सर्वसंप्रदाय समभाव की रक्षा कैसे हो

  • 2016-07-12 03:38:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

सर्वसंप्रदाय समभाव

खेद की बात है कि कांगे्रस ने और हमारे शासक वर्ग ने महाराजा भर्तृहरि के इस कथन से भी कोई सीख नही ली। इन्होंने हर शहर में गांधी नगर, गांधी कालोनी, नेहरू इंकलेव, नेहरू नगर, कमला नेहरू नगर, नेहरू प्लेस, इंदिरा कालोनी, राजीव विहार, सोनिया विहार बसाने आरंभ कर दिये। मानो इस राष्ट्र के लिए प्रेरणा का स्रोत केवल यही परिवार हो। इस पार्टी का और इस परिवार का इतिहास ही मानो इस राष्ट्र का इतिहास हो। ये सारे के सारे नेतागण यह भूल गये कि राष्ट्र किसी एक परिवार और एक दल की जागीर नही हुआ करते। कितना अच्छा होता कि-इस देश में मान्धाता विहार, दधीचि नगर, गौतम, कणाद, कपिल, पतंजलि, विश्वामित्र, पाणिनी और वशिष्ट जैसे महर्षियों के नाम पर नगरी बसाई जातीं।

राम, कृष्ण, युधिष्ठिर, भीष्म, विदुर, अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, चाणक्य, हर्ष, राजा जयपाल, पृथ्वीराज चौहान, राणा संग्राम सिंह, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज के नाम पर कालोनियां और नगर बसाये जाते।

इसका दोहरा लाभ होता। प्रथमत: हमारे महापुरूषों का उचित सम्मान हमें करना आता। दूसरे उनके बारे में जानने की उत्कंठा आज की युवा पीढी में होती। ऐसी ही स्थिति हमारे क्रांतिकारियों, भक्ति आंदोलनों के पुरोधा कवियों, संतों और महात्माओं के विषय में अपनाई जाती।

यदि हम ऐसा करने में सफल होते तो आज की युवा पीढ़ी को ज्ञात होता कि हमारे इतिहास की जड़ें कितनी गहरी और व्यापक हैं, तथा हम ऐतिहासिक धरोहरों के उत्तराधिकारी होने के रूप में कितनी सुदृढ़ हैं? तब होती-इस देश के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा। तब होता-इस देश के नवयुवकों को अपने इतिहास और इतिहास पुरूषों से लगाव।

दुर्भाग्य से ऐसा सोचा ही नही गया। अत: परिणति यह हुई कि यह देश विश्व का प्राचीनतम देश होते हुए भी सन 1947 ई. में जन्मा हुआ माना जा रहा है। नई पीढ़ी भारत के अतीत से सर्वथा अनभिज्ञ ही है और उसे आज अपने महापुरूषों के नाम तक भी याद नही है। आज इस भारत के निर्माता के रूप में नेहरू और नेहरू परिवार को मानने वाले अधिक लोग हैं। पर ऐसा सोचना इस राष्ट्र की जीवंतता और प्राचीनता दोनों का अपमान है। हमारा किसी परिवार या व्यक्ति से कोई दुर्भाव नही है। हमारी स्पष्ट मान्यता है कि जितना जिस व्यक्ति ने देश और समाज के लिए कुछ किया है उसे उतना सम्मान इतिहास में मिलना ही चाहिए। इसलिए नेहरूजी और गांधीजी ने भी जितना कार्य समाज और देश के लिए किया उतने तक उन्हें भी सम्मान मिलना चाहिए। परंतु यह बात सर्वथा अस्वीकार्य है कि देश के हर सार्वजनिक स्थल या सरकारी संस्थानों, प्रतिष्ठानों इत्यादि पर केवल किसी एक परिवार के नाम छाये हुए दिखाई दें।

हमारा देश सर्वसंप्रदाय समभाव की नीति को मानने वाला प्राचीन राष्ट्र है। इस सर्वसंप्रदाय समभाव की नीति की अर्थ यह भी है कि इतिहास को बनाने और सांस्कृतिक संपदा को प्रस्तुत करने या उसे सहेजकर रखने में जिस-जिस व्यक्ति ने जितना-जितना सहयोग दिया है उसके उस सहयोग का सम्मान होना चाहिए। ऐसा करने से ही भारत की सनातन संस्कृति की रक्षा हो सकती है, और ऐसा करने से ही हर वर्ग और संप्रदाय को अपना अस्तित्व बचाने में सहायता मिल सकती है।
सामान्य ज्ञान के प्रश्न


आजकल समाचार पत्रों में सामान्य ज्ञान के प्रश्न कुछ इस प्रकार के होते हैं-
-अमुक फिल्म के निर्माता निर्देशक कौन थे?
-अमुक फिल्म की हीरोइन कौन है?
-अमुक गाने के गायक कौन हैं?

-अमुक फिल्म से अमुक हीरो के साथ कौन सी हीरोइन  ने काम किया?
-अमुक फिल्म निर्माता की कोई दस फिल्मों के नाम बताओ।
इत्यादि।

ऐसा लगता है कि जैसे यह देश नचकैयों का देश हो गया हो। बच्चों का उद्घार इन नचकैयों के कृत्यों के गुणगान से कदापि संभव नही है, यदि इसी मूर्खता को अपनाया जाता रहा तो राष्ट्र का नैतिक और चारित्रिक पतन निश्चित है। ज्ञात रहे कि ये दोनों अवगुण दासता के अमिट चिन्ह हैं।

हम इसे राजनीतिज्ञों के भ्रष्ट और निकृष्ट आचरण की परिणति ही मानते हैं। यदि प्रारंभ से ही स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात राष्ट्र के मूल्यों की चिंता की जाती तो ऐसी स्थिति न आती। राष्ट्र किसी की जागीर नही बन पाता। संसार से कितने ही धनवान चले गये। यहां से जाते समय, कूच करने के समय किसके पास कितना धन था? लेकिन देश को दोनों हाथों से लूटने में लगे हमारे प्यारे जननेता इस बात से शिक्षा लेंगे, इसमें संदेह है। क्योंकि वे उस संविधान की उपज हैं, जिसमें

-संघीय शासन व्यवस्था को कनाडा से।
-मौलिक अधिकारों को अमेरिका से।
-संसदीय शासन व्यवस्था को ब्रिटेन से।
-एमरजेंसी की व्यवस्था को जर्मनी से।
-नीति निर्देशक तत्वों को आयरलैंड से।
-केन्द्र राज्य संबंधों को आस्टे्रलिया से लिया गया है।

ये हमारे जननेता इसी आदर्श संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं और शपथ लेकर अपने ही हाथों से इसका खून निचोड़ते हैं।

शपथ वाले दिन अचकन पर गुलाब के फूल का लगाया जाना इसी बात का प्रतीक है। उधारी प्रतिभा के साये और संरक्षण में पले इन नेताओं को विश्व के पहले गणतंत्र (वैशाली का गणतंत्र) को उद्घाटित करने और उसका आदर्श स्वरूप संसार के सामने उपस्थित करने का समय नही है। क्योंकि अपने संविधान में पश्चिमी मान्यताओं को प्रश्रय देकर लोकतंत्र के ध्वजवाहक के रूप में पश्चिम को ही इन्होंने मान्यता दे दी है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?’ से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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