जातीय सामंजस्य का सूत्र

  • 2016-05-26 07:45:20.0
  • राकेश कुमार आर्य

जातीय सामंजस्य

भारतीय समाज में वर्तमान काल में जाति-व्यवस्था पहले से भी अधिक उग्र हो गयी है। इसे राजनीतिक लोगों ने अधिक हवा दी है। जिस व्यवस्था के अभिशाप को स्वातंत्रयोपरांत समाप्त कर दिया जाना चाहिए था-उसे आरक्षण के नाम पर, जातीय वोटों के नाम पर और दलितों-शोषितों, अगड़ों-पिछड़ों के नाम पर हमने जीवित किये रखा, यह दुर्भाग्य का विषय है।

वोट के सौदागरों ने वोट प्राप्ति के लिए जाति-व्यवस्था और तदजनित भारतीय समाज में बने दलित, शोषित, अगड़े-पिछड़े के वर्गीय द्वंद का भरपूर लाभ उठाने का प्रयास किया है। इसके लिए किसी ने मनु को कोसना आरंभ कर दिया है, तो किसी ने मनु प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था को वर्ग संघर्ष की जनक बताकर उसे ‘ब्राह्मणवादी व्यवस्था’ तक कहना आरंभ कर दिया है।

ऐसा कहने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि इससे वे भारतीय समाज का भला नही कर रहे हैं, अपितु इस सोच के कारण भारत में जातीय विद्वेष और भी अधिक बढ़ रहा है। नेताओं ने अपना ‘वोट बैंक’ स्थायी करने के लिए जनता को और मतदाता ने अपना काम निकालने के लिए अपने सजातीय नेताओं को खेमों में विभाजित कर लिया है।

चुनावी वैतरणी पार करने के लिए हर चुनावी मौसम में यह नेता बरसाती मेंढक की भांति टर्राते हैं और जनता में जातीय विद्वेष का जहर फैला जाते हैं।

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही एक दलित की बेटी ने जातीय विद्वेष फैलाने की सारी सीमाएं तोड़ दीं-जब कह दिया कि ‘तिलक, तराजू और तलवार-इनको मारो जूते चार।’ ऐसा कहने वाले लोग यह नही जानते कि ऐसे भावनात्मक शब्दों से भावनाएं कितनी भडक़ती हैं? साथ ही इन भडक़ी हुई भावनाओं का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

वास्तव में तो ऐसा वही सोचेगा जिसे राष्ट्र की और समाज की चिंता होगी। जिनका चिंतन ही विकृत हो गया हो उनके लिए शुभचिंतन बेमानी वाली बात है। इसीलिए तो कहा गया है कि-

चिंतन जिसका निम्न हो उसका निम्न नसीब।
दुनिया का समझो उसे सबसे बड़ा गरीब।।


चिंतन का दीवाला निकल गया तो विकृत चिंतन ने समाज में आग लगा दी। भावनाएं भडक़ा दीं और नारा उछाल दिया-‘तिलक, तराजू और तलवार’ ऐसा नारा लगाने वाले नही समझ पाये कि तिलक, तराजू और तलवार का रहस्य क्या है? इसके रहस्य को समझकर इसे जनता को समझाने की अपेक्षा हमें अपने राजनीतिज्ञों से थी। किंतु जहां परहित पर स्वहित हावी हो वहां ऐसी अपेक्षा नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान अथवा राजस्थान के रेगिस्तान में शीतल जल ढूंढऩे की मृगमरीचिका के समान है। यह राजनीतिज्ञ नाम का प्राणी वह है जो संविधान के अनुसार ईश्वर के नाम पर इसी बात की शपथ लेता है कि मुझे जनता की अपेक्षाओं पर ही खरा नही उतरना है। इसलिए इसने भारतीय समाज की कुछ अप्रिय परंपराओं और रीति रिवाजों की व्यवस्था का परिष्कार करने के स्थान पर उनका तिरस्कार करना प्रारंभ कर दिया।

अप्रिय व अनर्थकारी व्यवस्था के स्थान पर नई और सुस्पष्ट व्यवस्था हमें हमारे राजनीतिज्ञों के द्वारा नही दी गयी। तिलक, तराजू और तलवार को कोसा तो गया, किंतु कोई ऐसी आदर्श सामाजिक व्यवस्था की संकल्पना प्रस्तुत नही की गयी, जो भारतीय समाज की भीतरी व्यवस्था को और भी अच्छे ढंग से सही दिशा और दशा देने में सक्षम होती।

यह स्थिति व्यवस्थापकों के मानसिक दीवालियेपन को प्रकट करती है। ये लोग कितने बड़े आदर्शवादी, सिद्घांतवादी, दार्शनिक, बुद्घिजीवी और विचारक हैं? परिस्थितियां इसका स्वयं वर्णन करती हैं। अब जरा विचार करें कि तिलक, तराजू और तलवार का आपसी रिश्ता क्या है? इनके पीछे ऋषियों और प्राचीनकाल के व्यवस्थापकों का दार्शनिक दृष्टिकोण क्या है? मंतव्य क्या है? और उनकी संकल्पना क्या है? इसके लिए हमें वेद के इस मंत्र को समझना पड़ेगा।

स्वस्ति पंथामनुचरेम् सूय्र्याचंद्रमसाविव।
पुनर्ददताअघ्नता जानता संगमेमहि।।

वेद का यह मंत्र दो बातें स्पष्ट कर रहा है-प्रथमत: हमारी मर्यादा और सीमा रेखा का रेखांकन करते हुए कह रहा है कि तुम्हारे द्वारा अपने अपने पथ के लिए सूर्य और चंद्रमा का अनुकरण किया जाए। जैसे सूर्य अपनी पथ-परिक्रमा में रहता है और चंद्रमा अपनी पथ परिक्रमा में रहता है। कभी दोनों आपस में भिड़ते नही, झगड़ते नही, लड़ते नही और टकराते नही, ऐसे ही तुम्हें आपस में रहना है, भिडऩा नही है, झगडऩा नही है, लडऩा नही है और परस्पर टकराना नही है।

आह! कितनी आदर्श व्यवस्था है सूर्य चंद्रमा को प्रकाश दे रहा है। भक्त सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा की कांति समझकर सोमपान कर रहा है, उसका सारा श्रेय सूर्य को न देकर चंद्रमा को दे रहा है और बड़ा भाई सूर्य प्रसन्न हो रहा है।


सत्संगति का रहस्य :-मंत्र के अगले पड़ाव में बात आयी कि तुम्हारी संगति कैसे लोगों से हो? तो वेद ने कहा-‘पुनर्ददता अघ्नता जानता.....’  अर्थात जो दानी हों, अहिंसक हों और ज्ञानी हों, उन लोगों से हमारी संगति हों, उठ -बैठ हो, मेल-मिलाप हो और मित्रता हों। ये कौन हैं, दानी, ज्ञानी और अहिंसक लोग? वेद के इस गूढ़ रहस्य को समझने के पूर्व हमें एक अन्य बात पर विचार करना होगा कि समाज के हर युग में तीन शत्रु रहे हैं। अज्ञान, अन्याय और अभाव। अज्ञान को ज्ञानी दूर करता है, अन्याय को बली दूर करती है और अभाव को धनी और समृद्घ व्यक्ति दूर करता है। हमारे ऋषियों का यह चिंतन रहा है कि  अन्याय से लडऩे वाला व्यक्ति क्षत्रिय अभाव से लडऩे वाला व्यक्ति वैश्य और अज्ञान से लडऩे वाला व्यक्ति ब्राह्मण कहलाता है। हमने भोजन, वस्त्र और आवास को व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता नही माना अपितु ज्ञान प्राप्ति, न्याय प्राप्ति और अभाव से मुक्ति को व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता माना है। वेद ने ज्ञानी, अहिंसक और दानी लोगों से हमारी संगति का उपदेश हमें दिया है, जिसका अर्थ भी ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण, अहिंसक, समाज की स्थापना करने वाले क्षत्रिय और समाज के अभाव को दूर करने वाले दानी वैश्य से हमारी संगति की कामना की है। जिस देश का तिलक अर्थात ज्ञानी पंडित, जिस देश की तलवार अर्थात क्षत्रिय और जिस देश की तराजू अपनी मर्यादा को पहचान लेगी, अपने उद्देश्य और अपने उपयोगिता को पहचान लेगी उस देश का कल्याण, उत्थान और विकास होना अवश्यंभावी है। आवश्यकता इन तीनों को अपनी मर्यादा में रहने की और रखने की है, हमारा सारा ध्यान इसी बात पर केन्द्रित हो  कि ये तीनों अपनी मर्यादा को पहचानें तो चौथे वर्ण अर्थात शूद्र की रक्षा और उसका विकास होना अपने आप संभव हो जाएगा। हमें परिमार्जनवादी होना चाहिए, प्रतिशोधी दृष्टिकोण समाज को विकृत करता है। हमारा लक्ष्य समतामूलक समाज की संरचना करना है, उसे तभी किया जा सकता है जब हम भारतीय आदर्श समाज की मान्यता ‘वर्धस्व च वर्धय’ अर्थात स्वयं तो आगे बढ़ो ही दूसरों को बढ़ाने में स्वयं सहायक भी बनो, को अपना लेंगे। इससे सर्वजन हित पूर्ण हो सकता है। यही भारत की संस्कृति का आधार है। इसलिए जातीय संघर्ष के नारों को देने की बजाए जातीय समन्वय की बातें करना समय के अनुरूप होगा। हमें भारत को ‘एक और नेक’ बनाना है, उसी के लिए काम करना है, और उसी के लिए आगे बढऩा है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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