्य को समझे। आज भी बहुत से लोग कश्मीर में ऐसे हैं जो स्वतंत्रता के सही अर्थों को जानना चाहते हैं। उनकी दृष्टि स्वतंत्रता के सूर्य के उगने की बाट जोह रही है। लेकिन उनसे जितना दूर 1947 होता जा रहा है उतनी ही निराशा उनके जीवन में गहराती जा रही है। कौन जानेगा उनका दर्द? कौन बतायेगा उन्हें स्वतंत्रता के इस काल में उनके इन प्रश्नों का सही अर्थ और कौन समझायेगा उन्हें जीवन के आदर्श? यह सारे प्रश्न बड़े मार्मिक हैं। स्वतंत्रता के इस काल में उत्तर हमें खोजना होगा। यदि यह प्रश्न निरूत्तरित रहा तो स्वतंत्रता भी अधूरी रहेगी। हमें स्मरण रहना चाहिए कि कश्मीर के इन हिन्दू शरणार्थियों की समस्या राष्ट्र की समस्या है।