कलाकारों के सम्मान से संवरेंगी लोक कलाएं

  • 2016-07-02 09:30:45.0
  • उगता भारत ब्यूरो

कलाकारों के सम्मान से संवरेंगी लोक कलाएं

जब तक कलाकार खुद को आर्थिक रूप से सबल व सामाजिक रूप से सम्मानित महसूस नहीं करेगा, तब तक हम कला शैलियों का संरक्षण-संवद्र्धन नहीं कर सकते। हमारे कलाकार व समृद्ध कलाएं किसी भी सूरत में अन्य प्रदेशों की तुलना में कम नहीं हैं। आवश्यकता है तो सरकार के छोटे से प्रयास कीज्

कला व संस्कृति किसी भी समाज का दर्पण होते हैं। जो समाज कला व सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, संपन्न होता है, वह तीव्र गति से विकास करता है। जहां कला व कलाकारों का सम्मान होता है, विकास के साथ-साथ परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान होता है तथा सांस्कृतिक सरंक्षण होता है, वह जागृत चेतन व संवदेनशील समाज होता है। कलाकार समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं, जो उस समाज की संस्कृति को प्रतिबिंबित करते हैं। जिस प्रकार हम आभूषणों को सुंदरता के लिए प्रयोग करते हैं, उसी तरह कलाएं हमारे जीवन का शृंगार करती हैं। हमारा खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा, आस्थाएं, मान्यताएं, जीवन मूल्य, जीवन दर्शन, जन्म से मरण तक के संस्कार, मेले, त्योहार व उत्सव ही हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं, जो कि लोक कलाओं तथा लोक कलाकारों के माध्यम से लोक नाट्यों, लोक गीतों, लोक नृत्यों, लोक वाद्यों तथा लोक साहित्य के रूप में लोक संचार करती हैं। परंपरागत लोक संस्कृति के लिए हिमाचल प्रदेश एक समृद्ध राज्य है। हिमाचल में जहां प्राकृतिक संरचना, जलवायु तथा भौगोलिक रूप ये यह प्रदेश विविधता को धारण किए है, वहां खान-पान, परिधान, बोलियों, धार्मिक आस्थाओं तथा विभिन्न संस्कृतियों को भी अपने-आप में धारण किए हुए हैं, परंतु गंभीरता से विचार करने पर लगता है कि अपार सांस्कृतिक धरोहर होने के बावजूद भी हम अभी तक इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का मूल्य नहीं समझ पाए हैं और भौतिकवादी विकास की चकाचौंध की संस्कृति ने हमें परंपरागत रूप से पीछे धकेल दिया है।


देवभूमि में विभिन्न प्रकार के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों की धरोहर को संजोने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार आगे आई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निर्देश पर परिवहन मंत्री जीएस बाली की अगवाई में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के संरक्षण के लिए एक नीति निर्माण के लिए एक अच्छी शुरुआत हुई है। निश्चित रूप से यह पहल सरकार की संवेदनशील सकारात्मक सोच को प्रतिबिंबित करती है। प्रदेश में कोई भी मेला, त्योहार, उत्सव, धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक उत्सव तथा राजनीतिक आयोजन बिना लोक वाद्यों की मधुर ध्वनि के संपन्न नहीं होता। हमारी पहाड़ी संस्कृति में कोई भी खुशी व शोक, उल्लास व जन्म से मृत्यु तक कोई भी संस्कार लोक वाद्यों की मधुर ध्वनि के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। मांगलिक कार्यों में लोक वादक विभिन्न वाद्य यंत्रों से अवसर की शोभा को बढ़ाते हैं, लेकिन जनमानस के जीवन में मंगल ध्वनियों का संचार करने वाले वादकों के जीवन की कुंडली में अभाव का अमंगल बैठा ही रहता है। हमारे लोक कलाकारों, लोक गायकों व लोक वादकों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति अभी भी अच्छी नहीं है। अभी भी कलाकारों को उचित मान-सम्मान, स्थान, पारिश्रमिक व मानदेय नहीं मिलता। कला व कलाकारों को पहचान दिलाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने होंगे।

लोक कलाओं के विकास तथा लोक कलाकारों को उचित मान-सम्मान व पहचान दिलाने के लिए प्रदेश में नीति निर्धारण के वक्त कुछ अहम बिंदुओं पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले लोक वाद्यों के संरक्षण से पूर्व विभिन्न लोक वाद्यों के वादकों का संरक्षण होना अत्यावश्यक है। जब तक लोक वादक आर्थिक रूप से संपन्न नहीं होंगे, वाद्यों का संरक्षण होना बेमानी है। लोक कलाकारों को सम्मानजनक पारिश्रमिक देकर ही इन वाद्यों के वादन के लिए आकर्षित व प्रेरित किया जा सकता है।

विभिन्न प्रकार की कला शैलियों तथा उनके परंपरागत कलाकारों को सृचीबद्ध किया जाना चाहिए तथा उन शैलियों को संरक्षित करने के लिए परंपरागत कलाकारों को आमंत्रित कर नए कलाकारों के प्रशिक्षण के लिए क्रमिक रूप से कार्यशालाओं का होना चाहिए। कला व संस्कृति से संबंधित सभी विभागों को चुस्त-दुरुस्त तथा जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। सांस्कृतिक संरक्षण, संवद्र्धन व विकास फाइलों में नहीं, बल्कि कलाकारों की मंच प्रस्तुतियों में दिखना चाहिए। विभागों को केवल अपनी वार्षिक सारिणी में निश्चित कार्यक्रमों को आयोजित कर इतिश्री नहीं करनी चाहिए, बल्कि भविष्य के लिए कारगर योजनाओं के साथ पूर्व नियोजित व चरणबद्ध तरीके से कार्य करना होगा।

जिला स्तर पर लोक सांस्कृतिक अधिकारियों के पदों का सृजन कर उन्हें लोक कलाओं के समग्र विकास की जिम्मेदारी देकर जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। लुप्त हो रहे वाद्यों, गायन शैलियों व कलाओं को लिखित रूप में या रिकार्डिंग के माध्यम से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। लोक कलाओं के संरक्षण, संवद्र्धन व विकास के लिए कलाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को शोध व खोज के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जब तक कलाकार अपने आपको आर्थिक रूप से सबल व सामाजिक रूप से सम्मानित महसूस नहीं करेगा, तब तक सच में हम कला शैलियों का संरक्षण, संवद्र्धन व विकास नहीं कर सकते। हमारे कलाकार व समृद्ध कलाएं किसी भी सूरत में अन्य प्रदेशों की तुलना में कम नहीं हैं। आवश्यकता है तो सरकार के छोटे से प्रयास की।
- सुरेश शर्मा