पौराणिक आख्यानों के सत्यार्थ इंद्र और दधीचि की कहानी का वैदिक स्वरूप

  • 2016-04-28 11:00:31.0
  • आचार्य दिवाकर

इंद्र और दधीचि

पौराणिकों ने सारे विश्व में एक कहानी प्रचारित की है कि इंद्र ने दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र बनाया और उससे वृत्तासुर का वध किया। ऐसे और भी आख्यान हैं जिन पर लोग अनायास ही विश्वास कर लेते हैं। किंतु वे न तो ऐतिहासिक हैं और न वैज्ञानिक दृष्टि से खरे उतरते हैं। ऐसे आख्यानों में अहिल्या की कहानी, देवासुर संग्राम, समुद्र मंथन की कहानी आदि हैं। जिन पर समय-समय पर आख्यान का सत्यार्थ हमारी इस लेख श्रंखला के माध्यम से किया जाएगा। आज हम इस लेख श्रंखला की पहली कड़ी में इंद्र और दधीचि की पौराणिक गाथा पर प्रकाश डालते हैं।

सामवेद उपासना का वेद है, यह सभी जानते हैं। उसकी एक ऋचा में इंद्र और दधीचि का वर्णन आया है। वेद के उसी मंत्र का अनर्थ करके कुछ लोगों ने इंद्र और दधीचि की अतार्किक कथा गढ़ ली है। यह प्रत्यक्ष सिद्घ है कि वज्र जैसे संहार करने वाले अस्त्र कठोर धातुओं से बनाये जाते हैं। जिसमें बारूद आदि ज्वलनशील पदार्थों का प्रयोग किया जाता है, जो छोडऩे पर संहारक बन जाते हैं। अस्थियों से ऐसा कोई अस्त्र बनाना संभव ही नही है और न सामवेद के उस मंत्र में इंद्र और दधीचि ऋषि का वर्णन ही है। मंत्र इस प्रकार है-

इंद्रो दधीचोअस्थमिर्वृत्राण्य प्रतिष्कुत:।
जधान नवतीर्नव। सामवेद  179
अन्वय-अप्रतिष्कुत: इंद्र: दधीच:
वृत्रारिया अस्थमि: जधान नव नवती:।

सामवेद उपासना का वेद है, इस मंत्र में उपासना के द्वारा उपासक की मनोवृत्तियों में आये हुए परिवर्तन का उल्लेख किया गया है।

मंत्र का अर्थ-‘जिसके गुणकर्म स्वभाव के अनुकूल जिसका कोई प्रतिनिधि नही, अपने गुण कर्म स्वभाव से न विचलित होने वाला अर्थात एक रस और प्रतिकार से रहित अर्थात जिसका कोई शक्ति मुकाबला नही कर सकती, ऐसा अप्रतिष्कुट इंद्र अर्थात परमात्मा-दधीच: यह षष्ठी विभक्ति का वचन है इसका अर्थ है-परमात्मा का ध्यान करने वाले ध्यानी का वृत्तारिया अर्थात पापविचारों का (पाप्या वैवृभ: शतपथ 11-1-56) समिधाओं अर्थात समिद्घ ज्ञान प्रकाश से प्रदीप्त स्वशक्तियों से जवान अर्थात नष्ट कर देता है तथ नवनवती नौ पांच ज्ञानेन्द्रियों मैं बंध, रस, रूप स्पर्श और शब्द ग्रहण वासनाओं और मन, बुद्घि, चित्त, अहंकार अंत:करण चतुष्टय गति प्रवृत्तियां वासनाओं को भी नष्ट कर देता है।

मनोविज्ञान संबंधी कितना गंभीर अर्थ सामवेद के इस मंत्र में निहित है। यहां इंद्र और दधीचि शब्द को देखकर ही अल्पज्ञ विद्वानों ने इंद्र और दधीचि से गलत आख्यान को प्रचारित कर दिया है। जिसका कोई इतिहास नही और जिसका वेद के साथ लेना देना नही। इस वेद मन का अर्थ जो ऋषियों ने किया है वह वेद एवं ऋषि परमात्मा के अनुसार सत्य है।
-आचार्य दिवाकर

आचार्य दिवाकर ( 6 )

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