भारत और पाकिस्तान की जनता

  • 2016-01-14 01:30:49.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत पाकिस्तान की मित्रता के समर्थकों का अक्सर कहना होता है कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की जनता तो प्रेम और शांति चाहती है, पर सियासत बीच में आ जाती है, जो दोनों देशों की जनता को एक साथ नही बैठने देती है। जो लोग ऐसी मान्यता के हैं, उनमें कई लेखक और कवि भी सम्मिलित होते हैं। जब ये लोग कहीं किसी संगोष्ठी में या किसी अन्य सम्मेलन आदि में ऐसी बात कहते हैं तो सामान्यत: उनके लिए लोग ताली बजा देते हैं। जिससे ऐसा कहने वाले महाशयों को आत्म संतुष्टि और आत्मप्रसन्नता का गहनबोध होता है, और उनके चेहरे को पढक़र उस समय ऐसा लगता है कि जैसे ये अभी ‘कारगिल विजय’ करके ही लौटे हैं।

वास्तव में दोनों देशों के संबंधों को लेकर केवल राजनीति को दोषी मानना समकालीन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है। जो लोग ऐसा कहते हैं उनमें या तो सत्यबोध का अभाव है, या सत्य के प्रस्तुतीकरण का उनमें अभाव है। जब वह ऐसा कहते हैं तो मुझे लगता है कि वह भी तुष्टिकरण ही कर रहे हैं। ऐसा क्यों?

मेरा मानना है कि इन दोनों देशों की जनता और राजनीति के स्वभाव की समीक्षा इस संदर्भ में की जानी अपेक्षित है। राजनीति के विषय में यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यह कई बार जनपेक्षाओं से प्रभावित होकर भी निर्णय लिया करती है। लोकतंत्र में तो यह और भी अधिक अनिवार्य हो जाता है कि राजनीति जनापेक्षाओं के अनुकूल रहे। तब राजनीतिज्ञ लोग अपने लिए ‘वोट बैंक’ की राजनीति पर उतर आते हैं। हमारे मध्य ऐसे लोग अभी पर्याप्त संख्या में हैं जिन्हें 1947 के विभाजन की स्मृतियां भली प्रकार स्मरण है। हम इतिहास की पुस्तकों को छोड़ दें कि वह हमें उस समय की परिस्थितियों के विषय में क्या बताती है। हम उन लोगों के संस्मरण सुनें, जो 1947 में 15-20 वर्ष के थे और जिन्होंने विभाजन की पीड़ा को निकट से देखा भी है और झेला भी है। वह लोग हमें बताते हैं कि उस समय भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों में धार्मिक उन्माद अधिक था और उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे अलग देश बनते ही उन्हें ‘जन्नत’ मिल जाएगी। स्पष्ट है कि उनके इस उन्माद ने ही उस समय दंगे कराये थे। जिनमें लाखों की संख्या में लोगों की प्राणहानि हुई थी। इन उन्मादी मुस्लिमों को अलग देश तो मिल गया पर ‘जन्नत’ नही मिली, वह ‘जन्नत’  (भारत) से दोजख (पाकिस्तान) में जा पड़े। उनके साथ मूल पाकिस्तानी आज कैसा व्यवहार करते हैं, इसे सभी जानते हैं।
india and pakistan


जिस समय पाकिस्तान से लिए भारत से मुसलमान जा रहे थे, उसी समय पाकिस्तान से भारत के लिए कुछ हिंदू और सिख आ रहे थे। इनमें कोई धार्मिक उन्माद नही था। ये लोग अपने चमन को उजड़ता देख कर एक दुख भरी दास्तान को अपने कलेजा में छिपाकर भारत के लिए चले थे। इनके वहां से चलने का कारण था, वहां रहते अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देना। स्पष्ट है कि ये अपने भविष्य को संवारने के लिए भारत की ओर चले थे, इनमें उन्माद नही था, ये प्रेम को खोकर प्रेम की खोज में चले थे। परिणाम ये आया कि इन्हें आगे भी प्रेम ही मिला, आज भारत की नई पीढ़ी इन लोगों को अपने साथ ऐसे मिला चुकी है कि जैसे दूध और शक्कर मिल जाते हैं। जो लोग पाकिस्तान पहुंचे उनके हृदय में घृणा थी मजहब के नाम पर पाली गयी इस घृणा ने पाकिस्तान में उन लोगों को शांति से नही रहने दिया। वे वहां भी घृणा का व्यापार करने लगे। जबकि भारत ने पाकिस्तान से आये अपने हिंदू सिख भाईयों को अपनाकर प्रेम से आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। भारत की राजनीति ने उनसे कह दिया कि ‘बीति ताहि बिसार दे-आगे की सुधि ले’ इस पर कार्य करो और आगे बढ़ो। उधर पाकिस्तान जाने वालों को वहां जाते ही नारा दिया गया-‘‘हंस के लिया पाकिस्तान-लड़ कर लेंगे हिन्दुस्तान।’’ भारत ने अपने बंधुओं को प्रेम का जल पिलाया और उनके आंसू सुखा दिये। जबकि साम्प्रदायिक घृणा से जन्मे पाकिस्तान ने अपने बंधुओं को वहां जाते ही घृणा की आग में झोंक दिया।

परिणाम यह आया कि पाकिस्तान के लोगों ने वहां के हिंदुओं को समाप्त करना और उनकी संपत्ति व बहू बेटियों को हड़पना आरंभ कर दिया। जो वहां का मूल निवासी था उसने यहां से जाने वाले मुसलमान को भी घृणा की दृष्टि से ही देखा और उन्हें मुहाजिर के नाम से पुकारकर कितनी ही बार दंगों की भेंट चढ़ा दिया। यहां से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान ही अब तक काश्मीर के लिए अधिक शोर मचाते हैं। उन्हें कश्मीर चाहिए-जिससे कि वहां के मूल समाज को लगे कि ये लोग उनके कितने शुभचिंतक हैं? पाकिस्तान की राजनीति से अधिक घातक वहां की सामाजिक व्यवस्था है-जिसने आजादी के समय पाकिस्तान में रह गये ढाई करोड़ हिंदुओं का लगभग सफाया कर दिया है। आज उनकी संख्या बीस लाख रह गयी है। इस कठमुल्लावाद और साम्प्रदायिक सोच के सामने पाकिस्तान की राजनीति पानी भरती है, इधर भारत की सामाजिक उदारता को देखिए कि उसने पाकिस्तान से आये लोगों को तो आत्मसात किया ही है, साथ ही भारत के भीतर रहने वाले मुस्लिमों को भी सारे मौलिक अधिकार प्रदान कर अपनी सहिष्णुतापूर्ण उदारता का परिचय दिया है। कहने का अभिप्राय है कि पाकिस्तान की सामाजिक परिस्थितियां ऐसी हैं जो अपनी राजनीति को घृणा के लिए प्रेरित करती है, और अपने शासकों पर भारत को समाप्त करने का दबाव डालती है, जबकि भारत की सामाजिक परिस्थितियां ऐसी हैं जो अपने शासकों पर उदारतापूर्ण सहिष्णुता का प्रदर्शन करने का दबाव डालती है। यही कारण है कि पाकिस्तान के शासक भारत के प्रति उग्र रहते हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के प्रति विष्वमन करते हैं, और भारत के विरूद्घ प्रत्येक प्रकार के षडय़ंत्र में सम्मिलित रहते हैं, कारण कि ऐसा करने से उन्हें अपने देश की जनता की ‘तालियों’ की गडग़ड़ाहट सुनती है। भारत क्रिकेट मैच में पाकिस्तान के विरूद्घ जीत जाए-तो वहां की जनता टी.वी. फोड़ देती है जबकि उस समय वहां की सियासत अपेक्षाकृत धैर्य का परिचय देती है। भारत की सियासत उदारतापूर्ण सहिष्णुता और कई बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारतीय राजनीतिज्ञों की पाकिस्तान के सामने पराजित मानसिकता के प्रदर्शन का कारण यही होता है कि यहां की जनता भी उदारतापूर्ण सहिष्णुता की पक्षधर है।

ऐसी परिस्थितियों में जो लोग बिना सोचे समझे भारत और पाकिस्तान की जनता को एक ही पलड़े में तोलने का प्रयास करते हैं उन्हें ऐसा नही करना चाहिए। भारत की जनता और पाकिस्तान की जनता में उतना ही अंतर है जितना प्रेम और घृणा में। भारत की राजनीति और पाकिस्तान की राजनीति में भी उतना ही अंतर है जितना दिन और रात में है। तथ्य नकारने के लिए नही होते हैं वे सदा पड़ताल के लिए ही परोसे जाया करते हैं, जिससे कि मार्ग में कहीं ठोकर ना लगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.