कैसे मंदिर टूटा सपनों का...

  • 2016-06-27 03:30:26.0
  • राकेश कुमार आर्य

नेहरू जी ने अपने समय में एक नारा हिन्दुस्तान और चीन के विषय में दिया था-‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’। उसका परिणाम निकला सन 1962 ई. की पिटाई। इंदिरा जी ने पुन: ऐसा ही खेल खेला, बांग्लादेश की स्वतंत्रता के उपरांत वहां की सत्ता सन 1946-47 ई. के कलकत्ता और नोआखाली के हिंदू संहारक शेख मुजीबुर्रहमान को सौंप दी। इस व्यक्ति को ‘बंगबंधु’ कहा गया। शब्दों से खेलना और वाकजाल में जनता को फंसाकर उसको मूर्ख बनाना हमारे राजनीतिज्ञों की हमेशा विशेषता रही है। अत: कभी के देश के हत्यारे को ‘बंधु’ बना लिया और आज वही ‘बंधु’ विषैले नाग बने बैठे हैं और भारत का अन्न खाकर भी भारत पर ही गुर्रा रहे हैं।

इस राष्ट्र के राजनीतिज्ञों और शासकों की यह धूत्र्ततापूर्ण नीति भारत में इस्लाम के आक्रमण अर्थात सन 712 ई. से ही रही है कि गलती करो और गलती करके उसे भूल जाओ। जहां इस गलती से शिक्षा ली जानी चाहिए थी, वहां दुर्भाग्य से ऐसा कभी नही किया गया। अत: इतिहास को बार-बार अपने को दोहराने के लिए हमने विवश किया।

हमारी मान्यता है कि इतिहास अपने आपको नही दोहराता है, उसे स्वयं को दोहराने के लिए हम स्वयं विवश करते हैं। ‘सांझी संस्कृति’ के अलम्बरदार सांझावाद का झांसा देकर राष्ट्र की अस्मिता से खिलवाड़ करते रहे और राष्ट्र लुटता रहा। इतिहास अपने आपको दोहराता रहा।

हमारे पास विकृत इतिहास है

इस देश में ऐसे लोग बहुतायत में हैं जो इस देश के इतिहास की भयंकर भूलों के परिष्कार को ‘सांझा संस्कृति’ में दखल समझते हैं। ऐसी सोच के लोगों को फासीवादी और तालिबानी कहा जाता है, जो भूलों का परिष्कार चाहते हैं उन्हें साम्प्रदायिक कहा जाता है। इन्हीं नही पता कि-

  • फासीवादी कौन है और फासीवाद क्या है?

  • तालिबानी कौन है और तालिबान क्या है?

  • साम्प्रदायिकता क्या है और राष्ट्रवाद क्या है।

  • धर्मनिरपेक्षता क्या है और धार्मिकता क्या है?

  • राष्ट्र को पंथनिरपेक्षता की आवश्यकता है,
    अथवा धर्मनिरपेक्षता की?

  • दिशाविहीन नेतृत्व और दिशाविहीन राष्ट्र की परिणति क्या होगी?


यह सब आज सोचकर आत्मा कांप उठती है। स्वतंत्रता के छह दशक पश्चात जिस देश के नेतृत्व ने इन बिंदुओं पर अपनी स्पष्ट नीति आज तक निर्धारित नही की, उसका भविष्य कितना उज्ज्वल होगा और उसे अपनी निजता से कितना मोह है? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

यह मत पूछो कि कैसे मंदिर टूटा सपनों का।
औरों की बात नही है, यह किस्सा है अपनों का।।


सचमुच इतिहास की विकृतियों को यथावत बनाये रखने में यहां अपनों का ही हाथ रहा है। यहंा शास्त्रार्थ की स्वस्थ परंपरा नही डाली गयी। यहां तो निष्कर्षों से पूर्व निर्णय ले लिये जाते हैं। अनुभवी और मंजे हुए लोगों का यहां सम्मान नही है, विभिन्न विषयों और क्षेत्रों के विशेषज्ञों का सेवा निवृत्ति के पश्चात यहां सम्मान नही है, अपितु चाटुकार और चमचों का बोलबाला है। विभिन्न विषयों और क्षेत्रों के विशेषज्ञ सेवा निवृत्ति के पश्चात यहां अपने ‘ड्राइंग रूम’ में पड़े आराम करते हैं। उन्हें राष्ट्र के लिए सर्वथा अनुपयोगी समझकर निष्प्रयोज्य भंडार में डाल दिया जाता है। जबकि उनके अनुभवों से राष्ट्र को लाभान्वित करना चाहिए था।

यहां पर कोई कितने ही प्रयास करे, कुछ बातें ऐसी हैं जो अनसुलझी हैं, किंतु फिर भी उन पर स्वस्थ बहस नही हो सकती। यदि फिर भी बहस कराने का प्रयास आपने किया तो समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं-जो आपके प्राणों के शत्रु हो सकते हैं। इन अनसुलझी पहेलियों के कुछ उदाहरण निम्नवत हैं -

भारत निवासी मुसलमानों के पूर्वज कौन हैं, यदि ज्ञात है तो फिर रहस्य पर पर्दा क्यों? स्पष्ट किया जाए कि इस पर्दे के उठने से सामाजिक समरसता बढ़ेगी या विषमता? विषमता तो बढऩी नही, तो फिर समरसता से परहेज क्यों? यह स्पष्टतया कट्टरपंथियों के समक्ष घुटने टेक देने की नीति है। इसको जितना शीघ्र त्याग दिया जाएगा उतना ही राष्ट्रहित में होगा।

भारतीय मुसलमानों के हिंदू पूर्वज कौन थे? यह भी आज एक विचारणीय प्रश्न है। जिसने सारे हिंदू समाज की नाक में दम किया हुआ है। दूसरी बात है कि देश ने जिस संविधान को स्वतंत्रता के पश्चात के  दशकों से अपने कंधों पर ढोया है उसमें अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्टे्रलिया, स्विटरजरलैंड जैसे देशों की मनीषा बोलती है। उधारी प्रतिभा और उधारी मनीषा हमारे विवेक और बुद्घिवाद पर प्रश्नचिन्ह है। उधारी सोच इस राष्ट्र की समस्याओं का निदान करने में समर्थ नही सकती है। यह इस संविधान ने दिखा दिया है। फिर भी हम कहते फिरते हैं कि-

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’

एक डर है, एक भय है उस छद्म धर्मनिरपेक्षता को, जो धर्मनिरपेक्षता का झण्डा उठाये चल रही है कि यदि गौतम, कणाद, कपिल, मनु, याज्ञवल्क्य, गीता, रामायण, महाभारत का दर्शन संविधान में दीख गया तो इसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को खतरा हो सकता है। यहां ‘शरीयत’ जीवित रह सकती है-उससे पलने वाले सिमी, हुर्रियत, जैसे संगठन जीवित रह सकते हैं, किंतु धर्मनिरपेक्ष शासन में वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत और ऋषियों की स्मृतियों को जीवित रखना राष्ट्र के स्वरूप से एक निंदनीय खिलवाड़ मान लिया जाता है। यह प्रवृत्ति राष्ट्र के लिए सचमुच भयानक है। यह भारत की निजता के साथ धोखा और छल है।

तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता काफिला क्यों लुटा।
हमें रहजनों से गरज नही बस! तेरी रहबरी का सवाल है।।


हमारे रहबरों के पास संभवत: इसका कोई उत्तर नही होगा। हो भी नही सकता। अपने ही छल और कपट से जब संकटों की दीवारें सामने आती हैं तो साहसी व्यक्ति भी अपने पापों को अपने सामने दीवार के रूप में खड़ा देखकर निरूत्साहित हो जाता है। इसलिए इनके अनुत्तरित रह जाने पर शायर ने ही उत्तर दिया-

मैं बताऊं कि कारवां क्यों लुटा? तेरा रहजनों से था वास्ता।
हमें रहजनों से गिला नही, क्योंकि तेरी रहबरी का सवाल है।।


रहजनों से वास्ता था इसलिए काफिला लुट गया। इससे बड़ी गाली और प्रश्नवाचक चिन्ह नेताओं के लिए और कोई नही हो सकता।

सारी विधि व्यवस्था ही चरमरा गयी है
काफिला लुट गया। प्रतिष्ठा लुट गयी। नारीत्व को तंदूर में झोंक दिया गया। क्यों? कानून बनाकर कानून बनाने वाले वातानुकूलित भवनों में प्रविष्ट हो जाते हैं। तत्पश्चात वे सब स्वयं और उनके चाटुकार सभी मिलकर कानून की धज्जियां उड़ाते हैं। क्योंकि कानून निर्माता होने के कारण कानून उन पर लागू नही होता, उनकी ऐसी मान्यता है। विधि के शासन की स्थापना में जिनका विश्वास है उन्हीं के मुंह पर तमाचा मारते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय को यदि यह कहना पड़े कि ‘सारी विधि व्यवस्था ही चरमरा गयी है’ तो यह राष्ट्र की आत्मा का करूण क्रंदन ही माना जाएगा। कानून व्यवस्था की ढिलाई से गरीब का पेट कमर में लगा जाता है-ऐसा जाल उसके चारों ओर फैल चुका है। उसे नित्य प्रति शिकंजे में कसने और उसका खून  निकालने का पूरा प्रबंध इन नेताओं के द्वारा कर लिया गया है। सारा लोकतंत्र ही पूंजीतंत्र में बदल चुका है।

किसी को रोटी के हैं लाले, किसी को फिक्र है कफन की।
मुन्किर हुए हैं फर्ज से हम, ना फिक्र है किसी को वतन की।।

वतन की चिंता पूंजी एकत्र करने की होड़ में तिरोहित होकर रह गयी है। हर क्षेत्र में माफियाओं का बोलबाला है। हमने शहीदों के खून का उचित सम्मान नही किया, ये उसी का परिणाम है। यदि उनके साथ हम न्याय कर पाते तो हमें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्र की कीमत का अनुमान हो पाता।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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