पुष्पमित्र की असहिष्णुता

  • 2015-10-31 03:00:29.0
  • राकेश कुमार आर्य

इस समय सहिष्णुता बनाम अहिसष्णुता को लेकर कुछ साहित्यकारों ने देश में अच्छी बहस चला रखी है। वैसे अपने-अपने पुरस्कारों को लौटाने वाले साहित्यकारों में से अधिकांश लोग ऐसे हैं जिन्हें उस समय  पुरस्कार ही कुछ ऐसे विषयों को लेकर दिये गये थे, जिन से देश का कोई भला नही होने वाला था। अब यदि ये साहित्यकार अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं तो कुल मिलाकर देश के लिए एक भला कार्य कर रहे हैं। हो सकता है मोदी सरकार इनके इस भले कार्य के कारण ही इनसे कुछ कहने या पुरस्कार को ज्यों का त्यों रखे रखने की अनुनय-विनय नही कर रही है।


अब इन पुरस्कार लौटाने वाले महाशयों में एक नाम वैज्ञानिक पुष्प मित्र भार्गव का जुड़ा है। ये वही भार्गव हैं जिन्हें कांग्रेस और सोनिया की कृपा से नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड (एनएसएबी) में  सदस्य रखा गया था। इस संस्था के पास देश की सुरक्षा से सम्बंधित संवेदनशील सूचनाएं भी उपलब्ध होती थीं और इसके सदस्यों का बैकग्राउंड प्रो अमेरिका और प्रो एफबीआई था। जब मोदी सरकार सत्ता में आयी और अजीत डोभाल एन.एस.ए. बने, तो उनके सामने इनसे निपटना बड़ी चुनौती थी। अगर इन सदस्यों को डोभाल उनके पद से हटाते तो मीडिया और कांगेस्र चिल्लाती की बदले की भावना से कार्यवाही हो रही है। तब इसके लिए नरेन्द्र मोदी और डोभाल में एक लंबी बैठक हुई और उस बैठक में ये निर्णय लिया गया कि फऱवरी 2015 में इसका कार्यकाल खत्म होने के बाद इसका पुर्ननवीनीकरण  नहीं किया जायेगा।

अब एनएसएबी से बाहर हुए ये लोग अमेरिका के ख़ास काम के नहीं रहे तो फऱवरी के बाद से एनजीओ वाला मेहनताना भी बंद हो गया.. अब वही कुंठा पुरस्कार वापसी के रूप में ये निकाल रहे हैं। इस कुंठा को किसी से कह नही सकते, ये भीतर का दर्द है जो भीतर ही भीतर इन लोगों को साल रहा है। इसे केवल ये लोग स्वयं अनुभव कर सकते हैं, दूसरों को बता नही सकते। इसलिए बिसाहड़ा जैसी घटना को पकड़ा और मोदी सरकार के साथ-साथ देश को भी विदेशों में बदनाम करने की नीयत से इन्होंने पुरस्कार लौटाने आरंभ कर दिये। ऐसे में बहुत ही उचित होगा, कि इन लोगों के पीछे किन लोगों का या किस लॉबी का मस्तिष्क काम कर रहा है, इस बात की सही सूचना ली जाए और देश को बदनाम करने की इनकी देशद्रोही गतिविधि और ‘जयचंदी परंपरा’ को देश में आज भी लागू करने या जारी रखने के अपराध में इन पर मुकद्मा कायम किया जाए। कोई भी कलमकार या साहित्यकार अपनी कलम के साथ न्याय करते हुए परिस्थितियों का गंभीर चिंतन प्रकट कर सकता है, सरकार की नीतियों में दोष निकाल सकता है, सरकार की आलोचना कर सकता है, सरकार की ऐसी नीतियों की बखिया उधेड़ सकता है जिनसे देश की हानि होना संभावित है। परंतु जिन पुरस्कारों को उन्हें राष्ट्र ने दिया हो उन्हें किसी सरकार विशेष का विरोध करते हुए लौटाना नितांत अनुचित है। क्योंकि पुरस्कार राष्ट्र ने दिया है, किसी सरकार ने नही, और यदि किसी सरकार की चाटुकारिता करके इन लोगों ने कभी पुरस्कार प्राप्त कर भी लिया तो अब यह स्पष्ट हो गया है कि इनका चिंतन अभी भी अपने किसी पूर्व ‘आका’ की परिक्रमा करने में ही लगा हुआ है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र के लिए लज्जाजनक है और किसी भी साहित्यकार के लिए तो सर्वथा डूब मरने का एक अच्छा आधार है। इन लोगों को जम्मू-कश्मीर में, पाकिस्तान में, बांगलादेश में और देश के दूसरे ऐसे भागों में जहां हिंदू अल्पसंख्यक है, हिंदुओं पर होते अत्याचार दिखाई नही देते, जहां स्वतंत्रता के पश्चात से ही असहिष्णुता का नंगा नाच होता रहा है, और हो रहा है। यह देश का दुर्भाग्य है कि यहां हिंदू हित की बात करना या हिन्दुओं के अधिकारों पर अपना चिंतन प्रकट करना भी साम्प्रदायिकता मानी जाती है, जिसके लिए इन साहित्यकारों का दूषित चिंतन अधिक उत्तरदायी है।

ऐसी परिस्थितियों में जबकि नरेन्द्र मोदी सरकार के काल में पुष्प मित्र जैसे लोग ‘बेरोजगार’ हो गये हों तो यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका मोदी सरकार के प्रति कितना लगाव या अलगाव है। बात सम्मान लौटाने की नही है, बात जेब की गर्मी को लौटाने की है, और यदि वह ठीक हो गयी तो यह सच है कि सारा प्रकरण ही शांत हो जाएगा।  अब आप ही समझ लें की देश का माहौल खऱाब है या इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के बैंक अकाउंट का माहौल खऱाब हो रहा है।

कहीं किसी अल्पसंख्यक की चिंता नही है, चिंता परदे के पीछे बैठे आकाओं को प्रसन्न करने की है, ऐसी परिस्थितियों में आप स्वयं अनुमान लगायें, कि पुष्पमित्र स्वयं मोदी सरकार के प्रति कितने असहिष्णु हैं?