और कितने पाकिस्तान होते?

  • 2015-10-30 03:30:08.0
  • राकेश कुमार आर्य

pak flag1947 में जब देश बंटा उससे पूर्व देश को मजहबी आधार पर बांटने के अतिरिक्त जातिगत आधार पर या वर्गीय आधार पर बांटने का भी प्रयास किया गया था। इस कार्य में उस समय ईसाई मिशनरियों ने विशेष भूमिका निभाई थी। न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में ईसाई मिशनरी गतिविधि जांच समिति मध्य प्रदेश, 1957 को प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया था कि 1938 में पाकिस्तान की मांग के साथ-साथ छोटा नागपुर बनवासी क्षेत्र का भारत का विच्छेद कराकर आदिवासिस्थान की मांग में तीव्रता लायी गयी थी। कहा जाता है कि प्रचार कार्य के लिए मुस्लिम लीग ने उस समय एक लाख रूपये दिये थे। भारत में राजनीतिक स्वाधीनता के अरूणोदय के साथ-साथ आदिवासिस्थान का आंदोलन भी तीव्र कर दिया गया। उद्देश्य यह था कि पूर्वी बंगाल और हैदराबाद के बीच एक गलियारा सा बन जाए, और यदि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्घ छिड़ जाए तो भारत पर दोहरी मार की जा सके।

इसी जांच समिति के प्रतिवेदन में आगे कहा गया था कि लूथरी और रोमन कैथोलिक मिशनों के प्रभाव के साये में आदिवासियों के सिर पर अलगाव का जो भूत सवार हुआ है, उसका पूर्ण दायित्व ब्रिटिश सरकार और मिशनरियों की हठधर्मिता की नीति पर है। 1931 की जनगणना में आदिवासियों की डाल को अंतिम रूप से हिंदुओं के मुख्य तने से काटकर अलग कर दिया गया था, तथा भारत-शासन अधिनियम 1935 में साईमन आयोग की संस्तुतियों का समावेश कर दिया गया। स्पष्ट है कि इन दोनों बातों ने पाकिस्तान की ही भांति झारखण्ड के अलग राज्य की मांग के लिए द्वार खोल दिये। इस मांग तक पहुंचने के लिए कई सीढिय़ों को पार करना पड़ा। 1941 में श्री एम.डी. टिग्गा ने छोटा नागपुर केर पुत्री (छोटा नागपुर की पुत्री) नामक पुस्तक की रचना करके उसे प्रकाशित किया। इस पुस्तक में कहा गया-आदिवासियों के आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन को देखते हुए 1898 में एक सभा स्थापित की गयी। इस मूल नाम छोटा नागपुर क्रिश्चियन एसोसिएशन था। धीरे-धीरे वह पनपी 1915 में उसमें कुछ शक्ति आ गयी, और उसका नाम पड़ा-छोटा नागपुर उन्नति समाज। 1938 से इसी सभा को आदिवासी महासभा कहा जाने लगा। इसके बाद 22 जनवरी 1939 को रांची में आदिवासी महासभा का प्रथम सम्मेलन जयपाल सिंह संसद सदस्य की अध्यक्षता में हुआ। महासभा विशेषांक मार्च 1939 के अनुसार अध्यक्ष पद से बोलते हुए जयपाल सिंह ने कहा था-

‘‘बहुसंख्यकों के अत्याचार से मुक्त होने के अपने आंदोलन में सब आदिवासी अब एकजुट हो गये हैं। हमारा एक संयुक्त मोर्चा बन गया है, जो आदिवासियों के इतिहास में एक अनोखी बात है। यहां काम करने वाली सभी मिशनरी संस्थाएं साथ हैं। यह भी एक महान उपलब्धि है। बंगाली तक अलग होने के लिए शोर मचा रहे हैं। यूरोपीय और आंग्लभारतीय खुलकर हमसे सहानुभूति दिखा रहे हैं।... हमारी शिक्षा सुविधाओं को किसी भी आधार पर कम नही किया जाना चाहिए, बल्कि उसके विपरीत मिशनरी संस्थाओं के लिए अनुदान बढ़ाए जाने चाहिए। हमारे उत्थान और शिक्षा के लिए मिशनरी अपना जीवन अर्पित कर रहे हैं।

जयपाल सिंह और मुस्लिम लीग के षडय़ंत्रों को मुस्लिम लीग के रगीब हसन और रांची के अब्दुल हलीम ने गुप्त पत्राचार के माध्यम से हवा देने का प्रयास किया था। 22 मई 1942 के अपने पत्र में हसन ने घोर निराशा प्रकट करते हुए कहा है किक्रिप्स की यात्रा के दौरान आदिवासी महासभा ने आदिवासिस्थान की मांग प्रस्तुत नही की। जबकि इस सिलसिले में जयपाल सिंह को बार-बार तार और पत्र भेजे गये थे, और लीग के पत्र-पत्रिकाओं तथा मंच से उनके हितों की वकालत की गयी थी। हसन ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि  जिन्नाह ने मद्रास की जस्टिस पार्टी के नेताओं को इस बात के लिए कुरेदा था कि वे स्वाधीन द्रविड़ राज्य की मांग प्रस्तुत करें। उसने कतिपय ऐसी योजनाओं की भी रूपरेखा दी है जो लीग को आदिवासियों के विषय में अधिकाधिक अंतग्र्रस्त करती और अंत में उसने इस बात पर बल दिया है कि उन चालों को सर्वथा गुप्त रखने की आवश्यकता है।

ये प्रमाण बताते हैं कि मुस्लिम लीग और अंग्रेज मिलकर उस समय भारत के कितने टुकड़े कर देना चाहते थे।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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