लोकतंत्र में प्रतिबंध कितने उचित-2

  • 2016-05-17 03:30:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

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नीतीश बाबू ने शराब पर प्रतिबंध लगाकर उचित ही किया है। अभी तक होता यह रहा है कि सरकारें लोगों को इस हाथ वेतन देती हैं और उस हाथ उससे शराब पिलाकर उस वेतन को वापस ले लेती हैं। सरकारी कोष से लिया गया पैसा सरकारी कोष में जा लेता है। बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनको इस शराब ने नष्ट कर दिया है। बहुत से परिवारों में कितनी ही महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने कभी अपने पति के वेतन को हाथ लगाकर नही देखा कि महोदय को कुल कितना वेतन मिलता है? कारण कि श्रीमानजी वेतन मिलने से पूर्व ही उसे चट कर जाते हैं। लोकतंत्र राजस्व को नही देखता है कि शराब बेचने से कितना राजस्व मिलता है? इसके विपरीत लोकतंत्र देखता है कि लोगों को नैतिकतावादी बनाकर हर चेहरे पर प्रसन्नता के भाव कैसे लाये जाएं? बिहार सरकार के इस निर्णय से यदि हर कर्मचारी ने अपना वेतन घर ले जाकर देना आरंभ कर दिया तो बिहार सरकार के इस निर्णय की आलोचना करने वालों को शराबी सरकारी कर्मचारियों के परिजनों की प्रसन्नता का भी आंकलन करना ही होगा।




हमारे संविधान में जिन दस मौलिक कत्र्तव्यों को रखा गया है उनमें से नौवां  कत्र्तव्य है-सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और दसवां कत्र्तव्य है-व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों के उत्कर्ष की ओर बढऩे का सतत प्रयास करे। ये दोनों ही कत्र्तव्य स्पष्ट करते हैं कि देश के नागरिकों को नैतिक रूप से बहुत ही बलिष्ठ होना चाहिए। किसी भी स्थिति-परिस्थिति में वे सार्वजनिक संपत्ति को क्षतिग्रस्त ना करें, क्योंकि वह संपत्ति सारे राष्ट्र की संपत्ति है। परंतु हमारे लोकतंत्र के लोगों ने सार्वजनिक संपत्ति को क्षतिग्रस्त करना अपना मौलिक अधिकार मान लिया।

कोई भी घटना हो, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहले पहुंचाई जाती है। संविधान के किसी भी व्याख्याकार ने तब कभी ऐसा नही कहा कि ऐसी घटना का होना या किया जाना एक संवैधानिक अपराध है, या संविधान की हत्या है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने वाले लोगों में अधिकांश लोग शराबी होते हैं। इतना ही नही शराबी व्यक्ति ही महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करते हैं, घर में महिलाओं पर अत्याचार करते हैं, माता-पिता तक को पीटते हैं, हत्याएं करते हैं अन्य सभी प्रकार के अपराध करते हैं, जो लोग इन शराबियों के अपराधों से  उत्पीडि़त होते हैं, तनिक उनसे भी पूछ लिया जाए कि बिहार सरकार का शराबबंदी का निर्णय कितना उचित रहा है?

हमने जाट आरक्षण आंदोलन के समय पिछले दिनों हरियाणा में सार्वजनिक संपत्ति को जलाते लोगों को देखा था। जिन्होंने तीस-चालीस लाख करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति को ही जलाकर खाक कर दिया था। उनकी असहिष्णुता तब हिंसक बन चुकी थी, और उनकी इस प्रकार की हिंसा के जो लोग शिकार हुए हैं उनके आंसू अभी तक थमे नही हैं। दसवें मौलिक कत्र्तव्य को भी इसी प्रकार व्याख्यायित करके देखने से पता चलता है कि राज्य नागरिकों का नैतिक  उत्थान चाहता है। क्योंकि लोकतंत्र देश में वास्तविक अर्थों में लोंगों के मध्य मैत्री भाव और भ्रातृभाव स्थापित करना चाहता है। अब यदि शराब व्यक्तियों का नैतिक पतन करती है, तो उस पर प्रतिबंध लगाना सरकार का पावन कत्र्तव्य है, और यही राजधर्म है। लोकतंत्र ऐसे प्रतिबंधों का सदा समर्थन करता है।

हमें लोकतंत्र की मनमानी व्याख्या करने से बचना चाहिए। वैसे हमने इस शासन प्रणाली की मनमानी व्याख्या करके भी देख लिया है, इसका परिणाम यह आया है कि समाज में अराजकता बढ़ती जा रही है। जिसमें शराब ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रसिद्घ लेखक ट्रीटस्के ने लोकतंत्र के विषय में कहा था कि यह शासन प्रणाली एक ऐसे व्यक्ति के समान है जो चीखती चिल्लाती भीड़ से घिरा है, जब राजशक्ति अशिक्षित और अनुत्तरदायी लोगों के हाथ में दे दी जाती है, तो उसमें क्षमता आ ही कैसे सकती है? जैसे एक कुशल गडरिया सैकड़ों भेड़ों को अपनी इच्छानुसार चलाता है, वैसे ही लोकतंत्र राज्यों में कतिपय राजनीतिक नेता जनता को अपनी इच्छा के अनुसार हांकने में समर्थ हो जाते हैं। संसद और विधानसभाओं में जो सदस्य निर्वाचित होकर जाते हैं न केवल वे ही अपने कार्य के लिए अयोग्य होते हैं अपितु जिन लोगों के हाथ में शासन का कार्य होता है वे भी अपना काम भलीभांति नही कर सकते। उन्हें सदा यह भय बना रहता है कि राजनीतिक नेता उनकी किसी बात से असंतुष्ट न हो जाएं?

जो लोग यह मानते हैं कि लोकतंत्र में प्रतिबंधों के लिए कोई स्थान नही है, उन्हें तनिक इस लोकतंत्र की कार्यशैली पर और भी अधिक गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसने माता-पिता के प्रति  संतान को उच्छ्रंखल बना दिया, जिससे माता-पिता मुंह बंद किये घर के एक कोने में बैठे रहते हैं। क्योंकि उन्हें यह पता है कि यदि मुंह खोला तो परिणाम आएगा-वृद्घा आश्रम में ले जाकर उन्हें डाल देना। इस लोकतंत्र ने चुपचाप कितने ही माता-पिताओं के चेहरों की मुस्कान छीन ली है, उनकी स्वतंत्रता छीन ली है, और उनकी हंसी पर प्रतिबंध लगा दिया है। पर उस प्रतिबंध पर कोई नही बोलता यह लोकतंत्र के विरूद्घ है। इसी लोकतंत्र ने एक अध्यापक को असहाय बनाकर रख दिया है। विद्यालयों में छात्र जो चाहें सो करें, पर एक अध्यापक को उनके सामने केवल असहाय बनकर ही रहना है। गुरू की गरिमा भंग हो गयी है। जे.एन.यू. की छात्राएं बता रही हैं कि उनके साथ वहां के छात्र तथा अध्यापक दोनों की बलात्कार करते हैं वहां नित्यप्रति हजारों कंडोम कूड़े में मिलते हैं, लोकतंत्र नित्य अबला का चीरहरण करता है, और उस पर कोई कुछ नही बोलता। कितनी ही बेटियों की जुबान पर जे.एन.यू. जैसे संस्थानों में प्रतिबंधलगा दिया गया है। उस प्रतिबंध का सबको पता है कि पर कोई नही बोलता कि यह लोकतंत्र के विरूद्घ है। क्योंकि लोकतंत्र नारी की अस्मिता का भक्षक बना दिया गया है। यदि आपने इस विषय को लेकर कुछ किया या कहा तो ‘लोकतंत्र को खतरा’ बताया जाने लगेगा।

पिछले दिनों कोटा राजस्थान के जिलाधिकारी ने छात्रों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति पर दुख व्यक्त करते हुए माता-पिता के एि एक पत्र लिखा कि वे छात्र-छात्राओं पर या युवा पीढ़ी पर अपनी अपेक्षाएं न थोपें, क्योंकि इससे उनके भीतर आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है। उन्हें स्वतंत्र होकर सोचने दें और स्वतंत्र होकर निर्णय लेने दें। यदि ऐसा किया जाएगा तो छात्र-छात्राओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति को कम किये जाने में सफलता मिलेगी।

जिलाधिकारी महोदय का यह पत्र समाचार पत्रों में भी प्रकाशित किया गया। बहुत लोगों ने इसे सराहा भी है। हो सकता है कि उनकी बात भी सही हो। पर क्या यह सच नही है कि संतान से पहले तो संतान के विषय में उनके माता-पिता ही सपना देखते हैं। यदि एक मां चंद्रमा को ‘मामा’ बताकर बच्चे को अपने ‘मामा’ का कुशलक्षेम लाने के लिए प्रेरित न करती तो या शिवाजी की माताजी जीजाबाई उन्हें प्रोत्साहित न करती तो क्या आज एक बेटा चंद्रमा पर मानवजाति की जीत की पताका फहराने में या औरंगजेब को नाको चने चबाने वाले शिवाजी हमारे इतिहास में आज एक महानायक के रूप में अपना नाम लिखाने में सफल होते? हर विजयपताका के पीछे पिता का आशीर्वाद खड़ा होता है, उसकी लताड़ की प्रत्यंचा पर अपना तीर साधकर जब कोई बच्चा किसी चिडिय़ा की आंख को बींधता है तो उसे पिता की अदृश्य छाया अपने पास खड़ी क्यों  दिखाई दे जाती है? माता-पिता से उनके अधिकार इस लोकतंत्र ने छीन लिये हैं और उन अधिकारविहीन माता-पिता के बिगड़े हुए बच्चे हताशा और निराशा में आत्महत्या कर रहे हैं। मैं पिछले दिनों दिल्ली कनॉट प्लेस से अपनी गाड़ी से निकल रहा था-मेरे साथ समाचार पत्र के महाप्रबंधक श्री एलएस तिवारी व कार्यालय प्रबंधक अजय आर्य भी थे। अचानक एक ओर देखा वहां युवक युवतियों की कुछ अधिक ही भीड़ थी। निकट जाने पर पता चला कि वहां भयंकर गर्मी में शराब में धुत्त कई लडक़े, लड़कियां सडक़ के एक किनारे पर पड़े थे, जिन्हें उनके साथी गाडिय़ों में उठा-उठाकर डाल रहे थे। क्या इस पीढ़ी को सुधारने के लिए शराबबंदी आवश्यक नही है? क्या इन लडक़े-लड़कियों को देखकर इनके माता-पिता का कलेजा फटता नही होगा? इन्हें देखकर तो हर कोई कहेगा कि शराब पर यथाशीघ्र पूरे देश में पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। लोकतंत्र चाहे इन प्रश्नों पर मौन रह जाए पर नीतीश बाबू ने उत्तर दे दिया है कि लोकतंत्र में मर्यादाओं की रक्षा के लिए प्रतिबंध भी आवश्यक हैं।