नये राज्यों का गठन कितना लोकतांत्रिक? भाग-2

  • 2016-05-07 03:30:48.0
  • राकेश कुमार आर्य

संविधान के 22वें संशोधन अधिनियम 1969 के द्वारा 25 सितंबर  1969 को असम राज्य में छठी अनुसूची के भाग-2क में विनिर्दिष्ट कुछ क्षेत्रों को समाविष्ट करने वाला एक स्वायत्त राज्य मेघालय गठित किया गया। पर बात यहीं नही रूकी, प्रक्रिया और आगे बढ़ी और संविधान (सत्ताइसवां संशोधन) अधिनियम 1971 के अनुसार संविधान में अनुच्छेद 371ग अंत:स्थापित किया गया, इससे दो नये संघराज्य मिजोरम और अरूणाचल प्रदेश बनाये गये। नये राज्य बनाने की इस प्रक्रिया को बनाये रखने वालों ने उस समय भी यही तर्क दिया था कि प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि छोटे राज्य हों जिससे हर प्रदेश के हर आंचल का समुचित और समग्र विकास हो।

1974 में एक विशेष घटना घटित हुई जब सिक्किम नाम के एक स्वतंत्र देश ने भारत के साथ मिलने की इच्छा व्यक्त की। हमारे संविधान निर्माताओं की यह दूरदृष्टि ही थी कि उन्होंने भविष्य के इस प्रश्न का कि यदि कोई देश भारत में मिलना चाहे तो वह कैसे मिलेगा? उत्तर संविधान ही राख दिया था। संविधान की पहली धारा यह स्पष्ट करती है कि भारत का राज्य क्षेत्र (1) संघ राज्यक्षेत्र तथा (2) ऐसे अन्य राज्य क्षेत्र जो भारत द्वारा अर्जित कर लिये गये हैं से मिलकर बनेगा। पांडिचेरी की फ्रांसीसी बस्ती कराकल, माहे और यनाम 1954 में इसी धारा के अंतर्गत भारतीय राज्यक्षेत्र में विलीन की गयी थीं। फ्रांसीसी संसद ने इन क्षेत्रों को भारत को सौंपने का प्रस्ताव दिसंबर 1962 में पारित किया था उसी के पश्चात ये क्षेत्र तुरंत भारतीय राज्यक्षेत्र में सम्मिलित कर लिये गये थे।

अब बारी थी सिक्किम की। सिक्किम एक अलग सम्प्रभु राज्य था। यद्यपि ब्रिटिश राज्यकाल में यह एक भारतीय रियासत थी। जिस पर चोग्याल वंशी शासकों का शासन था। चोग्याल राजाओं के संघ का भी सदस्य था। स्वतंत्रता के समय ही सिक्किम की जनता ने भारत के साथ विलय की मांग की थी। परंतु उस समय की परिस्थितियों के दृष्टिगत ये निर्णय लिया गया था कि सिक्किम की प्रतिरक्षा, विदेश कार्य और संचार व्यवस्था का उत्तरदायित्व भारत वहन करेगा। इस प्रकार सिक्किम भारत संघ द्वारा आरक्षित राज्य हो गया था।

मई 1974 में सिक्किम कांग्रेस ने राजा का शासन समाप्त करके  ‘सिक्किम शासन अधिनियम’ 1974 पारित किया। इसका उद्देश्य सिक्किम में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित कर उसका भारत के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करना था। इस अधिनियम से सिक्किम सरकार को यह अधिकार मिल गये कि वह भारत की राजनीतिक संस्थाओं में सिक्किम के लोगों के प्रतिनिधियों के भाग लेने के लिए कदम उठाये, जिससे कि सिक्किम का बहुमुखी विकास हो सके। उस समय भारत पर श्रीमती इंदिरा गांधी जैसी कुशल राजनीतिज्ञ प्रधानमंत्री का शासन था। सिक्किम को अपनी ओर बढ़ता देख उन्होंने इसे राष्ट्रहितों के अनुकूल बनती जा रही प्रक्रिया के रूप में देखा और सिक्किम के हर सकारात्मक कदम का पूर्ण सकारात्मकता के साथ उत्तर दिया। लोगों ने चोग्याल शासक को इस बात के लिए बाध्य कर दिया कि वह ‘सिक्किम शासन अधिनियम’ को अपनी स्वीकृति प्रदान करें। अंत में राजा को बाध्य होकर जनमत के सामने झुकना पड़ा और ‘सिक्किम शासन अधिनियम’ द्वारा दी गयी शक्तियों का प्रयोग करके सिक्किम विधान सभा ने एक संकल्प प्रस्ताव पारित किया। जिसके अनुसार सिक्किम को भारत के संसदीय क्षेत्र में प्रतिनिधित्व देने की बात कही गयी।

सिक्किम विधानसभा के इस संकल्प प्रस्ताव की प्रति प्राप्त करते ही श्रीमती गांधी सक्रिय हुईं और उन्होंने ऐतिहासिक 35वां संविधान संशोधन अधिनियम 1974 पारित कराया। जिसके अनुसार यह प्राविधानित किया गया कि सिक्किम भारत राज्य क्षेत्र का भाग नही होगा, अपितु ‘सहयुक्त राज्य’ होगा। इसे उस समय भारत-राज्यक्षेत्र में लाने के लिए संविधान में अनुच्छेद 2(क) और 10वीं अनुसूची अंत: स्थापित की गयी। परंतु इसे भी 36वें संविधान संशोधन अधिनियम 1975 के द्वारा लोप कर दिया गया। 35वें संविधान संशोधन के अनुसार सिक्किम के लिए यह भी व्यवस्था की गयी कि यह राज्य भारत की संसद के दोनों सदनों के लिए दो प्रतिनिधि भेजने का अधिकारी होगा।

भारत के मूल संविधान में किसी ‘सहयुक्त राज्य’ की कोई प्रास्थिति की कल्पना या प्राविधान नही था। इसलिए इस ‘सहयुक्त राज्य’ की शब्दावली को लेकर उस समय लोगों ने श्रीमती इंदिरा गांधी की आलोचना की थी, परंतु समय ने स्पष्ट कर दिया कि उस समय जो कुछ किया गया था उसे श्रीमती गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव से बचने के लिए किया था। क्योंकि चोग्याल राजा ने भारत को विस्तारवादी बताकर उस समय अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप कराके सिक्किम के विलय को रूकवाने की अपील की थी। चीन का समर्थन उस समय चोग्याल के साथ था। अत: बड़ी समझदारी से कदम उठाते हुए इंदिरा जी ने सिक्किम को भारत के साथ मिलाया था। उस समय सिक्किम के सांसदों को भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने से भी निषिद्घ किया गया था। परंतु बाद में सिक्किम को भारत के 22वें राज्य के रूप में संविधान की पहली अनुसूची में स्थान दे दिया गया। पाठकों की जानकारी के लिए हम बताना चाहेंगे कि जिस समय देश स्वतंत्र हुआ था, उसी समय भारत के साथ नेपाल, तिब्बत और बर्मा ने भी मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। परंतु नेहरू जी ने उस समय इन देशों के प्रस्तावों को यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि भारत साम्राज्यवादी मनोवृत्ति का देश नही है। भारत के राष्ट्रीय हितों के दृष्टिगत नेहरू जी की यह बहुत बड़ी भूल थी। कुछ समयोपरांत ही तिब्बत को चीन ने अपने साथ मिलाकर हड़प लिया था।

हमने सिक्किम को भारत का एक राज्य बनाने की इस प्रक्रिया पर कुछ अधिक प्रकाश इसलिए डाला है-जिससे देश के भीतर बनने वाले नये-नये राज्यों की ही जानकारी पाठकों को न मिले अपितु कोई बाहरी देश भारत का राज्य कैसे बन सकता है? इसकी जानकारी भी पाठकाकें को मिल सके। सिक्किम का यह विलय पूर्णत: लोकतांत्रिक ही था। सिक्किम का भूगोल चाहे शेष भारत के अनुकूल ना हो, परंतु उसका इतिहास भारत के साथ अन्योन्याश्रित संबंध रखता था और देश निर्माण में इतिहास ही एक प्रकाशपुंज बना करता है। यदि ‘भारत की खोज’ के लेखक पं. नेहरू को भारत के इतिहास की वास्तविक जानकारी होती और वह यह जानते कि आर्यावत्र्त की सीमाओं में तिब्बत, चीन का बड़ा भाग, बर्मा, जावा, सुमात्रा, बोर्निया, कम्बोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया आदि देशों का विस्तृत भूभाग आता था, तो वह भारत के रूप में उदित होते आर्यावत्र्त का स्वागत करते और इतिहास की धारा को निर्बाध बहने देकर भारत की सीमाओं का विस्तार होने देते। पर वह समय चूक गये और उनके रूप में समय चूका भारत आज तक समय की धारा को अपने अनुकूल नही कर पाया है। देश की जनता गर्वीले और गौरवपूर्ण नेतृत्व की इच्छा रखती है, दुर्भाग्यवश भारत की जनता की यह इच्छा नेहरूजी पूर्ण नही कर पाये।

हमने कछुआ की संकुचन क्रिया को अपने लिए अनुकूल और उचित माना, इसलिए अपने हाथ-पांव भीतर करके धर्मनिरपेक्षता और शांतिवादी विचारधारा की छद्म छाया में अपने आपको संकुचित कर लिया। फलस्वरूप ‘संकोच’ और ‘झेंप’ हमारी राष्ट्रीय नीति का एक आवश्यक अंग बन गये। जिससे देश को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक ऐसे देश के रूप में देखना आरंभ किया गया जो अधिक दबाव देने पर अपने ही राष्ट्रहितों से सौदा करने को तैयार हो सकता है। शास्त्रीजी ने ‘ताशकंद समझौता’ के समय भारत की इस दब्बू छवि को तोडऩे का प्रयास किया था। इसलिए वह अपने राष्ट्रहितों पर डटे रहे पर बाद में उस ‘फौलादी नेता’ को झुका लिया गया जिससे ‘दु:खी होकर’ वह संसार से ही चले गये। क्या उनकी ‘हत्या’ में नेहरूजी की उन नीतियों का योगदान नही था जो इस देश को संकोची और झेंपू देश बना रही थीं? एक नेता ने देश को ‘दब्बू’ बनाने की नीति का अनुकरण किया तो दूसरे नेता को उसका मूल्य अपने प्राण गंवाकर देना पड़ा। इसे आप लोकतंत्र की जय कहेंगे या पराजय?

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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