‘भारत में शिक्षा और अशिक्षा दोनों अभिशाप हैं’ (2)

  • 2015-10-20 05:09:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

झुग्गी झोंपडिय़ों में रहने वाले लोगों के विषय में कहा जा सकता है कि वहाँ कई प्रकार के अपराधी रहते हैं। ये लोग निस्सन्देह कई बार ऐसी ही भ्रान्ति उत्पन्न करते भी हैं कि उनके यहां या इनकी बस्ती में आपराधिक लोगों का बाहुल्य है। परन्तु हमारा आशय उस भारत से है जो भारत के सुदूर देहात में रहता है। सुदूर देहात में रहने वाला भारत शांत है, उसमें परस्पर प्यार है, लोगों में एक दूसरे के प्रति सम्मान और सत्कार का भाव है। ये लोग अशिक्षित हैं, पर संस्कारित हैं। वे यह जानते हैं कि परस्पर प्रीति पूर्वक व्यवहार करने या एक दूसरे के दुख दर्द में शामिल होने में ही जीवन का वास्तविक आनंद है। यह झुग्गी झोंपडिय़ों का संसार उपभोक्तावादी महानगरीय संस्कृति का संसार है। जिसमें अपराधी रहते हैं तो वह इस महानगरीय संस्कृति की देन हो सकते हैं। इसलिए यह हमारे चिन्तन का केन्द्र नही है।

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अशिक्षा एक अभिशाप
अशिक्षा एक अभिशाप[/caption]

अब आप थोड़ा सोचें कि मलीन बस्ती क्या है? जहाँ दिल के काले और तन से सफेद वस्त्र धारी लोग रहते हैं वह या वे शान्त गाँव जो बिजली की चकाचौंध से दूर शान्त माहौल में शान्त लोगों का घोंसला होने का शान्त स्थान है। तुलसीदास जी ने कहा है-

मन मलीन तन सुन्दर कैसे।
विषरस भरा हो कनक घट जैसे।।

मन तो मलीन हो और सुन्दर तन हो, तो उसे आप सौन्दर्य नही कह सकते। क्योंकि यह अवस्था तो सोने के घड़े में विषरस भरे होने की अवस्था के समान है। शिक्षित समाज की स्थिति ऐसी ही है।

क्या उपाय है?

इस स्थिति से उबरने के लिए हमें शिक्षित समाज में पैसा और भौतिकवाद की बढ़ती आग को शान्त करना होगा। सरकारों को चाहिए कि वे शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मानव निर्माण घोषित करें। रोटी, कपड़ा और मकान शिक्षा का दूसरा उद्देश्य होना चाहिए। मानव निर्माण का अर्थ है व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक रक्षोपाय अपनाना और उसे ऐसा सहृदयी बनाना कि वे निचले और पिछले लोगों के लिए सहायक बन जायें। उनका हाथ पकडऩे वाले बन जायें। हाथ छोडऩे वाले नही। अपनों अपनों का हाथ पकडक़र ऊपर को लेने वाले तो बहुत हैं मगर सबका हाथ पकडक़र ऊपर को लेकर चलने वालों का अभाव है। जो लोग ऊपर बैठकर अच्छा कार्य कर रहे हैं, वो वन्दनीय हैं। ऐसे अपवादों को नमस्कार।

हम अशिक्षित व्यक्ति को एक समस्या न मानें, उसे समाज के लिए एक ‘बोझ’ न मानें। उस बोझ को हम हल्का करने का प्रयास करें। साक्षरता अभियान कोई अच्छा माध्यम नही है। यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसा कि आप किसी को एक रोटी तो दे दें, पर उसकी पूरी भूख का निदान न करें। संस्कारों से भरी शिक्षा न देना भी गलत है। इसे आप कुछ-कुछ ऐसा मान सकते हैं कि किसी को आप गाड़ी चलाना तो सिखा दें पर उसका ‘ड्राईविंग लाइसेन्स’ ना बनवायें और ब्रेक के बारे में भी उसे कोई जानकारी ना दें। इसीलिए पूरी रोटी दीजिए और डी.एल. भी दीजिए। तभी भारत आगे बढ पाएगा।