जन-गण-मन अधिनायक.....

  • 2016-07-13 03:30:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

jan gan man adhinayak

दिसंबर 1912 ई. में भारत की राजधानी कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को बनाया गया था। तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम इसके औपचारिक उद्घाटन के लिए तब भारत आये थे। जिनके स्वागत में भव्य ‘दिल्ली-दरबार’ का आयोजन किया गया था। हमारे तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं ने लयबद्घ होकर उनके सम्मान में जो गीत ‘जन-गण-मन.......’ गाया था वही आजकल हमारा ‘राष्ट्रगान’ बना हुआ है। अर्थात-

उपनिवेशवादी संस्कृति में ‘भारत भाग्य-विधाता’ ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम को स्वीकार करने वाला गीत। यदि ऐसा है तो फिर इस गीत में अपना क्या है? ऐसा क्या आकर्षण है कि पराधीनता के दिनों के प्रतीक इस गीत को आज तक हम छाती से लिपटाये हुए हैं?

परिवर्तित परिस्थितियों और परिवेश में हमें अपना नया राष्ट्रगान लिखने की आवश्यकता थी। अब प्रश्न है कि हमारा राष्ट्रगान कैसा हो? प्रसंग है, इसलिए यजुर्वेद का यह मंत्र, यहां प्रस्तुत कर रहा हूं-‘‘ओ३म् आ ब्रहन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आराष्ट्रे राजन्य: शूरअइषव्योअतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानस्वानाशु: पुरन्धिर्योषा जिष्णु रथेष्ठा सभ्ये यो युवास्य जयमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऔषधय: पच्यंतां योगक्षेमो न: कल्पताम्।।’’


इसका हिंदी काव्यमय अर्थ निम्नलिखित है-
ब्राहन्! स्वराष्ट्र में हो, द्विज ब्रह्म तेजधारी।
क्षत्रिय महारथी हों अरिदल विनाशकारी।।
होवें दुधारू गौएं पशु अश्व आशुवाही।

आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही।।
बलवान सभ्य योद्घा यजमान पुत्र होवें।
इच्छानुसार वर्षे पर्जन्य ताप धोवें।।
फलफूल से लदी हों औषधि अमोघ सारी।
हो योग क्षेमकारी स्वाधीनता हमारी।।

इस राष्ट्रीयगान और प्रचलित राष्ट्रीयगान में मौलिक अंतर है, उसे देखना भी उचित होगा। जो कि इस प्रकार है-

वैदिक राष्ट्रगान में हम जगन्नियन्ता शक्ति ईश्वर से राष्ट्र के लिए कुछ मांग रहे हैं। जबकि प्रचलित राष्ट्रगान में जन-गण-मन के अधिनायक (तानाशाह) की जय बोल रहे हैं।

ब्राह्मण हमारे राष्ट्र में ब्रह्मा तेजधारी हों, जो मानव समाज में व्याप्त अज्ञान के शत्रु से लडऩे की सामथ्र्य रखते हों। अरिदल विनाशकारी हमारा क्षत्रिय समाज हो।

यह वही क्षत्रिय समाज है जो मानव समाज में व्याप्त अन्याय से लडऩे में समर्थ है। साथ ही अभाव के शत्रु से लडऩे वाला वैश्य समाज दुधारू गौओं पशु-अश्व-आशुवाही (आज के परिवेश में दुपहिया, चौपहिया वाहनों से) पूर्णत: संपन्न हो।

हम देखते हैं कि भारतीय समाज के इन स्तंभों को सुदृढ़ करने और मानव समाज के तीनों शत्रुओं (अज्ञान, अन्याय व अभाव) से लडऩे की प्रार्थना हमारे प्राचीन वैदिक राष्ट्रीयगान में है, इस गीत में सारे राष्ट्र का एक खाका खींचा गया है, जबकि हमारे प्रचलित वर्तमान राष्ट्रीय गान के अंत में कह दिया गया है कि-

‘‘गाहे तब जय गाथा’’

हम सारे के सारे हे, महामहिम! ब्रिटिश सम्राट (जार्ज पंचम) तेरी जयगाथा गा रहे हैं। तुझे अपना सब कुछ मान रहे हैं।
आने वाले कल के भारत की संतति कैसी हो? इस विषय में वेद का राष्ट्रीयगान तो प्रेरणा भी देता है और संकल्प भी दिलाता है कि हमारी संतति बलवान हो, सभ्य हो, योद्घा हो और यजमान हो। जबकि प्रचलित राष्ट्रगान इस विषय में सर्वथा मौन है। आने वाले कल की संतति के सुधार के लिए हमने कोई संकल्प नही लिया। फलस्वरूप संतति तेजोहीन, आभाहीन, कांतिहीन, असभ्य व असंस्कारित बना डाली। कल का भारत कैसा होगा? उत्तर लिखते हुए लेखनी कांपती है।

‘इच्छानुसार वर्षे पर्जन्य ताप धोवें,’ की पंक्ति के भावों को स्थान देकर हमारे वेदों ने तो पर्यावरण प्रदूषण से लडऩे और उस पर विजय प्राप्त कर प्रकृति को अपने अनुसार और स्वयं को प्रकृति के अनुसार चलाने और ढालने का संकल्प लिया, किंतु प्रचलित राष्ट्रगान के रचयिता और गायकों का इस ओर ध्यान ही नही गया। वह सोच भी नही सकते थे कि ऐसा होना भी संभव है या नही?

स्पष्ट है कि इस पंक्ति में प्रकृति और अंतरिक्ष विज्ञान के गूढ रहस्यों की ओर वेद ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है इससे प्राकृतिक आपदाओं को रोका जा सकता है। हम यज्ञों के द्वारा इच्छानुसार वर्षा कराने में यदि समर्थ होंगे तो बहुत सी समस्याओं और व्याधियों का निदान सहज में ही हो जाना संभव है।

वनस्पति जगत हमारे स्वास्थ्य के लिए ईश्वर की अनुपम देन है। हर वनस्पति किसी न किसी रोग की औषधि है। मनुष्य इस प्राणी जगत में सब प्राणियों में सबसे अधिक बुद्घिमान है। इसलिए इन सबका संरक्षक भी वही है। यह घोर बिडंबना ही है कि मानव ही आज दानव बनकर वनस्पतियों को मिटाता चला जा रहा है। रक्षक ही भक्षक बन गया है। ऐसा न हो इसलिए वैदिक राष्ट्रीयगान में कहा गया-

फलफूल से लदी हों औषधि अमोघ सारी’
अत: हमारे हाथ वनस्पति जगत के भक्षण और संहार हेतु न उठें अपितु उसके संरक्षण और संवद्र्घन हेतु उठें। ऐसा भाव प्रचलित राष्ट्रगान में कहीं नही है। वह तो चाटुकारिता में लगा हुआ है। परिणामस्वरूप राष्ट्र की संस्कृति के मूल्यों का संरक्षण और संवद्र्घन भी अपेक्षाओं के अनुरूप नही हो सका है। प्रचलित राष्ट्रगान को कांग्रेसी चाटुकारों ने दासता की गहरी रात में बैठकर बनाया था। उसे गाया भी उसी सूरज के प्रकाश में था जो कभी अपने शासक (ब्रिटिश) के राज में डूबता नही था। अत: इस गान में स्वाधीनता का कहीं कोई उल्लेख या वर्णन तक नही है। जबकि वैदिक राष्ट्रगान में स्वतंत्रता के ‘योग क्षेमकारी’ स्वरूप को उद्घाटित कर उसकी मांग जगत नियंता से की गयी है।

स्वाधीनता मिलने के पश्चात राष्ट्र को कांग्रेस शासकों के द्वारा बहकाया गया और यह समझाया गया कि वह राष्ट्रीयगान उस भाव से (जिस भाव से कभी ब्रिटिश सम्राट के सम्मान में कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने गाया था) नही गाया जाएगा अपितु अब इसका सम्मान का यही भाव अपने राष्ट्रध्वज के प्रति होगा। लोकतंत्र के इन तथाकथित पैरोकारों से पूछा जा सकता है कि यदि ऐसा है तो फिर इसमें ‘अधिनायक’ किसे कहा गया है? ‘गाहे तब जय गाथा’ का क्या अर्थ है? वस्तुत: राष्ट्र को हमारे शासकों द्वारा जिस प्रकार अपनी जागीर बनाया गया और अपने प्रतीकों, कार्यों, चिन्हों, गीतों को अमरत्व प्रदान करने का प्रयास किया गया, यह उसी नीति का एक अंग था, जिसके अंतर्गत इस गीत को ‘भारत का राष्टीय गीत’ बनाकर थोप दिया गया। जिसमें न कोई आदर्श, न कोई नीति, न कोई सोच, न कोई सपना था। इसमें केवल एक बात थी कि हमने इतने बड़े साम्राज्य के स्वामी ब्रिटिश सम्राट के लिए कितने अच्छे ढंग से शब्दों का चयन कर गीत गाया था-अर्थात यह कितने गौरव की बात थी, इसे समझना था।

राष्ट्र ने समय से इसे समझ लिया और समझकर भी नामसझ होकर हम तभी से इसे गाये जा रहे हैं। जैसे हम उद्देश्य हीन हों, अपने लक्ष्य से भटक गये हों और न कोई हमारी सोच हो, न हमारी कोई योजना हो। धन्य हैं हमारी ये कर्णधार, धन्य हैं इनकी नीतियां और इनकी रीतियां। ‘चुप रहो-हम धर्मनिरपेक्ष हैं, हम लोकतंत्र के महान प्रहरी हैं’-ऐसी लोकोक्तियों को उछाल-उछालकर उल्टी सीधी मान्यताओं को राष्ट्र पर थोपा जाता रहा है। उसे छला जाता रहा है। ये कितना ही राष्ट्र को छलें, परंतु एक बात तो निश्चित है कि-असत्य की नीव पर सत्य को कभी प्रतिष्ठापित नही किया जा सकता और सत्य में इतनी शक्ति होती है कि वह स्वयं काल की गति को अवरूद्घ कर प्रकट हो जाता है। इस वेदवाक्य को झुठलाया नही जा सकता। फिर भी राष्ट्र छल के घातक कार्य में जो लोग लगे हुए हैं, उनके विषय में यही कहा जा सकता है-

खड़ी न्याय के दौर पर, भौंचक रह गयी अक्ल।
कातिल और इंसाफ की, एक सरीखी शक्ल।।

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?’ से)

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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