राज्यों के पुनर्गठन संबंधी अधिनियम- भाग-3

  • 2016-05-09 03:30:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की संसद ने राज्य के निर्माण के या उनकी सीमाओं में परिवर्तन या परिवद्र्घन करने के अपने अधिकार का सदुपयोग करते हुए कई बार ऐसे अच्छे निर्णय भी लिये हैं जो प्रशासनिक तंत्र को स्फूत्र्तिमान बनाये रखने या जनहित के दृष्टिगत प्रशंसनीय रहे। ऐसे निर्णयों में असम (सीमा परिवर्तन) अधिनियम 1951 प्रमुख हैं। जिसके द्वारा भारत के राज्यक्षेत्र से एक पटरी भूटान को अध्यर्पित करके असम की सीमा में परिवर्तन किया गया था, इसी प्रकार आंध्र प्रदेश अधिनियम 1953 के द्वारा संविधान के प्रारंभ के समय विद्यमान मद्रास राज्य से कुछ राज्यक्षेत्र निकालकर आंध्र नामक नया राज्य बनाया गया। जिसे प्रशासनिक दृष्टि से उचित कहा जा सकता है।

अगले ही वर्ष हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर (नया राज्य) अधिनियम 1954 आया। इस अधिनियम के द्वारा हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर इन दो भाग ‘ग’ राज्यों का विलय करके एक राज्य अर्थात हिमाचल प्रदेश का सृजन किया गया। इसके उपरांत 1956 में बिहार और पश्चिम बंगाल (राज्यक्षेत्र अंतरण अधिनियम) 1956 द्वारा कुछ राज्यक्षेत्र बिहार में पश्चिम बंगाल को अंतरित किये गये। राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 से भारत के विभिन्न राज्यों की सीमाओं में स्थानीय और भाषाई मांगों को पूरा करने के लिए परिवर्तन किया गया। विद्यमान राज्यों के बीच कुछ राज्य क्षेत्रों को अंतरित किया गया। इसके अतिरिक्त एक नया केरल राज्य बनाया गया। जिससे मध्य भारत, पेप्सू, सौराष्ट्र, ट्रावनकोर, कोचीन, अजमेर, भोपाल, कोडगू, कच्छ और विंध्य प्रदेश की रियासतों का उनसे अलग हुए राज्यों में विलय कर दिया गया।

राजस्थान और मध्य प्रदेश (राज्यक्षेत्र अंतरण) अधिनियम 1959 द्वारा राजस्थान राज्य से कुछ राज्य क्षेत्र मध्य प्रदेश को अंतरित किये गये। आंध्र प्रदेश और मद्रास (सीमा परिवर्तन) अधिनियम 1959 द्वारा आंध्र प्रदेश और मद्रास राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन किये गये। अगले वर्ष 1960 में मुंबई पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया। जिसके द्वारा मुंबई राज्य को विभाजित करके गुजरात नामक नया राज्य बनाया गया। साथ ही मुंबई के बचे हुए राज्य का नाम भी मुंबई न रहकर इसके द्वारा महाराष्ट्र कर दिया गया। जिससे मूल मुंबई राज्य समाप्त होकर उसके स्थान पर दो नये राज्य गुजरात और महाराष्ट्र उदित हुए। जिस प्रकार मुंबई राज्य का अस्तित्व 1959 में समाप्त किया गया उसी प्रकार 1968 में मद्रास राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम पारित किया गया, जिसके द्वारा मद्रास राज्य के स्थान पर तमिलनाडु कर दिया गया। जब 1962 में नागालैंड राज्य अधिनियम 1962 के द्वारा नागालैंड राज्य की स्थापना की गयी थी तो उसी समय नागा पहाड़ी और त्युएनसांग क्षेत्र नाम का राज्यक्षेत्र समविष्ट किया गया। उससे पूर्व यह राज्यक्षेत्र असम राज्य का एक भाग था जो संविधान की छठी अनुसूची में उल्लिखित जनजाति क्षेत्र था। जब 1966 में पंजाब राज्य को पंजाब और हरियाणा में विभाजित किया गया था तो उसी समय चंडीगढ़ को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया। इस शहर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने का कारण हरियाणा और पंजाब दोनों की इस शहर को अपने साथ रखने की हठधर्मिता थी। दोनों प्रदेशों के मध्य किसी भी प्रकार के विवाद को टालने या किसी प्रकार के मनोमालिन्य को समाप्त करने के लिए इस शहर को केन्द्र शासित प्रांत बना देना जहां लोकतंत्र की समन्वयात्मक शैली की जीत थी वही यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर एक कलंक भी था कि हम एक शहर को लेकर ऐसे लड़ रहे थे जैसे यह विभाजन दो देशों के मध्य हो गया हो।

लोकतंत्र की समन्वयात्मक शैली की यह जीत अब पराजय में परिवर्तित हो गयी है क्योंकि पर्याप्त समय बीत जाने पर भी लोकतंत्र इस शहर के विषय में यह निर्णय नही कर पाया है कि यह किसे दिया जाए? यदि लोकतंत्र ने इसे पंजाब और हरियाणा में से किसी एक को देने का साहस किया तो हानि में रहने वाला पक्ष फूट पड़ेगा इसलिए लोकतंत्र अपना ‘प्रतिष्ठा’ को बचाये चुप पड़ा है। जिसे उचित नही कहा जा सकता है। जो लोग भारत में लोकतंत्र की गहरी जड़ें होने की बात कहते हैं वे चण्डीगढ़ को देख लें, उन्हें पता चल जाएगा कि भारत में लोकतंत्र धरती में रोपा ही नही गया था-यह तो गमले में रखा है। जिसकी जड़ें जमीन को छू भी नही गयी हैं। सन 2000 तक के भारतीय स्वतंत्रता के 53 वर्षों में राज्यों के निर्माण या पुनर्गठन या नाम परिवर्तन या सीमाओं में परिवर्तन को लेकर संविधान को 23 बार या तो संशोधित करना पड़ा है या फिर नये अधिनियम लाने पड़े हैं। कहने का अभिप्राय है कि हमें लगभग हर दो-सवा दो वर्षों में इस काम के लिए अपने संविधान में या तो संशोधन करना पड़ा है या नया अधिनियम बनाना पड़ा है। इस प्रसंग में आंध्र प्रदेश और मैसूर (राज्य क्षेत्र अंतरण) अधिनियम 1968, असम पुनर्गठन (मेघालय) अधिनियम 1969 हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम 1970, पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम 1971 (जिससे मणिपुर, त्रिपुरा मेघालय को राज्यों के प्रवर्ग में सम्मिलित किया गया तथा मिजोरम एवं अरूणाचल प्रदेश को संघ राज्य क्षेत्र की सूची में सम्मिलित किया गया) 1979 का हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा परिवर्तन) अधिनियम 1986 का मिजोरम राज्य अधिनियम (1986 में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया था। इसके पश्चात इसी वर्ष अरूणाचल प्रदेश राज्य अधिनियम बनाकर अरूणाचल को भी पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।)

राजीव गांधी की सरकार ने मिजोरम और अरूणाचल प्रदेश के पूर्ण राज्य का दर्जा देकर 1987 में गोवा को दमण और दीव से पृथक करके अलग राज्य बनाया। जिसके लिए गोवा, दमण, दीप पुनर्गठन अधिनियम 1987 पारित किया गया। इसके तेरह वर्ष पश्चात 2000 ई. में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम बनाकर उत्तराखण्ड राज्य पृथक रूप से सृजित किया गया। इसी वर्ष बिहार पुनर्गठन अधिनियम लाकर उत्तराखण्ड (9.11.2000) के निर्माण से छह दिन पश्चात से झारखण्ड राज्य बनाया गया। 21वीं शताब्दी में हमने इसके पश्चात एक और नया राज्य आंध्र प्रदेश से अलग होता देखा है जिसे तेलंगाना का नाम दिया गया है।

नये राज्य निर्माण के लिए जहां तक संविधान के लचीले होने की बात है तो हम इससे सहमत हैं कि संविधान को लचीला ही होना चाहिए, क्योंकि लचीला संविधान जनापेक्षाओं का सम्मान करना जानता है जो कि लोकतंत्र की पहली अनिवार्यता है। कठोरता का लोकतंत्र में स्थान नही है। पर हमने इस सिद्घांत की अनुचित व्याख्या की है। लोकतंत्र को लचीला होना चाहिए उसका संविधान भी लचीला होना चाहिए और उसे कठोर भी नही होना चाहिए हम इस दिशा में भागते चले गये बिना यह विचार किये कि लोकतंत्र की रस्सी को इतनी ढीली भी नही होना चाहिए कि वह हर ‘पथिक’ के पैरों के लिए एक बाधा बन जाए और उसे इतनी कठोर भी नही होना चाहिए कि वह टूट ही जाए। इसका अभिप्राय है कि मध्यम मार्ग का अनुकरण करना ही लोकतंत्र की परंपरा है। अत: लोकतंत्र को जनमत की अतार्किक मांगों के सामने झुकना भी नही चाहिए और तार्किक मांगों को मानने में किसी प्रकार के संकोच का प्रदर्शन भी नही करना चाहिए। जहां तक हमारे प्रदेशों की सीमाओं के परिवर्तन या परिवद्र्घन की बात है तो कई बार ऐसा किया जाना आवश्यक हो जाता है। जैसे उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमा का उदाहरण लें। इन दोनों प्रांतों की सीमा का निर्धारण बहुत दूर तक यमुना नदी करती थी जो बाढ़ आने पर सीमाओं को बिगाड़ देती थी। नदी का बहाव बदलते ही कोई गांव कभी हरियाणा में चला जाता था, तो कभी हरियाणा से उत्तर प्रदेश में आ जाता था। जिससे किसानों को बड़ी समस्या होती थी। किसानों की समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए ‘दीक्षित अवार्ड’ की संस्तुति के आधार पर 1979 में इस समस्या का स्थायी समाधान कर दिया गया। जिससे दोनों प्रदेशों की सीमाओं में आंशिक परिवर्तन किये गये। ऐसे अधिनियमों को लोकतंत्र की भावना के अनुकूल ही कहा जाएगा। जबकि चण्डीगढ़ और सतलुज यमुना लिंक नहर के निर्माण जैसे प्रकरणों पर जहां लोकतंत्र हिचक कर रह गया-वहां इसने अपनी गरिमा को ही ठेस पहुंचाई है। इसने जहां-जहां अपने उत्तरदायित्वों को न्यायपालिका के गले में डालकर अपनी जान छुड़ाई है। वहां भी यह परास्त हुआ है। क्योंकि न्यायपालिका लोकतंत्र नही है ना ही वह लोकतंत्र चलाती है। वह तो लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ है। उसे लोकतंत्र चलाता है। पर हमारे यहां लोकतंत्र न्यायालय से चलने लगा। पराजय की पराकाष्ठा है यह।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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