नये राज्यों का गठन कितना लोकतांत्रिक? भाग-1

  • 2016-05-06 04:24:14.0
  • राकेश कुमार आर्य

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स्वतंत्रता के पश्चात देश में कुल 15 राज्य थे। प्रारंभ में भारत में प्रशासनिक आधार पर कुछ ऐसी विसंगतियां थीं जिनका निराकरण खोजना समय की आवश्यकता थी। इन विसंगतियों को अंग्रेजों ने उत्पन्न किया था। उन्होंने अपनी सुविधा के दृष्टिकोण से राज्यों का निर्माण कर रखा था। स्वतंत्रता उपरांत संविधान के नौवें संशोधन के माध्यम से (1960) 17-1-1961 को संविधान की प्रथम अनुसूची को संशोधित कर विभिन्न तिथियों को हुए भारत-पाक अनुबंधों के क्रियान्वयन के लिए असम, पंजाब, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के संघ राज्य क्षेत्र से पाकिस्तान को कुछ राज्यक्षेत्र अंतरित किये गये। जिससे हमारे इन राज्यों की सीमाओं में यथावश्यक परिवर्तन किये गये। राज्यों के स्वरूप और स्थिति में परिवर्तन करने संबंधी स्वतंत्र भारत में यह पहला प्रयास था, जिसे एक पड़ोसी देश के साथ चले आ रहे अपने वैमनस्य को समाप्त करने और विभाजन संबंधी किसी भी प्रकार की विसंगतियों के निराकरण हेतु ही किया गया था।

इसके पश्चात 10वें संविधान संशोधन अधिनियम 1961 के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 240 और पहली अनुसूची में संशोधन कर दादरा और नागर हवेली को संघ राज्यक्षेत्र के रूप में समाविष्ट किया गया, 12वें संविधान संशोधन अधिनियम 1962 के माध्यम से गोवा, दमण, दीव को संघ राज्य क्षेत्र के रूप में समाविष्ट किया गया, 13वें संविधान संशोधन अधिनियम 1962 के द्वारा नागालैंड राज्य के प्रशासन के लिए विशेष उपबंध किये गये, 14वें संविधान संशोधन अधिनियम 1962 के द्वारा उपबंध किया गया कि पांडिचेरी, कराइकल, माहे और पनम के भूतपूर्व फ्रांसीसी राज्यक्षेत्र संविधान में पांडिचेरी संघ राज्य क्षेत्र के रूप में विनिर्दिष्ट किये गये। इसके द्वारा हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा दमण और दीव तथा पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्रों को उसी प्रकार विधानमंडल और मंत्रिपरिषद बनाने में समर्थ किया गया जिस प्रकार राज्य पुनर्गठन के पहले कुछ भाग ‘ग’ राज्यों में था।

इस अधिनियम में यह भी उपबंध किया गया था कि संघ राज्य क्षेत्र का लोकसभा में अधिकतम प्रतिनिधित्व 20 से बढ़ाकर 25 कर दिया जाएगा जिससे पांडिचेरी संघ राज्य क्षेत्र का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो सके।

इसके पश्चात 18वें संविधान संशोधन अधिनियम 1966 के द्वारा भाषा के आधार पर पंजाब राज्य का पुनर्गठन किया गया। अभी तक के संविधान संशोधनों के माध्यम से जो कुछ भी किया गया वह किसी सीमा तक उचित और न्यायसंगत था, जिसे प्रशासनिक तंत्र को स्फूर्तिवान बनाने के दृष्टिकोण से किया गया था। पर अब तक हमारी दिशा और दृष्टि में परिवर्तन आ चुका था। लोगों ने लोकतंत्र की परिभाषा को अपने ढंग से व्याख्यायित और परिभाषित करना आरंभ कर दिया था और इस कार्य में सबसे आगे रहकर राजनीतिज्ञों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ लोगों को यह सहन नही था कि पंजाब में पंजाबी न बोलने वालों को भी शासन करने का अवसर मिले। उनकी सोच थी कि पंजाब ‘पंजाबी’ का है। इस दृष्टिकोण को राष्ट्रहित में उचित नही माना जा सकता, परंतु यह सब हुआ और पंजाब की गुरूभूमि पर भाषायी आंदोलन उग्ररूप धारण कर गया। फलस्वरूप पंजाब का पुनर्गठन करके पंजाब और हरियाणा राज्य का उपबंध किया गया। इस प्रकार 27-8-1966 से भारत के मानचित्र में एक नया राज्य हरियाणा उभर कर आया। पंजाब वालों को लगा कि सिर से एक बोझ हल्का हो गया और अब सुख से रहेंगे और उधर हरियाणा वालों को लगा कि स्वर्ग की ‘चाबी’ हाथ आ गयी है अब सुख से रहेंगे। जब घरों में तनाव सीमा से अधिक बढ़ जाता है तो दो भाईयों को भी अलग-अलग ऐसी ही अनुभूति हुआ करती है। पर उस समय एक देवी ऐसी होती है जो इस घटनाक्रम पर रोती है-और उसे मां कहते हैं? वह नही चाहती कि उसकी कोख और गोद के टुकड़े हों और उसे ऐसा लज्जास्पद दृश्य देखने को मिले। भारत मां भी नही चाहती थी कि भाषाई आधार पर तेरे ‘बच्चों’ में विवाद हो और खूनी संघर्ष के पश्चात वे लड़ते-लड़ते विभाजन कर बैठें।

इस संविधान संशोधन से अनुच्छेद 03 में स्पष्टीकरण जोडक़र यह स्पष्ट किया गया कि संसद को नया राज्य या संघ राज्य क्षेत्र बनाने की विस्तृत शक्ति है। कहने का अभिप्राय है कि अब से पूर्व जो लोग ये माने बैठे थे कि नये राज्य का निर्माण स्वतंत्र भारत में संभव नही है उन्हें अब ये बता दिया गया कि नये राज्यों का निर्माण स्वतंत्र भारत में संभव है और यदि आप भी पंजाब के रक्तिम संघर्ष को दोहराते हुए देश की संसद के द्वार तक आओगे तो हम तुम्हारी बात को भी मानेंगे। अब तक देश में सरदार पटेल के उस पुरूषार्थ की गरिमा की तूती बोल रही थी जिसके अंतर्गत उन्होंने अथक परिश्रम करके देश की 563 रियासतों को एक देश के रूप में और एक राष्ट्र के रूप में आबद्घ करने में सफलता प्राप्त की थी। इस पुरूषार्थ का आभामंडल इतना प्रभावी था कि देश में नये राज्यों की मांग कहीं से भी नही उठ रही थी। परंतु 1966 में सरकार ने ही यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य में यदि नये राज्यों की मांग उठती है तो उस पर संसद निर्णय लेते हुए राज्यों का निर्माण कर सकती है।

1966 के इस निर्णय के दूरगामी परिणाम आये। इसने राज्यों के निर्माण के संदर्भ में लोगों की सोच की दिशा और दृष्टि में परिवर्तन कर दिया। जिससे राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति हमारे समर्पण भाव में भी कहीं न कहीं कमी आयी। स्वयं हरियाणा और पंजाब आज तक सतलुज-यमुना लिंक नहर पर ऐसे लड़ रहे हैं जैसे दो पड़ोसी शत्रु देश लड़ रहे हों। पिछले दिनों इस नहर को लेकर पंजाब की सरकार की ओर से जिस प्रकार का कृत्य किया गया वह पूर्णत: देशविरोधी और अलोकतांत्रिक था। यदि इन दोनों प्रांतों के पास उस समय अपनी-अपनी सेनाएं होतीं तो मध्यकालीन शासकों की भांति भारी संख्या में रक्तपात तक करा देते। पर यह भारत का लोकतंत्र ही था जो इस देशविरोधी और अलोकतांत्रिक कृत्य को देखकर चुपचाप सब्र का घूंट पी गया। यद्यपि इससे उसके हृदय पर आघात अवश्य लगा। यदि देखा जाए तो 1966 से चली आ रही सतलुज यमुना लिंक नहर की यह समस्या हमारे लोकतंत्र की असफलता का प्रमाण है, जिससे नेताओं के राष्ट्रविरोधी चरित्र और लोकतंत्र के नाम को अपमानित करने की उनकी मानसिकता का पता चलता है, राजनीति को इतना दुर्बल चरित्र वाली भी नही होना चाहिए कि उसके कार्यों को लोकतंत्र का एक अन्य स्तंभ अर्थात न्यायपालिका करे। देश की समस्याओं के समाधान के लिए देश की जनता लगभग 800 राजाओं (543 लोकसभा के तथा 250 राज्यसभा के सांसद) को भेजती है कि ‘‘जाओ और पक्षपात शून्य होकर न्यायपूर्ण शासन करो। राष्ट्रहित में बोलना और यदि समय पर नही बोले या उल्टा बोले तो तुम्हें पाप लगेगा।’’

पर हमारे 800 के 800 राजा 1966 से ही चुप हैं और सतलुज यमुना लिंक नहर को न्यायालय को सौंपकर आराम से सिगार पी रहे हैं। उधर देश का न्यायालय है जो इन 800 राजाओं के अत्याचार से बढ़े विवादों के बोझ को ढोता ढोता अब सार्वजनिक रूप से रोने लगा है। कैसे चलेगा देश? जब देश का न्यायालय ही न्याय की भीख मांगने लगे तो समझा जा सकता है कि स्थिति कितनी विकट है? देेश के नागरिकों को चाहिए कि ऐसा जनमत तैयार करें कि जिसके सामने सिगार पीते और संसद या विधानमंडलों में बैठकर ऊंघते हमारे राजा जाग जाएं। उन्हें अपना कत्र्तव्य बोध हो जाए।

1966 की भूल के पश्चात देखिए कि देश में अलगाव की बयार बहने लगी। लोगों को अपनी भाषायी क्षेत्रीय और भौगोलिक पहचानों को उबारने और उनका राष्ट्रहितों के साथ संघर्ष कराने का अवसर मिला। ये वही पहचान थी जिन्हें सरदार पटेल ने राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रति समर्पित होने के प्रत्येक राष्ट्रवासी के सत्संकल्प के नीचे ले जाकर दबा दिया था और अपेक्षा की थी ये नीचे दबकर और गलकर राष्ट्ररूपी वृक्ष को हरा भरा करने में सहायता देंगी पर हमने देखा कि 1966 में भाषायी आधार पर पंजाब के विभाजन से प्रेरित होकर सिंध भाषा को लेकर संघर्ष आरंभ हुआ कि इसे भी आठवीं अनुसूची में डालो और सरकार ने 21वें संविधान संशोधन 1967 के माध्यम से इस भाषा को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर लिया। हमारा किसी भाषा से कोई विरोध नही, पर उस सोच से विरोध है जो विविधताओं को देश की एकता से ऊपर लाना चाहती है और हम झूठा गीत गाते रहते हैं कि भारत में विविधता में एकता है। क्या कमाल है कि काम तो किये जाते हैं विविधताओं के हाथों एकता को मिटाने के और गीत गाते हैं विविधता में एकता दिखाने के? यह भावना कहीं से भी लोकतांत्रिक नही है।