इसरो की कामयाबी का नया अध्याय

  • 2016-07-01 06:30:28.0
  • उगता भारत ब्यूरो

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इसरो ने 22 जून को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से पोलर सैटेलाइट लांच वीकल की सहायता से सत्रह विदेशी उपग्रहों सहित कुल बीस उपग्रह एक साथ प्रक्षेपित कर बड़ी कामयाबी हासिल की है। इसरो ने इससे पहले 2008 में दस उपग्रहों को पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में एक साथ प्रक्षेपित किया था। इस बार बीस उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित करके इसरो ने नया रिकार्ड बनाया। इन उपग्रहों में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और इंडोनेशिया के अलावा भारतीय विश्वविद्यालयों के दो उपग्रह भी शामिल हैं।

कोर्टोसैट-2 शृंखला के उपग्रह के सफल प्रक्षेपण से भारत को कई फायदे होंगे जिनमें अब भारत में किसी भी जगह को अंतरिक्ष से देखने की क्षमता भी हासिल होगी। इस उपग्रह के जरिए भारत यह सही-सही जान पाएगा कि यहां पर किस तरह के और कितने जंगल हैं। इसके साथ ही अंतरिक्ष से हाई रिजोल्यूशन की तस्वीर मुमकिन होगी। खींची गई तस्वीर से तापमान का पता चलेगा। भूकम्प, तूफान और दूसरी आपदा में इससे मदद मिलेगी। जंगल में लगी आग को बुझाना आसान होगा। सुरक्षा एजेंसियों को भी सीमा पर नजर रखने में मदद मिलेगी। घुसपैठ पर होगी पैनी नजर। वीवीआइपी सुरक्षा और पुख्ता हो सकेगी, आतंकियों और अपराधियों पर निगरानी और कड़ी हो सकेगी। शहरी योजना व डिजाइनिंग में मदद मिलेगी। साथ ही अंतरिक्ष से वीडियो कंट्रोल सेंटर भेजना आसान।

1969 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन में राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन हुआ था। तब से अब तक चांद पर अंतरिक्ष यान भेजने की परिकल्पना तो साकार हुई ही, अब हम मंगल पर भी पहुंच गए हैं। भारत की पहली बड़ी सफलता थी 1975 में उपग्रह आर्यभट्ट का अंतरिक्ष में भेजा जाना और फिर उसके बाद 1984 में स्क्वॉड्रन लीडर राकेश शर्मा बने अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय। जब अंतरिक्ष विज्ञान की शुरुआत हुई तो सोवियत संघ और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष दौड़ की भी शुरुआत हुई। सोवियत संघ ने पहले उपग्रह स्पूतनिक का प्रक्षेपण करने में सफलता हासिल की तो अमेरिका ने चांद पर आदमी पहले भेज कर उसका जवाब दिया। लेकिन भारत का मामला दूसरा था। लंदन स्थित अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉक्टर एंड्रयू कोएट्स के अनुसार भारत ने आजादी के पंद्रह सालों के अंदर ही अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करने के बाद लगातार प्रगति की और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विकसित देशों के बीच जा खड़ा हुआ। उनके अनुसार ‘भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम परिपक्व लगता है और साथ ही उसका खास ध्यान देश की प्रगति पर है, बात चाहे संचार उपग्रहों की हो या रिमोट सेंसिंग की, भारत ने इन संचार उपग्रहों का उपयोग लोगों की भलाई के लिए किया है।’

मंगलयान और चंद्रयान-एक की बड़ी सफलता के साथ-साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान-एक को ही मिला। भारत द्वारा प्रक्षेपित उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर हम अब संचार, मौसम संबंधी जानकारी, चिकित्सा के क्षेत्र में टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन एवं कृषि के क्षेत्र में फसल अनुमान, जल के स्रोतों की खोज, संभावित मत्स्य क्षेत्र की खोज के साथ पर्यावरण पर निगाह रख रहे हैं। कम संसाधनों और कम बजट के बावजूद भारत आज अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित करने में लगा हुआ है। भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत के एक तिहाई भर है। इनसेट प्रणाली की क्षमता को जीसैट द्वारा मजबूत बनाया जा रहा है, जिससे दूरस्थ शिक्षा, दूरस्थ चिकित्सा ही नहीं बल्कि ग्राम संसाधन केंद्र को उन्नत बनाया जा सके। यदि इसी प्रकार भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे यान अंतरिक्ष यात्रियों को चांद, मंगल या अन्य ग्रहों की सैर करा सकेंगे। इसरो के हालिया मिशन की सफलताएं देश की अंतरिक्ष क्षमताओं के लिए मील का पत्थर हैं जिससे भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक महाशक्तिके रूप में उभरेगा। इसरो उपग्रह केंद्र, बेंगलुरु के निदेशक प्रोफेसर यशपाल के मुताबिक दुनिया का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है, तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने उपग्रह का प्रक्षेपण भारत से करा रहे हैं।

इसरो सैटेलाइट नैविगेशन कार्यक्रम के पूर्व निदेशक डॉ एस पाल के अनुसार, हम अंतरिक्ष विज्ञान, संचार तकनीक, परमाणु ऊर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहे हैं बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गए हैं।


एक साथ बीस उपग्रह सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करने के बाद और हाल में ही स्वदेशी स्पेस शटल की सफल लांचिंग के बाद दुनिया भर में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की धाक जम गई है। इस सफलता ने दो सौ अरब डॉलर के अंतरिक्ष बाजार में भी हलचल पैदा की है, क्योंकि बेहद कम लागत की वजह से अधिकतर देश अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण करने के लिए भारत का रुख करेंगे। लेकिन अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। क्योंकि जैसे-जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढेÞगी, अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्त्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा, जो फिलहाल नासा के मुकाबले काफी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ-साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना होगा।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में बताया था कि भारत इस साल सात देशों के पच्चीस उपग्रहों को प्रक्षेपित करने वाला है जिनमें सबसे ज्यादा अमेरिका के बारह उपग्रह शामिल हैं। जबकि भारत ने अभी तक पीएसएलवी के जरिये इक्कीस देशों के सत्तावन विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया है। अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही हैं, इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। असल में इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफलता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ उपग्रह प्रक्षेपण के कारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी  ताकतों को चुनौती देने लगे। पिछले दिनों दुश्मन-मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत बैलिस्टिक मिसाइल रक्षातंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है। दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बना कर विकसित देशों की नींद उड़ा दी है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने से मना कर दिया था। आज स्थिति यह है कि अमेरिका सहित तमाम देश भारत के साथ व्यावसायिक समझौते करने को इच्छुक हैं। अब पूरी दुनिया में उपग्रह के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार के क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहे हैं और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि सारी मांग केवल उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं। कम लागत और सफलता की दर इसरो की सबसे बड़ी ताकत है, जिसकी वजह से अंतरिक्ष उद्योग में आने वाला समय भारत के दबदबे का होगा।

अमेरिका बीसवां देश है जो कारोबारी प्रक्षेपण के लिए इसरो से जुड़ा है। पिछले दिनों अंतरिक्ष से ब्रह्मांड को समझने और सुदूरवर्ती खगोलीय पिंडों के अध्ययन के साथ पृथ्वी का वैज्ञानिक विश्लेषण।करने के उद्देश्य से भारत ने अपना पहला स्पेस ऑब्जर्वेटरी एस्ट्रोसैट पीएसएलवी-सी 30 का सफल प्रक्षेपण किया था। भारत से पहले अमेरिका, रूस और जापान ने ही स्पेस ऑब्जर्वेटरी लांच किया है। वास्तव में नियमित रूप से विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण ‘भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टि’ है। वास्तव में इस क्षेत्र में किसी के साथ सहयोग या भागीदारी सभी पक्षों के लिए लाभदायक स्थिति है। इससे बड़े पैमाने पर लगने वाले संसाधनों का बंटवारा हो जाता है। खासतौर पर इसमें होने वाले भारी खर्च का। यह भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की वाणिज्यिक श्रेष्ठता का गवाह भी है।

भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढेगी। भारत के पास कुछ बढ़त पहले से है, इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग संभव है। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। देश में गरीबी दूर करने और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफी मददगार साबित हो सकता है। इसरो के चंद्र मिशन, मंगल अभियान के बाद एक साथ बीस उपग्रहों के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण से इसरो को बहुत व्यावसायिक फायदा होगा, साथ ही स्वदेशी स्पेस शटल की कामयाबी इसरो के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलेगी।
- शशांक द्विवेदी

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