कर्तव्यहीन, बदतमीज पुलिस

  • 2016-01-23 11:00:56.0
  • राकेश कुमार आर्य

देश में पुलिस विभाग की असभ्यता और क्रूरता की कहानियां समय-समय पर आती रहती हैं। जिन्हें सुनकर हर संवेदनशील व्यक्ति का हृदय कराह उठता है। कितने ही स्थानों पर तो अपराध कराने में सीधे पुलिस सहायक होती है। ऐसी घटनाएं भी घटित हुई हैं जब लूट, हत्या, डकैती और फिरौती जैसे जघन्य अपराधों में पुलिस की वर्दी सीधे-सीधे बदनाम हुई है। पुलिस की ऐसी घटिया बातों को देखकर लगता है कि जब ‘रक्षक ही भक्षक’ बन जाएगा तो देश का क्या होगा?

पर वास्तव में पुलिस विभाग की स्थापना अंग्रेजों के द्वारा अपने हित में की गयी थी अर्थात भारतवासियों के लिए यह विभाग रक्षक न होकर भक्षक ही था। इसे भारत के क्रांतिकारियों को पकडऩे, मारने और इस कार्य के लिए पुरस्कार पाने का काम दिया गया था। जो व्यक्ति अंग्रेजों के विरूद्घ किसी प्रकार के षडय़ंत्र में सम्मिलित होता था, उसकी यह विभाग गुप्तचरी कराता था और उस पर पूरी नजर रखता था। दांव लगने पर उसे या तो मार डालता था या फिर उठाकर जेल की सींखचों के पीछे डाल देता था। इसलिए ‘खाकी वर्दी’ देश में अपने जन्मकाल से ही घृणा की दृष्टि से देखी जाने लगी। इस खाकी वर्दी को देश में आईपीसी (भारतीय दण्ड संहिता) को समझने और लागू कराने का काम दिया गया था।

भारतीय दण्ड संहिता 1860 में भारत में 1857 की क्रांति में सम्मिलित होने वाले क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ाने या कठोर दण्ड देने के उद्देश्य से लागू की गयी थी। इस कानून को अंग्रेजों को उससे पूर्व आयरिश पीनल कोड के नाम से आयरलैंड में लागू किया था, उसका संक्षिप्त नाम भी आईपीसी ही था। इस कानून में जहां-जहां ‘आयरिश’ शब्द लिखा था बस वहां ‘इंडिया’ लिखा गया और इसे ज्यों का त्यों भारत में लागू कर दिया गया। इस कानून को लागू करने से पूर्व भारतीय कानून और भारतीय न्याय प्रणाली देश के लिए काम करने वाले क्रांतिकारियों को दण्ड न देकर उन्हें सम्मानित कर रही थी। तब अंग्रेजों को लगा कि भारत में उनकी अपनी न्याय प्रणाली और अपने जज हों और अपना कानून हो, तभी वह भारतीय क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका सकते हैं। इस पर अंग्रेजों ने भारत में ‘राज्य के विरूद्घ अपराध’ जैसा एक अध्याय तैयार किया और राष्ट्र के स्थान पर राज्य शब्द का प्रयोग करते हुए हमारे क्रांतिकारियों को पुलिस की सहायता से फांसी पर चढ़ाने लगे।
police


अंग्रेज यह जानते थे कि भारत की सेना अब से पूर्व भी कई बार अपने देशवासियों का पक्ष ले चुकी थी। यहां तक कि 1857 की क्रांति में भी कई स्थानों पर देश की सेना ने अपने देशवासियों का पक्ष लेकर क्रांति की ज्वालाओं को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। इसलिए आईपीसी को देश में लागू कराने व देशभक्तों को फांसी पर चढ़ाने का अपराध हमारी सेना नही कर सकती थी। यही कारण रहा कि सेना को अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से ‘बैरकों’ तक सीमित रखा, उससे कह दिया गया कि तुझे उस समय बाहर निकलना है जब देश पर बाहरी संकट आये। अंग्रेज जानते थे कि बाहरी संकट के समय देश की रक्षा करना और अंग्रेजों के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करना भारत की सेना की विवशता होगी। इसलिए उसका प्रयोग उन्होंने वहीं किया और अपने तात्कालिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुलिस का प्रयोग करना आरंभ किया।

हमारे देश में शत्रु को पराजित करने और देशविरोधी लोगों को या विदेशियों को देश से बाहर करने के लिए हर व्यक्ति को अपने पास हथियार रखने की छूट प्राचीन काल से ही थी, अब से पूर्व कितनी ही बार जनसाधारण ने स्थानीय स्तर पर अपनी सेनाओं का गठन किया और विदेशियों से जमकर टक्कर ली थी। देश के लोगों की इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए अंग्रेजों ने पुलिस के माध्यम से, हथियारों के रखने पर रोक लगा दी। सदियों से नही युगों से दशहरा पर शस्त्रपूजन करता आया हिंदू समाज इस प्रकार दशहरा पर भी लाठी डंडे की पूजा करने तक ही सीमित कर दिया गया। अपने परिवार की सुरक्षार्थ भी हथियार रखना अवैध घोषित कर दिया गया। इस प्रकार पूरे देश का नि:शस्त्रीकरण कराने में पुलिस ने अपने मालिकों (अंग्रेजों) का पूरा-पूरा सहयोग दिया। यही कारण था कि भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर, अशफाक उल्लाखां जैसे अनेकों क्रांतिकारियों के विषय में पुलिस को जब यह सूचना मिलती थी कि उनके पास हथियार हैं, तो वह उनके पीछे पड़ जाती थी। कहने का अभिप्राय है कि देशभक्तों को फांसी दिलाना अंग्रेजों के समय में पुलिस का प्रमुख कार्य था।

इस प्रकार पुलिस विभाग के मूल संस्कार ही ऐसे हैं जो इस देश के लायक नही हैं। उन्होंने साधूनाम परित्राणाम विनाशाय च दुष्कृताम्’ अर्थात साधु सज्जनों का कल्याण करना, उन्हें संरक्षण देना और दुष्टों का संहार करना, अपना राष्ट्रीय संकल्प बना लिया है, पर व्यवहार में वह सज्जनों का उत्पीडऩ और दुष्टों का संरक्षण करती दिखाई पड़ती है। जिससे जनसाधारण में पुलिस के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न नही हो पाया है, और पुलिस को लोग अपना मित्र नही मान पाये हैं।

हमारा मानना है कि हर विभाग में भले लोग भी होते हैं, इसलिए पुलिस भी इस सिद्घांत का अपवाद नही है। कुछ अच्छे लोग इसमें भी हैं। ये लोग बिना किसी पक्षपात के और बिना किसी उत्पीडऩात्मक कार्यवाही के भी अपने कार्यों को भली प्रकार निभाते हैं, जिन्हें देखकर इनके प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न होता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए और पुलिस में भी सदा बुरे लोग ही नही होते हैं, इस बात को सत्य सिद्घ करते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक सैय्यद जावेद अहमद ने सभी पुलिसजनों को एक पत्र लिखा है। जिसमें वह लिखते हैं कि जब तक थानों की कार्यशैली में सुधार नही होगा, आदर्श पुलिसिंग को हकीकत नही बनाया जा सकता। थाने आने वालों की पीड़ा को धैर्यपूर्वक विनम्रता से सुना जाय और विनम्रता को पुलिस अपना कत्र्तव्य समझकर कार्य करे। डीजीपी कहते हैं कि थानों में अपराधों को शत-प्रतिशत दर्ज करना अपराध निवारण का सबसे बड़ा सूत्र है।

अपराधों के विषय में देखा जाता है कि पुलिस वाले जनसाधारण को थानों से बाहर भगाने का हरसंभव प्रयास करते हैं। थानों में किसी व्यक्ति की प्राथमिकी बिना सुविधा शुल्क लिए दर्ज हो जाए, और वास्तविक पीडि़त व्यक्ति की रपट पहले दर्ज हो जाए इसे भी आजकल एक उपलब्धि माना जाने लगा है, जिसे पुलिस की गिरती साख का ही प्रतीक माना जाना चाहिए। डीजीपी की यह चिंता उचित ही है कि थानों में शत-प्रतिशत रपट दर्ज न होने से अपराध बढ़ रहा है। यदि पीडि़त व्यक्ति की रपट पर निष्पक्षता का प्रदर्शन करते हुए पुलिस यथासंभव उचित कार्यवाही कर दे, तो बहुत से अपराधों को घटित होने से पूर्व ही रोका जा सकता है।

डीजीपी लिखते हैं कि कांस्टेबल और हैड कांस्टेबल हीन भावना से दूर रहें। नकारात्मक सोच त्यागें और तय कर लें कि कानून का राज सुनिश्चित करना है। अपराधों  पर अंकुश लगायें, साम्प्रदायिक सौहार्द बनायें, और तकनीकी आधारित यातायात प्रणाली को विकसित करें। डीजीपी के विचार स्वागत योग्य हैं। ऐसी सकारात्मक और ऊर्जान्वित करने वाली सोच के परिणामस्वरूप ही हम समाज में पुलिस के प्रति सम्मान भाव को उत्पन्न कर पाएंगे और पुलिस के प्रति यह भावना जगा पाएंगे कि पुलिस हमारी भक्षक न होकर रक्षक अथवा मित्र है। डीजीपी महोदय के लिए उचित होगा कि वह अपने सेवाकाल में ही पुलिस सुधार के लिए कुछ और ठोस कार्य करें।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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