जातिसूचक नहीं विशेषणसूचक है आर्य शब्द

  • 2015-12-28 04:00:18.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

मान्यतायें संस्कारों का विषय है।इसी कारण मान्यताओं को संस्कृति कहा जाता है। मान्यतायें संस्कार जन्य होती हैं । भारतीय संस्कृति में संस्कारजन्य कुछ विशेष बातें यथा,परमात्मा, जीवात्मा, कर्मफल, पुनर्जन्म, धर्मयुक्त कर्म करने से उन्नति अर्थात श्रेष्ठ जीवन प्राप्त होना और अधर्मयुक्त कर्म करने से निम्नकोटि का जीवन प्राप्त होना, दस धर्म का आचरण, आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समचारेत, परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् , वेद को ज्ञान का स्रोत मानने वाला, स्वाध्याय प्रमाद: , प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी: आदि बातों के पालन करने के गुण सन्निहितहैं जिन्हें ग्रहण किया जाये तो वे मान्यतायें बन जाती हैं।वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वालों, परमात्मा और जीवात्मा के अस्तित्व पर विश्वास करने वालों, कर्मफल और पुनर्जन्म को स्वीकार करने वालों, मानव के लिए निर्धारित दस धर्मों पर आचरण करने वालों को हिन्दू कहा जाता है। भारत में रहने वाले और इन विचारों को माने वालों का हिन्दू नाम विगत दो सहस्त्र वर्ष से चला आ रहा है। इससे पूर्व हिन्दू को भारतीय, आर्य अथवा वेदानुयायी कहा जाता था। किन्तु नाम बदल जाने से अस्तित्व का आधार तो नहीं बदल जाता। उदाहरणार्थ गुजरात में जन्मा एक बालक का नाम उसके माता-पिता ने मूलशंकर रखा था, परन्तु बाद में ज्ञान-विज्ञान के मूल वेदों का अध्येता वह बालक स्वामी दयानन्द सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार गुजरात में ही जन्मा एक बालक मोहनदास करमचन्द गाँधी आगे चलकर महात्मा गाँधी के नाम से जाना जाने लगा। इस प्रकार इन व्यक्तियों के नाम तो बदल गए किन्तु ये शारीरिक रूप से वही रहे जो थे। इसी प्रकार वेदमतानुयायी, भारतीय और हिन्दू समानार्थक शब्द हैं । भारतीय और हिन्दू नाम तो स्थान के उद्बोधक हैं, तदपि वेद के साथ इन नामों का अटूट सम्बन्ध होने के कारण ये तीनों नाम समानार्थक ही समझे जाते हैं। प्रत्येक हिन्दू के नामकरण संस्कार के अवसर पर वेदमंत्रों का उच्चारण किया जाता है। यह भारतीय परम्परा है, फिर भी कुछ भ्रमग्रस्त जन वेद को भारतीय और हिन्दू से पृथक अर्थ वाला मानते हैं, जो कतई उचित नहीं कहा जा सकता। उसका कारण यह है किभारतवर्ष में रहने वाले और हिन्दू नाम से जाने जानेवाले लोगों में मूल रूप में वेद ही जीवन का विधि-विधान बताने वाले हैं। उदाहरणार्थ, हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के एक श्लोक में इस विषय पर कहा गया है-

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधै: पृथक् ।

ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चतै: ।। श्रीमद्भगवद्गीता 13-4

अर्थात - ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से वर्णन किया गया, वेदमंत्रों द्वारा तथा अनेक प्रकार से पृथक्-पृथक् रूप में ब्रह्मसूत्रों में कहा गया और तर्क द्वारा निर्धारित किया गया विषय ही इस गीता में कहा गया है।

इस दृष्ठि से हिन्दू समाज में उन सबकी गणना की जा सकती है, जो इन सब अथवा इनमें से किसी एक साधन द्वारा अपने जीवन में प्रेरणा पाता है। वेदमंत्रों द्वारा ऋषियों ने जीवन जीने की विधा बखान की है। वेदोक्त ऋत, ब्रह्मसूत्रों के मन्त्रों में वर्णित बातें सब एक ही परिणाम पर पहुँचाने वाली होती हैं। वह परिणाम है वेद, भारतीय अथवा हिन्दू।

आर्य का अर्थ है श्रेष्ठ। मानवता एक जीवन-विधि हैऔर उसमें भी श्रेष्ठ विधि आर्य है । इससे सिद्ध होता है कि आर्य तो विशेषण मात्र है। आर्य भारतीय अथवा आर्य हिन्दू कहा जा सकता है। आर्य न होते हुए भी अर्थात मानवता उत्कृष्ट न होते हुए भी भारतीय और हिन्दू हो सकता है। आर्य होने से श्रेष्ठ भारतीय और श्रेष्ठ हिन्दू का अभिप्राय लिया जा सकेगा। एक और बात, कोई व्यक्ति मानता है कि मानव के दस धर्मों के अन्तर्गत धैर्य रखना अथवा सत्य बोलना धर्म का लक्षण है। परन्तु किसी कारणवश अथवा मानवीय दुर्बलता के कारण सत्य बोलने में त्रुटि रह जाती है और उसमें असत्य का मिश्रण हो जाता है, तब भी, इस त्रुटिपूर्ण व्यवहार के होने पर भी यदि मानव मानता है कि सत्य बोलना धर्म है, धैर्य धारण करना धर्म है, ऐसे व्यक्ति के व्यवहार को दोषपूर्ण मानते हुए भी, जब तक अपनी मान्यताओं में इन कर्मों को अपना धर्म मानता है और उनपर आचरण के लिए प्रयत्नशील रहता है, उसे हिन्दू, भारतीय अथवा वेदानुयायी ही माना जायेगा । इसका मुख्य कारण यह है कि जीवन परिपूर्ण नहीं है, इसमें अपूर्णता रह जाती है।

जब तक मनुष्य का मुख मान्यताओं की ओर है अर्थात वह उन मान्यताओं के पालन का यत्न करता है तब तक वह हिन्दू ही है। इसका अभिप्राय यह है कि जब तक हिन्दू का मुख अपनी मान्यताओं की ओर है वह उसकी पूर्णता की ओर अग्रसर है। यह दूसरी बात है कि कोई दस पग आगे बढ़ा हुआ हो सकता है और कोई दस पग पिछड़ा हुआ, यद्यपि उसकी त्रुटि छम्य नहीं मानी जा सकती किन्तु वह त्रुटि उसको हिन्दू होने से वंचित नहीं कर सकती।

मनुष्य यद्यपि अपूर्ण है, तदपि वह पूर्णता की ओर कदम बढ़ा रहा है। जब तक वह उचित दिशा में चल रहा है, अर्थात वेद धर्म का पालन कर रहा है, वह हिन्दू ही है। वह कितना आगे अथवा कितना पीछे है, यह प्रश्न उसके हिन्दू होने से सर्वथा पृथक् है । आर्य उसको कहा जा सकता है जो अपनी मान्यताओं में दक्ष है। अर्थात जो अपने कर्मों का अधिक दक्षता के साथ पालन करता है। ध्यातव्य हो कि विभिन्न देशों की कुछ विशेषतायें होती हैं, उन्हें परम्परायें कहा जाता है। इस दृष्टि से जो आदिकाल से भारतवर्ष में रहते आये हैं उनकी भी कुछ परम्परायें हैं। परम्परायें भी दो प्रकार की होती हैं । एक वे हैं जिनका सम्बन्ध व्यवहार से है और दूसरी परम्परायें वे हैं जिनका सम्बन्ध मान्यताओं के साथ है। व्यवहार मान्यताओं के अनुकूल होना चाहिए, किन्तु वह शत-प्रतिशत मान्यताओं के आधार पर हो, यह आवश्यक नहीं है। इसका कारण यह है कि मनुष्य की अपूर्णता के कारण यह संभव है। तदपि जब तक मनुष्य के सम्मुख मान्यताओं की बात है और वह पूर्णता की ओर अग्रसर है तब तक उसको उन मान्यताओं का पालक ही कहा जायेगा। इसीलिए व्यवहार से पृथक् भी मान्यताओं का होना संभव हो सकता है और उन मान्यताओं के पोषक को ही भारत देश में रहने का अधिकार है । इस देश के वासी इसको होटल जैसा अस्थायी निवास  अथवा प्रजनन की सुविधा जैसी कोई अस्पताल नहीं मानते। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में देश का सम्बन्ध निवास से सम्बंधित न होकर मान्यताओं से सम्बंधित माना गया है।

संसार भर के अन्य देशों के लोग क्या मानते अथवा क्या नहीं मानते, यह हमारे विचार का विषय नहीं है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान का ही उदाहरण लिया जा सकता है। वहाँ जो इस्लाम का समर्थक नहीं है वह द्वितीय श्रेणी का नागरिक माना जाता है। इतना ही नहीं, कुछ देश तो ऐसे हैं  जहाँ यदि व्यक्ति सुन्नत न कराये तो उसको नागरिकता का अधिकार प्राप्त नहीं होता। कुछ ऐसे भी देश हैं जो धनोपार्जन तथा उसके भोग पर किसी प्रकार की सीमा का निर्धारण करते हैं, ऐसे देश स्वयं को समाजवादी देश कहते हैं। फिर किसी अन्य देश में वही मानने की स्वीकृति है जो वहाँ के शासक उचित मानते हैं। अत: अन्यान्य देशों की मान्यतायें क्या हैं और क्या नहीं हैं, इनसे हमारा सम्बन्ध नहीं है ।परन्तु पुरातन भारतीय परम्परा के अनुसार भारत देश का नागरिक होने के लिए कुछ ऐसी मान्यताओं का पालन करना आवश्यक है जो कि परम्परा के द्वारा निर्धारित कर दी गई हैं और वे मान्यतायें अतिप्राचीन काल से इस देश में प्रचलित हैं।

अशोक “प्रवृद्ध” ( 99 )

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