क्या यह वही देश है...भाग-1

  • 2015-11-14 02:30:24.0
  • राकेश कुमार आर्य

india1सन् 1947 में देश को स्वतंत्रता मिलते ही ‘नवयुग’ के गीत गाये गये, क्योंकि स्वतंत्रता से पूर्व नवयुग का एक सपना हर भारतीय की दृष्टि में तैर रहा था, हर छोटा बड़ा व्यक्ति बड़ी उत्सुकता से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था जिस दिन सचमुच दासता का जुआ उतरेगा और स्वतंत्रता का उत्सव पूरा देश इस जुए के उतरने के क्षणों में मनाएगा।

जुआ उतरा-उत्सव भी मनाया गया। चारों ओर नवयुग का नया गीत-संगीत गूँजने लगा। किसी ने अपने भवन का नाम नवयुग रखा, किसी ने अपने समाचार पत्र का नाम ‘नवयुग’ रखा, किसी ने अपने संस्थान का नाम ‘नवयुग’ रखा तो किसी ने अपनी मार्केट का नाम ‘नवयुग’ रखा। सबको बहुत अच्छा लगा। लगा कि ‘नवयुग’ के इस काल में शोषण, उत्पीडऩ, वैर-विरोध, अपराध सब छूमंतर हो जाएँगे और हम सचमुच एक नया सुनहरा संसार बना डालेंगे। पर जैसे वर-वधू विवाह से पूर्व नई दुनिया नये सपनों के साथ बसाने की सौगन्ध खाया करते हैं और उस पर चलने का प्रयास भी करते हैं, पर थोड़ी देर में ‘दुनिया का सच’ उनकी समझ में आ जाता है और वह भी हार थककर ‘डोली’ के सुनहरे सपनों से निकलकर ‘अर्थी’ के निराशापूर्ण कड़वे सच का शिकार होकर संसार से चले जाते हैं। युग युगों में मानव ‘डोली से अर्थी’ तक की कदमताल कर रहा है और वह समझ नही पाया है कि सच क्या है?

बस, यही हश्र हमारे ‘नवयुग’ का हुआ। हम ‘नवयुग’ नहीं बना पाए, इसीलिए’ ‘‘आज चारों ओर दगा ही दगा है, हर छुरे पर खून का  दाग लगा है। इस इंसान को देखो, धरती की संतान को देखो, दाग लगा है। इस इंसान को देखो, धरती की संतान को देखो, कितना है ये हाय कमीना, इसने लाखों का सुख छीना।’’

गाजियाबाद में एक ड्राइवर ने एक बिल्डर परिवार के सात लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी-22 मई 2013 की इस घटना से मानव के भीतर का दानव उभर कर बाहर आया-सबको पता चल गया था कि हम ‘नवयुग’ में नही अपितु ‘पत्थर युग’ में जी रहे हैं। पर पत्थर दिल इंसान के पत्थर युगीन कृत्यों को देखकर ‘पत्थर युग’ भी लजा गया होगा।

इसे देखकर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की ‘दिल्ली’ नामक कविता की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं:-

क्या यह वही देश है
भीमार्जुन आदि का कीत्र्तिक्षेत्र,
चिरकुमार भीष्म की पताका ब्रहृमचर्य दीप्त,
उड़ती है आज भी जहाँ के वायुमण्डल में
उज्ज्वल अधीर और चिरनवीन?
श्रीमुख से श्रीकृष्ण के सुना था
जहाँ भारत ने गीता गीत सिंहनाद
मर्मवाणी जीवन संग्राम की

सार्थक समन्वय ज्ञान कर्म भक्ति योग का?

हिंसा और जघन्य अपराधों में लगे मानव को देखकर नही लगता कि ये देश नैतिक व सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से मोक्षाभिलाषी समाज बनाने के लिए मनुस्मृति लिखने वाले मनु महाराज का, दर्शनों के रचयिता गौतम, कणाद, कपिल, पतंजलि आदि का, स्मृतियों के माध्यम से वेद-व्यवस्था को प्रचारित-प्रसारित करने वाले महान ऋषियों का, मान्धाता से लेकर युधिष्ठर पर्यन्त चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित कर विश्व में भारत की विजय-दुन्दुभि बजाने वाले सम्राटों का, महात्मा विदुर, महामति चाणक्य जैसे राजनीति के प्रकाण्ड पंडितों का, और उन अनेकों देशभक्त क्रांतिकारियों, नरम व गरम दल के देशभक्त स्वतंत्रता सैनानियों का देश है, जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराके ‘नवयुग’ का सपना संजोया था। किसी भी देश के महापुरूष उस देश के आदर्श होते हैं, उन आदर्श महापुरूषों से वह देश अनुप्राणित होता है और आगे बढऩे का उत्साह प्राप्त करता है।

हर देश अपने आदर्श महापुरूषों के बताए रास्ते का अनुगमन और अनुकरण करता है, पर भारत में रहने वाले हम लोगों ने अपने महापुरूषों से कोई शिक्षा नहीं ली या उन्हें महापुरूष ही नही माना। हमने हर महापुरूष के जीवनादर्शों के साथ छल किया, उसकी स्मृति में हमने श्रद्धा के नही अपितु औपचारिकता के दो फू ल चढ़ाए और चल दिये। उनके जीवनादर्शों पर हमने अतिक्रमण कर अपनी-अपनी दुकानें बनायीं और अपना अपना सामान बेचने लगे। हमने कांग्रेस को ‘गाँधी मार्का’ बताया पर उस ‘मार्का की पैकिंग’ में सामान अपना बेचा, इसी प्रकार लोहिया, सावरकर सुभाष चंद्र बोस आदि के साथ हुआ। इस प्रकार हम आदर्श महापुरूषों की स्मृतियों पर बुल्डोजर चलाते हुए, उन्हें रौंदते रहे और देश का निर्माण करते रहे। यह अलग बात है कि हमारे छल प्रपंचों से न देश बना न समाज बना। क्रमश:

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