लोकतंत्र में प्रतिबंध कितने उचित

  • 2016-05-16 03:30:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

लोकतंत्र
बिहार अपने अतीत में महात्मा बुद्घ की भूमि रही है। इसके पाटलिपुत्र ने ऐसे कई राजवंशों का उत्थान-पतन होते देखा है, जिनका कभी विशाल भूभाग पर चक्रवर्ती साम्राज्य हुआ करता था। इसी बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक सराहनीय निर्णय लिया है, जिससे उन्होंने अपने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करा दी है। पिछले दिनों लंबे समय से बिहार अपनी गुण्डागर्दी के लिए जाना जा रहा था। पर शराबबंदी के आदेश के पश्चात बड़ी बात यह हुई कि प्रदेश में अपराध की घटनाओं में 27 प्रतिशत की कमी आयी है।

बिहार के मुख्यमंत्री की इस सराहनीय पहल पर एक निजी टी.वी. चैनल पर बहस का आयोजन किया गया। जिसमें एक राजनीतिक दल की प्रतिनिधि का कहना था कि शराब से राजस्व की प्राप्ति होती है। यदि शराबबंदी का आदेश यथावत जारी रहता है तो सोलह प्रतिशत राजस्व की हानि होगी। उसे कहां से पूरा किया जाएगा? उक्त टीवी चैनल के एंकर को चर्चा के एक प्रतिभागी बता रहे थे कि यह शराबबंदी का आदेश पूर्णत: उचित है। इस पर एंकर महोदय ने कहा कि आप लोकतंत्र में ‘प्रतिबंध की राजनीति’ का पक्ष क्यों लेते हैं? यह लोकतंत्र है और इसमें हर व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से सोचने, कहने और करने का अधिकार है। इसलिए ऐसा कुछ भी मत कहो और मत करो जो कि व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला हो।

टी.वी. चैनल के एंकर ने जो कुछ कहा, वही आजकल लोकतंत्र के विषय में सामान्यतया जाना और माना जाता है। लोग लोकतंत्र को एक ऐसी ही शासन प्रणाली मानते हैं जिसमें किसी को रोकना टोकना ही निषिद्घ है।

अब उन टी.वी. एन्कर महोदय को कौन समझाये कि लोकतंत्र में रोकना-टोकना ही वह हथियार है जिससे यह शासन प्रणाली लोकप्रिय बनती है और जनता के लिए काम करती सी जान पड़ती है। यदि आप लोकतंत्र से रोकने-टोकने या प्रतिबंध लगाने के उसके हथियार को छीन लेंगे तो फिर इसके पास बचेगा ही क्या? कुछ भी नही।

अब अपनी बात के समर्थन में हम कुछ विचार रखना चाहेंगे। भारतवर्ष के भीतर जितना भर भी कानून है वह सारा का सारा व्यक्ति के हित में है या अहित में है? इस पर कुछ लोग कहेंगे कि हित में है तो कुछ कहेंगे कि अहित में है-क्योंकि यह भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है। हमारा मानना है कि सारा कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता को जीवित रखने के लिए तथा समाज के उन दुष्ट लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए बनाया जाता है जो किसी न किसी प्रकार व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन कहीं न कहीं करते रहते हैं। देश की मुख्यधारा में आस्था रखकर चलने वाला व्यक्ति कानून का संरक्षण प्राप्त करता है और अपनी स्वतंत्रता का उपभोग करता है। इसलिए सारा कानून जनहित में बनाया जाता है और उसे लोकतंत्र के अनुकूल ही माना जाता है। मध्यकाल में बादशाही या सुल्तानी शासक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन करके अपने हित में ऐसे कानूनों का निर्माण करते थे जो जनता का रक्त चूसने वाले होते थे। उन्हीं कानूनों का निर्माण अंग्रेजों ने अपने समय में किया तो लोगों ने उन कानूनों को मानने से इंकार कर दिया। यदि हम टी.वी. एंकर की बात पर जाएं तो कल के भारत में ऐसी मांग भी उठेगी कि कानून को पूर्णत: समाप्त कर दिया जाए। क्योंकि यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन करता है, तब क्या होगा? हम अराजकता को यदि अपने आप ही निमंत्रण देना चाहते हैं तो ऐसे बुद्घिजीवियों की बुद्घि सचमुच दया की पात्र है।




लोकतंत्र में मर्यादाएं एक प्रतिबंध के रूप में बचपन से सिखाई जाती हैं। इन मर्यादाओं में प्रात:काल शीघ्र उठना, शीघ्र उठकर पानी पीना, शौचादि जाकर तथा नहा धोकर पवित्र करना, नित्य दांत साफ करना, विद्यालय समय से जाना, विद्यालय से समय से घर आना, विद्यालय का कार्य समय से निपटा लेना, अध्यापक के साथ कभी भी अपमानजनक शब्दों का प्रयोग न करना, उनसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनके प्रति श्रद्घालु बने रहना, माता-पिता के प्रति और बड़ों के प्रति विनम्र रहना-सेवाभावी रहना इत्यादि इतनी सारी मर्यादाएं हैं कि यदि इन्हें भी गिना जाने लगे तो व्यक्ति यही कहेगा कि मुझे तो चारों ओर से इन मर्यादाओं ने जकड़ लिया है। पर ये सारी मर्यादाएं व्यक्ति को सचमुच का मानव बनाने के लिए लोकतंत्र ही स्थापित करता है। जो बच्चा इन मर्यादाओं को अपने ऊपर प्रतिबंध नही मानता है वह इनका पालन करते-करते एक सधे-सधाये रास्ते पर आगे बढऩा लगता है और अपने जीवन को सफलता के सोपानों की ओर ले जाता है। जबकि जो बच्चा इन मर्यादाओं के प्रतिबंध से स्वयं को मुुक्त करने के लिए संघर्ष करता है समाज उसे ही उपद्रवी उत्पाती या आतंकी कहता है। इन मर्यादाओं को तोडऩे वाले बच्चे बड़े होकर सचमुच किसी अनैतिक कार्य में लिप्त हो जाते हैं। स्पष्ट है कि मर्यादाओं का प्रतिबंध मानव को मानव बनाने के लिए ही होता है। इसका कारण है कि मानव मस्तिष्क में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार का विचार प्रवाह सदा प्रवाहमान रहता है। इनमें से सकारात्मक विचार प्रवाह की ओर बढऩा कठिन होता है जबकि नकारात्मक विचार प्रवाह की ओर बढऩा सरल होता है। सकारात्मकता को अपनाने के लिए एक साधना की आवश्यकता है और वह साधना किसी मर्यादा पथ का पथिक बनने से ही पूर्ण हो सकती है। जिसे विद्वान लोग अपने लिए उपयुक्त और उचित मानते हैं। इसके विपरीत नकारात्मक या विध्वंसात्मक विचार-प्रवाह को अपनाने के लिए किसी प्रकार की साधना की आवश्यकता नही है, उसे तो मनुष्य स्वयं ही अपना लेता है। पर इसका अभिप्राय यह भी नही है कि व्यक्ति जन्मना उग्रवादी या उत्पाती ही उत्पन्न होता है। मनुष्य जन्मना ‘मनुष्य के बच्चे’ के रूप में जन्म लेता है। जिसे बड़ा होकर मानव बनना है, मानवतावादी बनना है। उसके लिए हमारे ऋषियों ने बताया है कि ज्ञान दो प्रकार का होता है एक नैसर्गिक और दूसरा नैमित्तिक ज्ञान। आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार प्रकार का ज्ञान हर प्राणी के पास है जो उसे प्रकृति ने ही प्रदान किया है। जिसे वह बिना किसी के बताये भी सीख लेता है। पर इससे अलग नैमित्तिक ज्ञान तो उसे किसी के साथ मिलकर चलते रहने और कुछ करने से ही मिलता है। इस नैमित्तिक ज्ञान को पाकर ही मानव मानव बनता है।

मनुष्य का धर्म-मानवता, व्यक्ति के ऊपर वह अनिवार्य प्रतिबंध अर्थात मर्यादा है जो उसे बचपन से लेकर वृद्घावस्था तक किसी संतुलित भूमिका के साथ बांध देती है। यह प्रतिबंध होकर भी प्रतिबंध नही है? भारतीय वैदिक धर्म में तो ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वान प्रस्थाश्रम तथा संन्यासाश्रम चारों आश्रमों के कत्र्तव्यकर्म निश्चित किये गये हैं। ये कत्र्तव्यकर्म लोकतंत्र की भावना को मजबूत करने के लिए ही कार्य करते थे, क्योंकि इनके पालन से हर व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हो जाती थी। जो लोग कत्र्तव्यकर्म को अपने ऊपर एक प्रतिबंध मानते हैं वे अपने अधिकारों से भी अपने आप ही वंचित हो जाते हैं। कैसे?

जब एक व्यक्ति कोई भी अनैतिक कार्य अपना अधिकार मानकर करता है-तो वह स्वाभाविक है कि एक कानून का और समाज की एक मर्यादा का उल्लंघन करता है। मान लीजिए वह किसी के यहां चोरी करता है और चोरी में पकड़ा जाता है तो जेल भी जाता है। उसका इस प्रकार जेल जाना उसके जीवन जीने के अधिकार का उपभोग करने से उसे स्वयं ही रोक रहा है। स्पष्ट हुआ कि वास्तविक प्रतिबंध तो व्यक्ति का कर्म है जो उसकी स्वतंत्रता को बाधित करता है। यदि कर्म पवित्र और उच्च होंगे, शुभ होंगे तो व्यक्ति को जेल जाना ही नही पड़ेगा। जेल के दो अर्थ हैं एक तो वह जेल जो इस भौतिक संसार में अपराधियों को सुधारने के लिए बनायी जाती है और दूसरी वह जेल जो जन्म-मरण के चक्र में जाने से जानी जाती है। हमारे ऋषियों की मान्यता रही कि कर्म इतने पवित्र होने चाहिए कि इन दोनों जेलों से ही मुक्ति हो जाए। मुक्ति अर्थात स्वतंत्रता और यह वही स्वतंत्रता है जिसे हमें लोकतंत्र कुछ मर्यादाओं की साधना के साथ प्रदान करता है। इसलिए लोकतंत्र में मर्यादाओं को अपने लिए प्रतिकूल नही मानना चाहिए, नीतीश बाबू ने शराबबंदी करके लोकतंत्र की आत्मा का सम्मान किया है। लोकतंत्र की आत्मा लोकस्वास्थ्य की संरक्षिका होती है। वह राजस्व लाभ नही देखती है-अपितु वह तो मानव के यशस्वी होने का लाभ देखती है। इसके लिए नीतीश बाबू सचमुच धन्यवाद के पात्र हैं।