‘भारत में शिक्षा और अशिक्षा दोनों अभिशाप हैं’

  • 2015-10-19 03:30:07.0
  • राकेश कुमार आर्य

सुनने में बड़ा अटपटा लगता है पर सच यही है कि भारत में शिक्षा और अशिक्षा दोनों ही अभिशाप बन गये हैं। अशिक्षित व्यक्ति तो भारत के ‘आज’ से नहीं जुड़ पा रहा है, जबकि शिक्षित व्यक्ति भारत के बीते हुए ‘कल’ से नही जुड़ पा रहा है। इसीलिए आने वाला ‘कल’ भी कुछ असुरक्षित सा लग रहा है। ब्रिटेन में आर.एस.एस. के महासचिव और हिन्दुत्व के लिए अच्छा कार्य कर रहे श्री किशोर भाई रूपारेलिया जी कुछ समय पूर्व भारत पधारे थे, जिनके साथ गाजियाबाद में कुछ हिन्दूवादी लोगों ने एक वात्र्ता का आयोजन किया था। इस वात्र्ता के मेजबान मेरे परम मित्र श्री विनोद सर्वोदय जी थे। उस बैठक में कुछ उद्योगपति और सेवा निवृत्त अधिकारी भी उपस्थित थे। बैठक में चर्चा का विषय ‘भारतीय राष्ट्र की समस्याऐं और उनके समाधान’ था। मेरे द्वारा उक्त बैठक में यह विचार रखा गया कि भारत में जो विकास की गति में बहुत आगे खड़े हुए लोग हैं वो बहुत पीछे खड़े हुए लोगों के प्रति सहज और सहृदयी नही हैं।


मैंने देखा कि मेरी इस बात से वहाँ उपस्थित लोग अधिक सहमत नही थे। मुझे लगा कि जैसे मैंने उनके लिए कोई कष्टप्रद बात कह दी है। जबकि मेरा ऐसा कोई आशय नही था। मैंने ऐसा क्यों कहा? निस्सन्देह चिन्तन की प्रक्रिया को थोड़ा और माँजने के लिए, उसमें पैनापन और व्यावहारिक दृष्टिकोण का पुट भरने के लिए। भारत के विषय में यह सच है कि जो व्यक्ति विकास की अग्रिम पंक्ति में खड़ा है वह अपने से छोटे के प्रति उदासीन और नीरस है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने उसे उपभोक्तावादी बना दिया है। वह पैसे के पीछे भाग रहा है। यदि थोड़ा सूक्ष्मता से देखा जाये तो यह पैसा की मारामारी ‘‘पागलों की दुनिया’’ है। क्योंकि जिसके पीछे भाग रहे हैं वह मिल तो रहा है, पर उसकी ‘और-और’ भूख बढ़ती जा रही है, बढ़ती जा रही है। इसीलिए लोग हाँफ -हाँफ कर मर रहे हैं। मैं अपने परिचय क्षेत्र में ऐसे कितने ही चेहरों को जानता हूँ जो पैसा वाले तो बन गये पर ‘पीस’ अर्थात शान्ति वाले नही हैं। समय से पहले बूढ़े हो रहे हैं या समय से पहले मर गये हैं। इन्हें खाते पीते समय भी पैसा की ही चिन्ता रहती है। इनकी बुद्घि में कम्प्यूटर चलता रहता है, जबकि हाथ तब भी कैलकुटेर पर कार्य करते रहते हैं। यह शिक्षा पागलपन की चिकित्सा न कर सके तो ऐसे शिक्षित व्यक्ति को आप क्या कहेंगे?

हमारी दिनचर्या का प्रारम्भ ब्रह्मयज्ञ सन्ध्या से होता था। लोग प्रात:काल में ईश्वर का स्मरण करते थे और शाम को भी शयन मंत्रों के साथ हमारी दिनचर्या पूर्ण होती थी। वह निरा रूढि़वाद नही था, इसमें कोरी बकवास नही थी। यह एक नियमित और संयमित दिनचर्या थी जिससे जीवनचर्या पवित्र बनती थी। क्योंकि जब हम असीम ईश्वर की असीम सत्ता का ध्यान करते हैं, तो हमें असीम शान्ति की अनुभूति होती है। शान्ति की यह अनुभूति शनै: शनै: हमारे भीतर एक संस्कार बनती चली जाती है। जिससे हमारे भीतर धैर्य व क्षमा का भाव विकसित होता है। हम धैर्यपूर्वक यह विचार कर सकते हैं कि संसार में ऐसे लोग कितने हैं कि जो हमसे बहुत पीछे खड़े हैं। पीछे खड़े लोगों की लम्बी श्रंखला को देखकर हमें अपनी उन्नति पर सन्तोष होता है और जब पीछे खड़े लोगों को देखते हैं तो उनके लिए भी कुछ करने को मन करता है। जहाँ सन्तोष होता है वहाँ से असन्तोष भागता है। जहाँ ईश भजन का भाव होता है वहाँ विनम्रता और अहंकार शून्यता का विकास होता है। तब व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसकी मानवता मुखरित होती है। इसी अवस्था को आप व्यक्ति  का उत्कर्ष कह सकते हैं। शिक्षा का उद्देश्य ऐसे ही मानव समाज का निर्माण करना है। पर हम जिस मानव समाज में रह रहे हैं, वह ऐसा मानव समाज नही है। यह अवस्था शिक्षा की विकृति है।

इस विकृति ने विकृत समाज का निर्माण किया है। अभी पिछले दिनों मैं अपने एक परिचित के यहाँ आयोजित एक सम्मेलन में भाग लेने ग्रेटर नौएडा के गाँव बिरौंडी में गया। वहाँ जो ‘पॉकेट्स’ आवास हेतु बनाये गये हैं, उनको एक ऊंची चार दीवारी भी ईटों और मसाले से नही बनायी गयी है, अपितु लोहे और आर.सी.सी. से उसका निर्माण किया गया है। मैंने सोचा कि यह कालाधन कमाने वाले चोरों की बस्ती है, इसीलिए भयग्रस्त हैं। तभी तो स्वयं को किले में बन्द कर रहे हैं। दूर देहात में झोपड़ी में रह रहा ‘शाहों का शाह’ एक निर्धन व्यक्ति अपनी झोंपड़ी में चौड़े में खर्राटे भरता है, क्योंकि वह चोर नही है। इसीलिए भयग्रस्त नही है। हम चोरों की दुनिया बसाते जा रहे हैं। उसी को हम सभ्य संसार कहते हैं। सभ्य संसार के इन ‘चोरों’ से हम अपेक्षा करते हैं कि ये निचले पायदान कर खड़े व्यक्ति को ऊपर आने दें। क्या ऐसा सम्भव है कि जो सबके रास्ते बन्द करके खड़ा हो, उससे आप ये अपेक्षा करें कि वह सबको ऊपर आने देगा? विकास के सारे अवसरों पर नियन्त्रण करके जो व्यक्ति  विकास के ऊपरी पायदान पर खड़ा है, उसे आप रक्षक नही मान सकते। वह भक्षक है। यह सच है कि सच्ची शिक्षा भक्षक समाज की निर्माता कभी नही होती। इसीलिए मैंने कहा कि भारत में शिक्षा भी हमारे लिए अभिशाप बन गयी है। अशिक्षित व्यक्ति इसीलिए अभिशाप है कि वह आज के संसार से अनभिज्ञ है। वह भूत, प्रेत, गण्डे, ताबीज और ऊपरी हवा की अवैज्ञानिक और अतार्किक बातों में फँ सा पड़ा है। उसका आज के वैज्ञानिक युग से कोई सम्बन्ध नही बन पाया है। जबकि उसे आज के वैज्ञानिक संसार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का अभ्यास कर लेना चाहिए था। उसे हम शिक्षित करके यहाँ तक नही ला पाये, इसीलिए यह तथाकथित सभ्य समाज सारा का सारा दोषी समाज है।

जनसंख्या का लगभग दो तिहाई भाग विकास में पिछड़ रहा है, आधे से अधिक समाज अशिक्षित है और हम कहे जा रहे हैं कि हम सभ्य समाज के लोग हैं। यह एक मिथक है जो टूटना चाहिए। भारत की समस्या क्या है? भारत की वास्तविक समस्या अशिक्षित समाज नही है जैसा कि कह दिया जाता है। भारत की वास्तविक समस्या शिक्षित समाज है। समस्या का निरूपण क्योंकि यह शिक्षित समाज करता है, इसीलिए यह चोरी स्वयं करता है और कानून में दूसरों को फँ साता है। यह है इसकी शिक्षा का चमत्कार। वैसे हमारी व्यवस्था का यह एक बड़ा दोष है कि हम चोर से ही यह कहते हैं कि चोर को पकड़ो। हम भूल जाते हैं कि चोर कभी भी स्वयं को चोर नही कह सकता। अशिक्षित व्यक्ति  के विषय में यह ध्यान रखना चाहिए कि वह कभी भी एक समस्या नही हो सकता। वह समाज की प्रगति के लिए एक बोझ हो एक समस्या नही हो सकता। वह समाज की प्रगति के लिए एक बोझ हो एक समस्या नही हो सकता। वह समाज की प्रगति के लिए एक बोझ हो सकता है परन्तु वह समस्या नही हो सकता। समस्या वह होती है जो कि व्यवस्था की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करे। शिक्षित व्यक्ति विकास के ऊपरी पायदान पर खड़ा होकर निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान के लिए मिलने वाली धनराशि को हड़प रहा है इसीलिए वह व्यवस्था की प्रगति में बाधक है। अत: समस्या भी समाज के लिए वही है। जिस पर वह धनराशि पहुँच नही पा रही वह तो समाज के लिए और व्यवस्था के लिए एक बोझ है।

यह जो ‘बोझ’ की एक दुनिया है ना इसमें रहने वाले व्यक्ति की तनिक आपराधिक प्रवृत्ति पर दृष्टिपात करेंगे तो आप पायेंगे कि इनके लड़ाई झगड़े अक्सर होते हैं, गाली गलौच नित्य प्रति होती हैं, पर हत्याऐं ये उनसे कम करते हैं जो शिक्षित हैं और स्वयं को बहुत आगे बढ़ा हुआ मानकर चलते हैं। ऐसी ही बातें आप अन्य अपराधों के विषय में लगा सकते हैं। यदि कुछ अशिक्षित लोग अपराध की दुनिया में आये हैं तो उनकी जीवन कहानी का ज्ञान होने पर हम कह सकते हैं कि उनका सरगना कोई न कोई शिक्षित मिलेगा, या किसी शिक्षित, या किसी प्रकार से कथित अगड़े व्यक्तियों के समुदाय के उत्पीडऩ के कारण वह इस लाइन में आ गये।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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